ओह राहुल! कम इनसाइड मी… : क्विंट, स्क्रॉल, वायर, स्कोडा, लहसुन

जैसा कि अंदेशा था, ‘राहुल जी, कम इनसाइड मी’ मीडिया संस्थान और पत्रकार समूहों की आज की हेडलाइन और विश्लेषण तय लीक पर ही है। वहीं, बकलंडू बुद्धिजीवी और लपड़झंडू फ़ेसबुकिया पत्रकार एवम् शीघ्रपतन-शिकार स्तंभकार समूह डिबेट में किसने क्या बोला छोड़कर ये भी गिनने बैठ हए हैं कि लोकसभा में किस सांसद को कितनी बार क़ायदे में रहने के लिए डाँट पड़ी। 

ये वही गिरोह है जो सिनेमा देखने जाता है और, चूँकि उसके दोस्तों ने पहले से ही ऐलान कर दिया होता है कि बेहतरीन फ़िल्म है, वो सिनेमा को बेहतरीन से भी बेहतर कह देता है। लेकिन, जब आप पूछेंगे कि क्या बेहतरीन था तो कहेंगे कि ‘तुमने लाइटिंग देखी थिएटर की? क्या बढ़िया पॉपकॉर्न था!’  

फकॉल डॉट इन, द कंट, द लायर, द स्कोडा लहसुन आदि मीडिया गिरोह ने गजब की विश्लेषण दी है। फकॉल वाला तो मैं शुरु से अंत तक पढ़ गया जहाँ उन्हें मोदी की स्पीच सुनाई ही नहीं दी! क्यों? क्योंकि राहुल पार्टी ने बोलने नहीं दिया। पहली बात तो यह है कि जिसने ये रिपोर्ट बनाई उसको कहा जाए कि अपनी टीवी ठीक करा ले, या यूट्यूब पर फिर से देख ले। ये पत्रकार उस टाइप का चिरकुट है जो कोरस को मुख्य गायक मानता है और कहता है कि कोरस ने दिल जीत लिया, लेकिन मुख्य गायक की आवाज़ सुनाई नहीं दी। 

दूसरी बात यह है कि अगर कोई बोल रहा हो, और पीछे कोई चिल्लाता रहे तो बोलने वाले का क्या दोष? आप इस पर दुखी हो लो कि मोदी को शिष्टाचार में राहुल के सामने खड़े हो जाना चाहिए था, लेकिन डेढ़ घंटे कोई तुम्हारे ही बुलाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर, तुम्हारे ही उठाए सवालों का जवाब दे रहा हो, और तुम ठीक से सुनने की जगह ‘हो-हो’ और ‘हुआ-हुआ’ कर रहे हो तो भी मोदी का ही दोष! मतलब फ्रंट से भी मजे और बैक से भी, डियर स्क्रॉल? 

यही तो मज़ा है। कॉन्ग्रेस की शह पर, पता नहीं किस स्ट्रैटेजिस्ट के गणित को देखकर, टीडीपी ये प्रस्ताव लाती है, और आप चर्चा को टालने की कोशिश करते हैं। वो इसलिए करना पड़ता है क्योंकि आपको तो लगा था कि स्पीकर पिछले बार की ही तरह ये मोशन ख़ारिज कर देंगी। लेकिन सरकार ने इसे एक सही मौक़े की तरह भुनाया और आपकी झंड हो गई। 

यही कारण है कि आप सरकार को ‘अलोकतांत्रिक’ कहकर घेरने वाले थे कि वो प्रस्ताव ख़ारिज कर रही है, क्योंकि आपको लगा था आप जनता को शिवसेना, शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत जैसों के नाम पर बहला देंगे कि भाजपा के साथ अपने लोग भी नहीं हैं। आपको लगा कि आप ये कहेंगे कि इनके सहयोगी इनसे नाराज़ हैं, इसलिए सरकार भाग रही है। लेकिन मोदी ने तो इसे बेहतरीन मौका मानते हुए आपके ब्लफ़ की कह के ले ली। 

वो तो तैयार ही रहते हैं क्योंकि उनको पता है आप वही ‘नोटबंदी में लोगों को परेशानी हुई’, ‘जीएसटी से व्यापारियों को घाटा हुआ’, ‘पंद्रह लाख कहाँ हैं’, ‘पीएम घूमते रहते हैं’, ‘हमने ही सारी योजनाएँ चलाई थीं’, ‘बड़े व्यापारी लूटकर भाग रहें हैं’, ‘रोजगार नहीं हैं’ आदि गीत गाओगे। जबकि सत्य उसके विपरीत है। उनकी तैयारी पूरी थी, आप ब्लफ़ खेल रहे थे। 

फिर आपकी बखिया खोल दी गई, और आपके पृष्ठभागों पर तथ्यों के निशान छाप दिए गए। आपको सहारा लेना पड़ा कि पान की दुकान पर फ़्रांस के राष्ट्रपति ने मुझसे ऐसा कहा, और मोदी इंडिपेंडेंट कम्पनी के आँकड़े आपके मुँह पर मारता रहा। ये सिर्फ इसलिए संभव है क्योंकि आप आज तक भाजपा और मोदी द्वारा तय की हुई दिशा में ही चल रहे हैं। आपका पूरा नेतृत्व एक पार्टी और एक नेता ने क्या

कहा, उसी पर केन्द्रित है, जबकि भाजपा और मोदी हमेशा ग़रीबों, वंचितों, पिछड़ों और सामान्य जनता की बात करके चर्चा को उनके लिए प्रासंगिक बनाए रखते हैं। यही कारण है कि आप हमेशा पीछे से पकड़ने के चक्कर में रहते हैं, और ये लोग मैदान फ़तह करके आपके लिए टेंट के बाँस छोड़ जाते हैं। 

इसीलिए, तुम्हें मीडिया की लॉबी की ज़रूरत होती है जो कि भारत की अंग्रेज़ी पढ़ सकने वाली जनसंख्या (कुल का दो प्रतिशत) के भी एक अत्यंत छोटे प्रतिशत लोगों द्वारा पढ़ी जाती है। तुम्हें लगता है कि ये लोग ट्विटर पर आर्टिकल शेयर करके, रीट्वीट करा कर के, देश और जनता का मूड बताते हैं, जबकि इनकी औकात बस ये है कि आर्टिकल के अंत में दो रूपए का योगदान माँगते नज़र आते हैं क्योंकि इनके आर्टिकल पर दस पैसा प्रति क्लिक वाला विज्ञापन भी देने को कोई तैयार नहीं। ये मीडिया वाले जनता के पढ़ने से होने वाली आमदनी से नहीं, किसी पार्टी की लगातार घटती फ़ंडिंग से चल रहे हैं। 

यही कारण है कि आप हर महीने इनसे निष्पक्ष विश्लेषण की जगह, ब्लेटेंट कैम्पेनिंग देखते हैं। पोलिटिकल ख़बरों में आप देख पाएँगे कि रिपोर्ट में बायसनेस और निगेटिविटी कैसे एकतरफ़ा होकर हर महीने बढ़ती जा रही है। अब ये बेचारे नया एंगल तलाशते रहते हैं कि क्या लिखा जाए कि राहुल बाबा ऊपर दिखें। आपलोग देखते रहिए, एक दिन आप ये हेडलाइन भी पढ़ेंगे कि ‘मोदी भले ही बेहतर नेता हों, लेकिन डिम्पल तो राहुल के ही क्यूट हैं’। 

ख़ैर, मोदी और भाजपा ने इस मौक़े को समझा और इस बात को भुनाया कि मोदी की स्पीच को हर चैनल पर चलाया जाएगा। मोदी हिन्दी में बोलता है तो अंग्रेज़ी वाले भी सुनेंगे। रैली के भाषणों को तो कई चैनल नहीं दिखाते, लेकिन लोकसभा जब लाइव हो, और समय मिले तो मोदी उन मौक़ों को छोड़ता नहीं। साथ ही, विपक्ष को एक्सपोज़ करने को लिए ये ज़रूरी था। कॉन्ग्रेस के साथ आने को इच्छुक पार्टियों को भी ये दिखाना ज़रूरी था कि उनका नेतृत्व ‘गले पड़ने’ के बाद आँख मारकर दाँत निपोड़ने वाला डिम्पल्ड क्यूटीपाय है, न कि उनसे बेहतर क्षमता और समझ वाला व्यक्तित्व। 

जिसने राहुल की स्पीच भी सुनी और मोदी की भी, और उसे राहुल बेहतर लग रहा हो, उसका भाषण ऐतिहासिक लग गया हो, तो आप ये जान लीजिए कि यही लोग वो लोग हैं जिनके कारण 44 सीटों पर कॉन्ग्रेस है। पिछले वाक्य को आप दोनों हिसाब से पढ़ें कि इन्हीं लोगों के समर्थन के कारण कॉन्ग्रेस बची हुई है, और इन्हीं लोगों की ‘क्वालिटी’ के कारण राहुल उस पार्टी का नेता है जिसकी 44 सीटें ही बची हुई हैं। 

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