पैराडाइज़ लीक्स: पार्टी, सरकारों और देशों से परे, पैसेवालों के क़ब्ज़े में टैक्स क़ानून

सुबह से ‘पैराडाइज़ लीक्स’ की ख़बरें पढ़ रहा हूँ। कई आर्टिकल्स पढ़ लिए। फ़ेसबुक पर भी रवीश कुमार से लेकर बाकी लोगों का लिखा पढ़ लिया जिन्होंने सिर्फ नाम और हेडलाइन पढ़कर पोस्ट लिख दी हैं। ऐसे लेखों को समझने के लिए इंडियन एक्सप्रेस पर ये लिंक सबसे पहले पढ़ लीजिए कि इसमें क्या है, कैसे हुआ है, मक़सद क्या है आदि।

सिवाय इसके कि फ़लाने का नाम फ़लाने जगह पर है, और फ़लाने का बेटा फ़लाने कम्पनी का डायरेक्टर है जो फ़लाना काम करती है, ये साबित नहीं होता कि उन्होंने ग़ैरक़ानूनी काम किया है। इस पूरे डेटा के विश्लेषण का उद्देश्य सरकारों का कॉर्पोरेट्स से संबंध से लेकर टैक्स छुपाने के लिए कम्पनियों (और लोगों) द्वारा देश के कानून की कमियों का फ़ायदा उठाने को बाहर लाना है।

ज़ाहिर है कि इसमें कई काम ग़ैरक़ानूनी हैं जैसे कि भारत में कमाया पैसा, भारतीय संस्थाओं को बताए बिना बाहर भेजकर, वापस भारत ही में विदेशी निवेश के तौर पर दिखाना; कम्पनियों के मालिकाना हक़ को बिना टैक्स दिए बदल देना आदि। मेरी समझ इतनी नहीं है कि मैं आपको तोड़कर समझा सकूँ या एक्सप्रेस आदि के आर्टिकल से उतना समझ सकूँ कि सीधी भाषा में आप तक बात रख दूँ। जितनी बात समझ में आई है, लिख रहा हूँ।

भारत में कम्पनियों को ये अधिकार है कि वो अपने वित्तीय फ़ैसले इस तरह से तय करे कि उसकी टैक्स लायबिलिटी कम हो। इसके लिए कम्पनियों में टैक्स नीति या तंत्र से पैसे कैसे बचाए जाएँ, इस काम के लिए लीगल टीम होती है। उनके चार्टर्ड अकाउटेंट्स दिन-रात उन्हें ऐसे तरीक़े बताते हैं कि यहाँ पैसा भेज दो तो इतना टैक्स बच जाएगा। उनका काम ही है कि टैक्स सिस्टम में जो भी कमियाँ हैं, जहाँ से सरकारों को मूर्ख बनाकर पैसा बचाया जा सकता है, उसका फ़ायदा लिया जाय। ये पूरी तरह से क़ानूनी है क्योंकि आपके क़ानून में ही वो छेद हैं।

ये जितने लीक्स हुए हैं, चाहे वो पनामा लीक्स हो, स्विस लीक्स हो, या फिर आज वाला पैराडाइज़ लीक्स, इनका एक मक़सद (जो कि पूरे विश्व के खोजी पत्रकारों के समूह के द्वारा लाया गया है) ऐसी ख़बरों के ज़रिए सरकारों को एक ‘ग्लोबल टैक्स सिस्टम’ बनाने पर दबाव बनाना है। क्योंकि लोग और कम्पनियाँ एक देश में टैक्स से बचने के लिए, दूसरे देश में पैसा छुपाते हैं, और पहला देश कुछ नहीं कर सकता।

ये दूसरा सत्य है कि (लगभग) हर देश में कॉरपोरेट्स का पैसा चुनावों में लगता है तो वो चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। अब, जो चंदा देगा, वो ये भी तो चाहेगा कि उनके फ़ायदे के लिए नीतियाँ बनती रहें। ये अनैतिक काम है और इसके बारे में पब्लिक तक जानकारी आनी ज़रूरी है। क्योंकि अंततः हम सबकी ज़िंदगियाँ इन कॉरपोरेट्स पर काफ़ी हद तक निर्भर हैं, और अगर सरकारों का झुकाव उधर बढ़ता रहा तो उनके फ़ायदे के लिए हमें अपनी जेबें हल्की करनी होंगी।

इसे ऐसे समझिए कि बिजली का कोई व्यापारी, एक बड़ा कॉरपोरेट समूह, मोदी या मनमोहन की सरकार बनवाने के लिए अगर उसकी पार्टी को चुनावों के दौर में पचास करोड़ का चंदा देता है, तो वो ये भी तो चाहेगा कि सरकार बनने पर उसके पचास करोड़, सौ में बदल जाएँ। तो फिर ये पैसा आख़िर कौन देगा? कैबिनेट में मोदी जी कहेंगे कि फ़लाने जगह की जो ज़मीन है वो एक रूपए प्रति एकड़ की दर से फ़लाने आदमी को दे दो। या फिर, उसके प्लांट से बनती बिजली को सरकार पाँच रुपए प्रति यूनिट की जगह सात रूपए प्रति यूनिट पर ख़रीदेगी। और जब सरकार ख़रीदती है तो वो हमारे और आपके पैसे से ख़रीदती है, न कि सरकार के पास भाजपा या काँग्रेस के पार्टी फ़ंड से ये पैसा आता है।

इसी लीक की अलग-अलग ख़बरों के अनुसार हर पार्टी के कई नेताओं के नाम किसी न किसी ऑफ़शोर कम्पनी (विदेशी) से जुड़े हैं। नाम जुड़ना ग़लत नहीं है, न ही ग़ैरक़ानूनी। ग़लत ये है कि आप किसी कम्पनी से जुड़े हैं और आपने ये किसी को बताया नहीं, क्योंकि अगर किसी मंत्री का नाम किसी कम्पनी के डायरेक्टर के तौर पर आता है, तो ज़ाहिर है कि कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इन्टेरेस्ट होगा। मतलब ये कि वो मंत्री, उस कम्पनी के फ़ायदे के लिए कैबिनेट या सरकार के फ़ैसले को प्रभावित कर सकते हैं।

और हाँ, इस मुग़ालते में मत रहिए कि मोदी को इसका पता नहीं होता कि फ़लाने मंत्री का कनेक्शन फ़लाने कम्पनी से है, और वो उसका फ़ायदा चाहता है। जी नहीं, ऐसे फ़ैसलों में हमेशा ऊपर से नीचे तक सबको मालूम होता है। यहाँ एक पुलिस स्टेशन में ट्राँसफर को लेकर मोटी रिश्वत खिलाई जाती है, और आपको लगता है कि मंत्री बनने में योग्यता देखी जाती है तो आप बहुत भोले हैं। उदाहरण के लिए शरद पवार को हर बार कृषि मंत्रालय ही क्यों मिलता है, ये पता कर लीजिए।

इस लीक में भारत से कुल 714 नाम आए हैं। लेकिन महज़ नाम के आने से वो आदमी या संस्था दोषी नहीं हो जाती। हलाँकि सारे अख़बार वाले ख़बरों को ऐसे ही बेचते हैं कि नाम आना ही उसे दोषी बना देता है। एक्सप्रेस ने ये बात साफ़-साफ़ लिखी है कि महज़ नाम का होना उसे दोषी नहीं बनाता। जैसे कि ब्रिटेन की महारानी के पैसे का बरमूडा की किसी कम्पनी में इन्वेस्ट होना उन्हें दोषी नहीं बनाता। हाँ, ये सवाल ज़रूर उठता है कि टैक्स हैवन में ये पैसा क्यों लगाया गया, भले ही वो क़ानूनी तौर पर सही है।

उसी तरह से सरकारों पर भी ये सवाल उठता है कि हर साल ऐसे लीक्स के ज़रिए नामों का पता चलता है कि फ़लाने आदमी या कम्पनी ने विदेशी टैक्स हैवन में शेल कम्पनी को चेहरा बनाकर पैसा छुपाया है, बचाया है, तो सरकारें इस पर कानून क्यों नहीं बनाती? सीधी बात निकल कर यही आती है कि सारा खेल पैसों का है, और पार्टियाँ सत्ता में बनी रहें, इस कारण उनको पोलिटिकल फ़ंडिंग चाहिए, और वो फ़ंडिंग यही नाम वाले देंगे।

तो नाम चाहे जयंत सिन्हा का हो, वीरप्पा मोइली के लड़के का हो, भाजपा एमपी का हो, या फिर मोदी की 2014 की जीत का हो, क़ानूनन कितना सही है, इससे ज्यादा ज़रूरी बात ये है कि ये पूरा तंत्र कैसे काम करता है। साथ ही ये तंत्र पार्टी, नेता और देश से परे है। इसका तंत्र विश्वव्यापी है, और इसमें ट्रम्प के मंत्री से लेकर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, रूस के राष्ट्रपति और मोदी की जीत तक सिमट जाते हैं।

इसमें देश के क़ानून की कमियों का फ़ायदा उठाने के लिए निकाले गए रास्तों की बात है। इसमें बहुत कुछ ग़ैरक़ानूनी भी है क्योंकि कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपने पैसों के हरे-फेर की बातें छुपाई हैं, और बहुत ऐसे नाम हैं जिन्होंने दो देशों के बीच डबल टैक्सेशन ट्रीटी के होने या न होने का फ़ायदा उठाया है।

सवाल ये उठता है कि जब सरकारों के सामने ऐसे आँकड़े आते हैं, तो फिर इस पर क़ानून क्यों नहीं बनता? और ये सवाल दुनिया के तमाम देशों पर है। छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश हमेशा बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के पैसों को पनाह देते हैं क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था ऐसे ही ग़ैरक़ानूनी पैसों पर टिकी हुई होती है। कुछ कमीशन लेकर किसी देश के पैसों को अपने देश में दिखाकर उनका हजारों करोड़ रुपए बचाना एक बहुत ही सोची समझी राष्ट्रनीति है।

छोटे देश, चूँकि देश हैं, तो वो अपने कानून बनाने को स्वतंत्र हैं। उनको संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर बड़े देशों का भी आशीर्वाद मिला हुआ है क्योंकि बड़े देश के बड़े लोगों का पैसा मायने रखता है। यही कारण है कि ऐसे टैक्स हैवन देशों के नाम ज़रूर आते हैं, लेकिन उस पर काम नहीं होता। आपको नहीं लगता कि मॉरिशस, कैमेन आयलैंड, बरमूडा, पनामा, स्विट्ज़रलैंड आदि देशों पर बड़े देश दबाव बना सकते हैं? पर बनाते नहीं। इन देशों में सीआईए, रॉ जैसी संस्थाएँ अपने हिसाब की सरकारें बनवाती हैं, तो क्या वहाँ के क़ानून में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता?

लेकिन जब बात पार्टी और सरकारों से परे हो, जब सब इसमें गर्दन तक डूबे हों, तो फिर कोई भी सत्ता के हाथ से जाने से लेकर राष्ट्रपति की हत्या तक की संभावनाओं को सच क्यों होने देना चाहेगा? आखिर पैसा ही तो वो बात है जहाँ हर पार्टी आपको एक साथ दिख जाएगी। अब देखिएगा कि किस चुनावी रैली में मोदी या राहुल गाँधी आपको इन लीक्स की बातों पर बोलते नज़र आएँगे। साथ ही, ये भी देखिएगा कि कौन सा अख़बार किस ख़बर को कैसे छाप रहा है।

रवीश कुमार ने फ़ेसबुक पोस्ट लिखा और (सेलेक्टिवली) बताया कि भाजपा के किस नेता का नाम है, मोदी के चुनावों की ख़बर फ़लाने जगह 26 मई 2014 को ही आ गई थी। हलाँकि, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सिर्फ़ ये ख़बर छापी है कि 714 नाम हैं। जबकि जिस अख़बार को आधार मानकर रवीश कुमार ने पोस्ट लिखी है उसमें हर पार्टी के नेता का नाम है, लेकिन फिर उनके पोस्ट में वो धार गायब हो जाती जिसके लिए वो जाने जाते हैं। बाकी जगहों पर या तो अनुवाद चल रहा होगा, या अपने-अपने झुकाव के हिसाब से, सत्ता के डर से, अलग-अलग पत्रकार और अख़बार/चैनल अलग-अलग ख़बरें चलाएँगे।

कहीं आपको मोइली का नाम दिखेगा, कहीं चिदम्बरम का, कहीं जयंत का, कहीं शौर्य डोभाल का। इनका अपराध क्या है, वो शायद ही कोई बताए सिवाय इसके कि इनके नाम हैं, इनके नाम पर इतनी कम्पनियाँ हैं, ये इतने जगह पर डायरेक्टर हैं। अपने झुकाव के हिसाब से अपराधों की तरफ इशारा भर होगा क्योंकि आप इशारा ही कर सकते हैं। इस रिपोर्ट को तैयार करने में लगभग एक साल का समय लगा है। सारे आँकड़ों को वैरिफाय किया गया है, जिनके नाम हैं उनसे बात की गई है, जवाब माँगे गए हैं। कई लोगों ने जवाब दिए हैं, जो कि इंडियन एक्सप्रेस के लाइव ब्लॉग पर मिल जाएगा।

तो इसको जो लोग भाजपा या काँग्रेस के हिसाब से लिख रहे हैं, उनका अपना उद्देश्य है। जो लोग लिख रहे हैं, उनको इतनी समझ जरूर है कि ये मामला इतना सीधा नहीं है कि मोदी प्रधानमंत्री बनवा दिया गया। ये मामला ग्लोबल टैक्स सिस्टम को लेकर है कि आखिर इसपर आम सहमति क्यों नहीं बनती और जनता का पैसा, सरकारों के पास आ सकने वाला टैक्स, सरकार-दर-सरकार घूमता ही क्यों रहता है?

आखिर ब्लैकमनी पर ढोल पीटने वाली सरकार टैक्स सिस्टम को सीधा क्यों नहीं करती? क्या इस पर बात भी हुई है किसी भी वर्ल्ड फ़ोरम पर? नहीं हुई होगी क्योंकि इसमें हर दौर की हर सरकार के कुछ लोगों का हित शामिल है।

कल से भारत का इनकम टैक्स डिपार्टमेंट वैसे लोगों को नोटिस भेजना शुरु कर देगा जिन्होंने 50 लाख से ऊपर की राशि बैंकों में डिमोनेटाइजेशन के दौरान जमा की थी, और ब्यौरा नहीं दिया कि कैसे आया। अधिकारियों का कहना है कि सारे डेटा को समझने में, फ़िल्टर करने में साल भर का समय लगा है। एक साल और लगेगा छोटी राशि जमा करने वालों को नोटिस भेजने में। उसके बाद, ये सारे पैसे वाले लोग सरकारों के ख़िलाफ़ केस लड़ेंगे, वो केस सालों चलेगा।

अब इन दोनों ख़बरों की टाइमिंग देख लीजिए। गुजरात और हिमाचल में चुनाव होने वाले हैं, तथा सरकार ‘एंटी-ब्लैक मनी डे’ का झुनझुना बजाने वाली है। पैराडाइज़ लीक्स ने, सरकार की ‘हमने टैक्स चोरों को, ब्लैकमनी वालों को जीने नहीं दिया’ वाली लाइन पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है, तो सरकार के आईटी अधिकारियों ने तुरंत कह दिया कि वो डिमोनेटाइजेशन के चोरों को पकड़ने वाले हैं। मेरे ख़्याल से ये वाली ख़बर परसों आने वाली होगी, लेकिन पैराडाइज़ की बात से ध्यान हटाने के लिए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को एक दिन पहले बात खोलनी पड़ गई।

रैलियों में इसी बात को भुनाया जाएगा। मीडिया पैराडाइज़ लीक्स को अपने हिसाब से माइल्ड तरीक़े से छापेगी क्योंकि इसमें कई मीडिया कम्पनियों से जुड़े लोगों के नाम भी हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर कुल तीन दिन तक ये होगा क्योंकि उसके बाद फिर कुछ नया आ जाएगा। लोग खेमे पकड़ कर एक दूसरे के विरोधी दलों के लोगों के नाम लिंक फेंककर आपस में चर्चा कर लेंगे।

जो लोग पूरी बात जानना चाहते हैं, वो इंडियन एक्सप्रेस की सारी ख़बरें पढ़ें। सिर्फ अपने मतलब की मत पढ़िए। तब पता चलेगा कि ये किस लेवल की धाँधली है, और हम या आप (चाहे किसी भी पार्टी के समर्थक हों) कुछ नहीं कर सकते। कारण मैंने ऊपर बता दिया है कि इसमें पार्टी, देश और सरकारें एक साथ, मुस्कुराते हुए खड़े हैं, और जिसके पास पैसा है वो अपने हिसाब के क़ानून बनवा कर चिल मार रहा है।….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *