प्राइम टाइम: बाढ़ आती है तो आए, लेकिन सरकारों को फ़र्क़ क्यों नहीं पड़ता?

नमस्कार
मैं बाढ़ में टीआरपी एंगल तलाशता पत्रकार

बाढ़ आ गई। बाढ़ आ जाती है। बाढ़ चली जाती है। बाढ़ को भारत की जनता ने ऐसे ही स्वीकार लिया है मानो ये किसी मुनि का श्राप हो कि ये तो दे दिया गया है तो होकर ही रहेगा। श्राप से तो कर्ण नहीं बच पाया था, फिर हम तो आम लोग हैं। नदियाँ हैं, उसमें बाढ़ आती है, घर डूबते हैं, लोग मरते हैं। लोग मरते भी तरह-तरह से हैं। एक विडियो देखा होगा आप ने जिसमें जान बचाने के लिए सड़क पर दौड़ती महिला अपनी बिटिया के साथ गिर कर बह गई।

ईमोशन वाले पक्ष को हटा देते हैं। क्योंकि इमोशनल बातें हर जगह हैं, प्राकृतिक भी है कि ऐसी विपदा है तो लोग लिखेंगे ही कि ये हो क्या रहा है। केले के तनों पर अपना अनाज बचाते हुए, एक आदमी गर्दन तक डूबा हुआ, लकड़ी के टुकड़े से बाढ़ के पानी को काटता आगे बढ़ता है। हम उसे जीवट बिहारी कह देते हैं। मुंबई बम ब्लास्ट में दो सौ मर जाते हैं, अगले दिन सब जॉब पर निकलते हैं, हम कहते हैं कि मुंबईया स्पिरिट है। तुम आदमी मार सकते हो, हमारी जीवटता नहीं।

ये जीवटता नहीं है। ये मजबूरी है कि हमें ऐसे ही जीना पड़ता है। ये मजबूरी दूर हो सकती है लेकिन की नहीं जाती। सीरिया वाले ऐसी जीवटता की बात नहीं कर पाते। मुंबई में भी हर दिन बम गिरे तो जीवटता ख़त्म हो जाएगी। लेकिन हर नौ महीने बाद आई बाढ़ हमें भूलने का समय दे देती है। हम भूल जाते हैं कि ये तो पिछले साल भी आई थी, और उसके पिछले साल भी। बदलता सिर्फ ये है कि फ़लाना विभाग हमें बता देता है कि इस बार की बाढ़ कितने सालों में आई सबसे भयावह बाढ़ है।

किसी ने बताया कि बाढ़ के लिए जो राहत कोष से सहायता राशि निकलती है उसके ख़र्च का कोई ऑडिट नहीं होता। फिर तो बाढ़ एक व्यवसाय है बहुतों के लिए। जब तक सामने कोई तड़प कर डूब नहीं रहा, कोई संवेदनशील क्यों होगा? वो तो ये मानकर चल रहा है कि बाढ़ में तो लोग मरते ही हैं। उसके लिए तो 119, 159 का मरना हो, या कि सतहत्तर लाख का बेघर होना हो, महज़ एक संख्या है। संख्या ही है मेरे लिए भी, लेकिन मैं चंदा देने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता। मेरी नानी के घर में सात फ़ीट पानी चढ़ जाता है, और वो अपनी दो बहुओं को लेकर, चार छोटे बच्चों के साथ छत पर उन्हें बार-बार चने देती है खाने को, और मेरा पाँच साल का ममेरा भाई तंग आकर पूछता है कि हरदम चना ही क्यों?

जिनके हाथ में हजार करोड़ होता है, वो हर साल वैसे हजार करोड़ देखते हैं। उनके घरों की नींव मज़बूत होती जाती है। लेकिन तटबंध नहीं बनता। नहर बनाकर पानी को कहीं और मोड़ने की जुगत कोई नहीं भिड़ाता। बाँध बनाकर पानी को थामने की कोशिश नहीं होती। बाढ़ ना तो काँग्रेस ने बनाई, ना ही अंग्रेज़ों ने हमें परेशान करने के लिए पाकिस्तान बनाकर दे दिया कि लड़ते रहो। ये तो तुम्हारी सबसे पहली प्राथमिकता होनी थी! सत्तर साल हो गए और बाढ़ पर एक प्रधानमंत्री सिर्फ चिंता कर पा रहा है?

असम के बाढ़ की तो चिंता कोई करता भी नहीं। मणिपुर की बाढ़ का आपको पता भी नहीं चलता। पच्चीस से तीस लाख लोग और हजारों जानवर हर साल गायब होते हैं, फिर बाढ़ के बाद वापस आ जाते हैं। जी! गायब ही तो होते हैं, क्योंकि किसी को पता भी नहीं होता कि वो कहाँ हैं। दिल्ली ही देश है, हम सबके लिए। तीस बच्चों की मौत पर संवेदना, लाखों बेघर और हर दिन तीस वयस्कों के मरने पर कोई संवेदना नहीं? क्यों? क्या इन सरकारों को गरियाने के लिए भी तुम्हारे पास शब्द नहीं हैं? या ट्रेंड होने का इंतज़ार हो रहा है?

गोरखपुर के माँ की गोद में नाक में ऑक्सिजन पाइप लगा मृत बच्चा देखा ना? नेपाल के एक बाप को अपने वैसे ही छोटे बच्चे को नदी में बहाते भी देखा होगा। उसके पास उसे मिट्टी में गाड़ने के लिए जगह भी नहीं थी, ना ही घड़ा था कि गले में बाँध दे कि वो हिन्दू रिवाज से जलसमाधि ले। मौत भी नसीब नहीं होती उन्हें जो बाढ़ में बह जाते हैं। ऐसे कई बाप होंगे बिहार, असम की बाढ़ में।

ये इमोशनल अपील नहीं है। ये क्या है, मैं नहीं जानता। मैं दिल्ली में हूँ। मेरे जान पहचान के लोग बाढ़ राहत के लिए लगातार अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। मुझसे वो भी नहीं हो सकता। मैं बिना बाढ़ के विस्थापित लोगों की पीढ़ी से हूँ। मेरा अपना कोई घर नहीं है। मेरी माँ है, पिता हैं। वहीं घर है, क्योंकि वो वहाँ हैं। मैं किसी के लिए कुछ नहीं कर सकता।

मैं धन्यवाद देता हूँ उन्हें जो लगातार काम कर रहे हैं। बाढ़ पर प्रधानमंत्री के ट्वीट और भाषण में एक लाइन के मेंशन की ज़रूरत नहीं है। वो ट्वीट करें, ना करें, लेकिन उनकी टीम इंडिया की मीटिंग में सबसे बुनियादी सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब उड़ीसा के चक्रवाती तूफ़ान में, तीन सौ किलोमीटर की तेज़ी से चलती हवा और बारिश से हम चुस्त होकर सिर्फ एक जान जाने देते हैं, तो क्या सत्तर साल में बाढ़ का कोई उपाय नहीं? क्या इसके लिए कहीं कोई तकनीक नहीं?

मेरे पास कोई जवाब नहीं है। समाधान भी नहीं है क्योंकि मैं इसका एक्सपर्ट नहीं हूँ। मैं सिर्फ ये जानता हूँ कि बाढ़ अमेरिका में भी आती है, लेकिन लोग नहीं मरते। उनको पता होता है कि आने वाला है, और वो एक कुत्ता तक मरने नहीं देते, अगर चाह लें तो। हमारे पास चक्रवात से लड़ने का तरीक़ा है, बाढ़ का नहीं?

मीडिया से अपेक्षा मत रखिए। इस बात पर सर मत फोड़िए कि ट्वीट क्यों नहीं आया। इससे कुछ नहीं होता। ट्रेंड कर जाए, कोई महान एंकर प्राइम टाइम कर दे पर उससे होगा क्या? सब लोग इस पर बात करने लगेंगे? वो तो कर ही रहे हैं। सबको पता है कि समस्या क्या है। समस्या बताने का समय नहीं है, समाधान क्या है? हर साल क्यों?

तैयारी क्यों नहीं है? बाढ़ आती है तो आए, जानें क्यों ले जाती है?

नमस्कार!

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