पर्सनल लॉ: मुसलमान चोर को हिन्दू चोर से अलग सज़ा मिलनी चाहिए

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक ऐसी संस्था है जिसके बोर्ड में खोजने से भी कोई मुस्लिम महिला नहीं मिलेगी। कहने को मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड भी है लेकिन आप ने उसके बारे में सुना भी नहीं होगा। यही हाल लगभग हर बोर्ड का है जो भारतीय मुसलमानों के हिमायती बने फिरते हैं। इनकी वेबसाइट पर जाकर देखें तो पता चलेगा कि महिला-पुरुष का अनुपात कितना है। ये काम आपको स्वयं करना होगा।

आजकल पर्सनल लॉ बनाम यूनिवर्सल सिविल कोड की चर्चा हो रही है। यूनिवर्सल सिविल कोड भारतीय संविधान में लिखी गई वो दिशा है जिसकी तरफ बढ़ने को हर सरकार को संविधान निर्माताओं ने कहा है। मतलब ये कि फ़िलहाल हम एक नए गणतंत्र हैं जहाँ हर तरह के क़ानून है, पर्सनल लॉ हैं, इसीलिए आने वाले समय में पूरे देश के लोग एक ही तरह के क़ानून को मानें।

अर्थ यह कि हर महिला, पुरुष, तीसरे लिंग के लोगों, बच्चे, बूढ़े आदि को, चाहे वो किसी भी धर्म-संप्रदाय से ताल्लुक़ रखते हो, क़ानून की नज़र में एक ही तरह से देखे जाएँ। हिन्दू महिलाओं को अपने पिता की संपत्ति पर अपने भाइयों के बराबर का हक़ हो। महिला विरोधी तीन बार तलाक़ को कोई मुसलमान क़ुरान की आड़ में लेकर दुरुपयोग ना करे। इसी तरह तलाक़ के सिलसिले में हर धर्म की महिला को वही छूट मिले जो पुरुषों को हैं।

कुछ क़ानून महिला-विरोधी हैं जो कि एक सभ्य समाज में नहीं होने चाहिए। आजकल ट्रिपल तलाक़ पर बहस हो रही है जिसके बारे में जानकार कहते हैं कि क़ुरान में ऐसा है। मुझे नहीं लगता कि फोन पर, मैसेज में, ग़ुस्से में, नींद में, सब्ज़ी जल जाने पर कोई ‘तलाक़, तलाक़, तलाक़’ बोल दे तो वो क़ुरान-संगत हो गया। जी नहीं।

जो इस महिला-विरोधी कुप्रथा की नुमाइंदगी कर रहे हैं क्या वो ये सुनिश्चित करते हैं कि हर मुस्लिम औरत को तलाक़ उसी लंबे तरीक़े से मिलता है, उतने ही समय के अंतराल के साथ, उसी तरह से, जैसा कि क़ुरान में लिखा है? मुझे तो ऐसा नहीं लगता वरना भारत की नब्बे प्रतिशत मुस्लिम महिलाएँ इसका विरोध नहीं करतीं।

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पहले मैंने जब इस पर लिखा का तो कुछ लोग मुझे ये बताने आ गए कि मैं हिन्दू हूँ और मुझे पहले क़ुरान, हदीथ, क़यास आदि पढ़ना चाहिए ताकि मैं इस्लाम को समझूँ। पूछने वाले सारे मर्द थे। मेरा उत्तर ये है कि अगर मैं हिन्दू होकर इस्लाम पर नहीं लिख सकता तो आप पुरुष होकर महिलाओं की बात क्यों कर रहे हैं? बात ये है कि मुझे 2016 के इस समाज में औरतों की स्थिति के बारे में लिखने के लिए चौदह सौ साल पहले लिखी किताब पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। आज उसका कौन सा रूप दिखता है, मुझे उसमें ज्यादा रूचि है। कौन है जो उस किताब को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर उस जगह पर ला दिया है कि औरतों की हालत ये हो गई है?

क्या एक औरत को बिना उसकी बात सुने फोन पर तीन बार ‘तलाक़’ कहकर छोड़ देना इस्लाम को चलाने वाले अल्लाह या उनके पैगंबरों को गँवारा है? क्या पैग़म्बर ये चाहेगा कि उसके मानने वाले अपनी औरतों को दबाते-कुचलते रहें? अगर हाँ तो औरतों को ऐसे पैगम्बरों और ऐसे धर्म को, चाहे वो हिन्दू, ईसाई, इस्लाम कुछ भी हो, मानना छोड़ देना चाहिए।

पर्सनल लॉ रीति-रिवाज के लिए होने चाहिए कि शादी कैसे हो, बच्चे के जन्म पर उसके सर पर टीका लगाएँ कि नहीं, बारात का मुहूर्त क्या हो, शादी मंदिर में हो या मस्जिद में। पर्सनल लॉ का दायरा इससे बड़ा नहीं होना चाहिए। जब हमारा संविधान हर नागरिक को समान मानता है तो फिर एक हिन्दू के अधिकार मुसलमान से अलग कैसे हैं?

कल को चोरी और बलात्कार के लिए भी सब लोग अपने अपने पर्सनल लॉ बना लें? मुसलमान चोर को हिन्दू चोर से अलग सज़ा मिले। जाकर पढिए पर्सनल लॉ और देखिए कि तलाक़ के लिए मुसलमान औरतों का दायरा क्या है, या है भी कि नहीं?

खुद पर लेकर देखिए कि क्या आपकी बहन, माँ या बेटी को उसका पति दाल में नमक ज्यादा होने पर तीन बार तलाक़ दे दे, तो आपको कैसा लगेगा। आपको तब कैसा लगेगा जब इसकी पंचायत हो और आपके धर्म के सारे पुरुष मिलकर उसे सही ठहराएँ कि तीन बार बोल दिया तो हो गया।

ये दलील मत दीजिए कि सिर्फ कहने से नहीं होता, उसके लिए इतना समय लगता है, ये होता है, वो होता है… क्योंकि वैसा नहीं होता। और दिक़्क़त क्या है कि कोर्ट में फ़ैसला हो? कोर्ट में कभी नहीं सुना कि तलाक़ के मामले में कुछ गलत फ़ैसला दे दिया हो। कोर्ट जब है ही तो फिर चार पुरुष मिलकर एक स्त्री की जिंदगी का फ़ैसला क्यों करेंगे? अगर वो सही फ़ैसला करते तो 93% मुस्लिम महिलाएँ इस ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ नहीं होतीं।

2015 में हुए दस राज्यों की मुस्लिम महिलाओं पर किए गए सर्वे के अनुसार 88% महिलाएँ ट्रिपल तलाक़ की जगह कोर्ट वाले तलाक़ चाहती हैं। 92% का कहना था कि वो बहुपत्नी प्रथा के ख़िलाफ़ हैं। 78% महिलाओं ने माना कि तलाक़ के मामले में उनकी बातों का कोई महत्व नहीं।

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जनगणना के आँकड़ों के हिसाब से सिर्फ 1% मुस्लिम महिला ग्रेजुएट है, 37% को सिर्फ किसी भी तरह की स्कूली शिक्षा मिली और साक्षरता दर 50% है जबकि मर्दों के लिए वो 68% है। मुस्लिम महिलाओं के लिए सारे सामाजिक सूचकांक देश की महिलाओं से नीचे हैं। जबकि मुस्लिम आबादी देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है।

अब मुस्लिम बोर्ड अपना एक सर्वे लेकर आ गया है जो कहता है नब्बे प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक़ से कोई आपत्ति नहीं है। अगर ये सर्वे सच है और आज की मुस्लिम महिलाओं को इससे दिक़्क़त नहीं है तो शायद वो अपनी हालत की ज़िम्मेदार खुद हैं। उन्हें अपने पुरुषों द्वारा सुनाए गए हर फ़ैसले को, जिसमें तलाक़ से लेकर बाल विवाह, बच्चे की कस्टडी, चार पत्नियाँ रखने आदि को सही मानकर अपनी ज़िंदगी काटनी चाहिए।….

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