प्रसून जोशी-मोदी इंटरव्यू: इंटरव्यू लेते वक़्त मीडिया वाले क्यों नहीं चिल्लाते

पिछली बार भी मोदी के इंटरव्यू पर अर्णब पर बहुत सारे सवाल उठे थे कि वो मोदी को ज़लील नहीं कर रहा था, उसने दंगों के बारे में नहीं पूछा… कुछ लोगों की इच्छा होती है कि इंटरव्यू लेते लेते थप्पड़ मार दे मीडिया वाला। फिर Network18 के एडिटर राहुल जोशी पर आरोप लगे कि वो इतना शांत था, मानो उसे धमकाया गया हो। उसने ये नहीं पूछा, वो नहीं पूछा आदि आदि।

राजदीप ने सोनिया का इंटरव्यू लिया था तो वो भी बहुत ही शालीन तरीक़े से सवाल पूछ रहा था। अर्णब ने राहुल गाँधी का भी इंटरव्यू वैसे ही सभ्य तरीक़े से किया था। राजदीप वाले पर मैंने सवाल उठाए थे क्योंकि राजदीप ने अर्णब वाले मोदी के इंटरव्यू पर उसे घेरा था कि वो बहुत सॉफ़्ट था आदि।

आज ट्रेंड में प्रसून जोशी हैं कि वो चाटुकारिता कर रहे थे आदि।

चलिए, आपके कुछ सवालों का जवाब दे देता हूँ। पत्रकारिता का लेक्चरर रहा हूँ और विद्यार्थी भी। और एडिटर भी हूँ आठ सालों से तरह तरह के मीडिया संस्थानों में।

पहली बात तो ये है कि एक डिबेट, पैनल डिस्कशन, प्रेस कॉन्फ़्रेंस, प्रेस ब्रीफ़ और इंटरव्यू में अंतर होता है। डिबेट में आप लाइव होते हैं, आपको ये नहीं पता कि सामने वाला क्या बोलेगा। एंकर उसको मॉडरेट करता है, और अपने सवाल भी पूछता है। उस पर टीआरपी का प्रेशर होता है तो वो चिल्लाता भी है। ये लगभग एक इन्फॉर्मल बात होती है।

पैनल डिस्कशन में आपको सिर्फ़ ये पता होता है कि कौन कौन आएँगे, और टॉपिक क्या है। सवालों का दायरा क्या होगा ये भी बता दिया जाता है। एक ही सवाल सब से पूछा जाता है। बीच में कोई पैनलिस्ट दूसरे को सवाल पूछ भी सकता है, और टिप्पणी भी कर सकता है। यहाँ पर अगर बड़े स्तर का डिस्कशन हो तो मोटे तौर पर हर पैनलिस्ट को किस तरह के सवाल आएँगे इसकी जानकारी दे दी जाती है। इन्हें ये भी बता दिया जाता है कि क्या नियम हैं, किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी या आक्षेप एक दायरे में ही करना होता है। इन फैक्ट, नहीं करें तो बेहतर है। जबकि डिबेट में ये सब ख़ूब चलता है।

प्रेस कॉन्फ़्रेंस दो तरह की होती है। एक तो रोज़मर्रा वाली जो आप मैच के बाद देखते हैं। ये उतनी सीरियस नहीं होती। इसमें एक आदमी जो मीडिया मैनेजर टाइप का होता है, वो पत्रकारों को चुनता है कि कौन सवाल पूछेगा। अगर सवाल विषय से बाहर का है तो उसे बिठा भी दिया जा सकता है। दूसरी तरह के प्रेस कॉन्फ़्रेंस के कुछ नियम होते हैं। अगर उसमें महत्वपूर्ण मंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हों तो आपको पहले ही अपने सवाल देने होते हैं। मीडिया मैनेजर उन सवालों को देखता है, ज़रूरत हो तो उसकी शैली बदल सकता है, या आपको मना कर सकता है। इसमें आप अपनी इच्छा से सवाल नहीं कर सकते।

एक प्रेस ब्रीफ़ भी होती है। इसमें पत्रकार आमतौर पर सवाल नहीं पूछ सकते। आपको जानकारी दे दी जाती है कि ये बात हो गई, या सरकार इस पर ये कर रही है आदि आदि।

अब आइए इंटरव्यू पर। इंटरव्यू जिसका भी आप लेने वाले हैं, पहले तो उसकी सहमति होनी चाहिए। दूसरी बात आपको एक प्रीइंटरव्यू के तौर पर सारे सवाल अपने सामने वाले को बताने होते हैं। ये उसकी इच्छा है कि वो किस सवाल की आपको अनुमति दे, किसकी नहीं।

ख़ासकर ऐसे मौक़ों पर जिसमें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, वित्तमंत्री आदि हों, तो उनके सचिव और कार्यालय के ऊपर होता है कि सारे प्रश्नों को देखें, छाँटे, संपादित करें। फिर वो इंटरव्यू लेने वाले के पास भेजा जाता है। अगर वो इनके कार्यालय द्वारा भेजे गए लिस्ट से सहमत है तो इंटरव्यू का दिन और समय आदि तय करता है।

इतनी तैयारी दो बातों के लिए होती है। पहली ये कि हर पद की एक गरिमा होती है। रैली करते राजनेता और देश के प्रधानमंत्री में अंतर होता है। इसीलिए आप उसे पार्टी का नेता मानकर अपने हिसाब से कुछ भी पूछने को स्वतंत्र नहीं होते। दूसरी बात ये है कि अगर पहले बताया ना जाय तो एक घंटे चलने वाले इंटरव्यू में बोलने के लिए आँकड़े हर वक़्त आपके पास नहीं होते।

उसमें भी तब जब आपके पीछे इंटरनेट का सर्च इंजन खोले लोग बैठे हों कि यहाँ प्रधानमंत्री गलत बोल गए। फिर आप ये बोलोगे कि देश का प्रधानमंत्री गलत कैसे बोल सकता है।

जहाँ तक इंटरव्यू करने वाले की बात है तो वो भी, चाहे सामने कोई भी क्यों ना हो, शालीनता के दायरे से बाहर नहीं आ सकता। ये उसके प्रोफ़ेशनल एथिक्स का हिस्सा है। यही कारण है कि वहीं एंकर जो आपको एक प्रोग्राम में चिल्लाता नज़र आता है, दूसरी जगह शांत होता है। जब दो लोग ही बात कर रहे हों, तो चिल्लाने की ज़रूरत वैसे भी नहीं होती।

डिबेट करने के लिए प्रवक्ता होते हैं। जो कि आपको हर दिन दिख जाएँगे। मेरे हिसाब से आम जनता को इसकी जानकारी होनी चाहिए।

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