प्राइम टाइम: रवीश बाबू, करना तो आपको भी पत्रकारिता चाहिए लेकिन…

नमस्कार,

मैं खलिहर पत्रकार!
हें हें हें… राइमिंग में बोल गए ये तो!

पत्रकारिता के खोखले स्तम्भ रवीश कुमार जो मुझसे पहले पैदा होकर लहरिया लूट रहे हैं, उन्होंने अपने ख़ालीपन में एक लेख लिखा है। चूँकि वो पत्रकारिता के युवा छात्रों के आदर्श हैं तो इसी कारण वो दिशा देने के लिए कुछ न कुछ लिखते रहते हैं। कुछ न कुछ लिखने का मतलब ये होता है कि आदमी बिजी रहे, नहीं तो बिहार में एक कहावत है बिजी विदाउट बिजनेस, तो वो हो जाएँगे!

लेख में बिना सर-पैर के उन्होंने प्रेस क्लब के चुनाव में प्रधानमंत्री जी को रोड शो करने की दावत दे दी है। जबकि ये बात उनको अच्छे से पता है कि इस पर संवैधानिक पाबंदी नहीं है कि वो वहाँ रोड शो न करें। जब इन्हीं का चैनल, मतलब इनके मालिक का जिन पर पैसों के हेरफेर का आरोप है, जिसके कारण बराबर इनको आपातकाल दिखता है, वही चैनल किसी क्लास के मॉनिटर के चुनाव में भी काँग्रेस वाले के भतीजे के द्वारा भाजपाई के साढूबेटे की हार को भी जनता द्वारा प्रधानमंत्री को दिया गया रेफरेंडम कहकर दिन भर झाँव-झाँव करते हैं, तो फिर प्रेस क्लब में, मान लीजिए कि भाजपा का कोई प्रत्याशी है तो वो क्यों न रोड शो कर लें?

रवीश बाबू का पूरा करियर पॉलिटिक्स को कवर करने में बीता है। फिर उन्होंने 2014 के बैसाख में रूद्राक्ष की एक माला बनवा ली थी जिसमें उन्होंने थ्रीडी प्रिंटिंग के ज़रिए ‘मोदी-मोदी’ हर दाने पर लिखवाया था। सूत्र बताते हैं कि वो दिन में जितनी बार माला फेरते है, उतनी बार मोदी के नाम की आर्टिकल लिख देते हैं। हमारे भी सूत्र हैं भाई! हें हें हें! ऐसे थोड़े ही है!

जिस पत्रकार ने राजनीति की रिपोर्टिंग से करियर बनाया है वो ये समझ सकता है कि गुजरात जैसे राज्य, जिसके मॉडल को जाँचने आला लेकर रवीश बाबू जाते रहते हैं, वहाँ भाजपा की जीत के क्या मायने हैं। न ही ऐसा है कि प्रधानमंत्रियों ने आजतक किसी राज्य चुनाव की कैम्पेनिंग नहीं की हो! नहीं बोलने वाले मनमोहन तक रैली में जाकर बुदबुदाते रहे हैं, डी फक्टो पीएम सोनिया जी रैलियों में लगातार जाती रही हैं, लेकिन मोदी और उसके मंत्रियों के जाने पर आपत्ति है!

आख़िर भाजपा या मोदी कैम्पेनिंग में न जाए? एक लाइन ये भी लिखा है कि बूथ मैनेज कर रहे हैं मोदी! अरे भाई, तो बाक़ियों को बूथ मैनेज करने से किसी ने रोका है? या बूथ के स्तर तक जाकर लोगों से बात करना, अपना अजेंडा बताना सीआरपीसी की किसी धारा के अनुसार गलत या असंवैधानिक है?

फिर आप कहेंगे कि देश कैसे चलेगा! देश में तो विपक्ष की भी भूमिका होती है। फिर सबसे बड़े विपक्ष के तारणहार क्या गुजरात में गुँइया छील रहे हैं? उनको भी तो मोदी के साथ दिल्ली में रहकर सवाल पूछने चाहिए कि देश में क्या चल रहा है और आप कहाँ हैं मोदी जी?

जब लॉजिक देश चलाने पर आ गया है तो हर सांसद और विधायक को अपने क्षेत्र में होना चाहिए। गुजरात में सिर्फ गुजरात के विधायक ही कैम्पेनिंग कर सकते हैं, ऐसा नियम होना चाहिए। फिर तो पत्रकार को सिर्फ पत्रकारिता ही करनी चाहिए न कि विपक्ष के लिए पत्रकारिता की चादर ओढ़कर कैम्पेनिंग! अपनी घृणा के लिए लॉजिक फ़टाक से मिल जाता है, लेकिन सामने से बेहतर तर्क वाले लोग भी हैं। राहुल गाँधी के अमेठी का क्या हाल है, उस पर जाकर रिपोर्टिंग कीजिए और पूछिए कि वो गुजरात में सोना बनाने की बजाय, अमेठी में क्यों नहीं हैं?

लेकिन नहीं! सारी मोरेलिटी, एथिक्स और क्यूट-क्यूट एक्सपेक्टेशन मोदी ही पूरी करेंगे। ताकि वो गुजरात हारें, और मूर्धन्य एंकरश्रेष्ठ चौवनिया मुस्कान लेकर हें हें हें करते हुए प्राइम टाइम में ये कहें:

“नमस्कार, मैं रवीश कुमार! गुजरात की जनता ने अपने ही बेटे को नकार दिया! भला मोदी पर क्या बीत रही होगी ये तो मैं नहीं जानता, लेकिन मैं ये जरूर जानता हूँ कि प्रधानमंत्री की पार्टी के, राष्ट्रवाद की लहर के बावजूद मिले हार की तस्वीर से हजार बातें निकल कर आती हैं। आखिर क्या भूल हुई जो जनता ये समझ नहीं पाई कि भाजपा विकास चाहती है। विकास तो मैं भी चाहता हूँ, लेकिन मुझे भी नहीं दिखा। लगता है कि विकास गुजरात मॉडल से भाग गया और उन्हें राहुल गाँधी का युवा जोश भा गया।”

ये आलोचना नहीं है, इसको चिरकुटई कहते हैं। ये खाली बैठे हुए मोदी के नाम की माला फेरने पर उपजा हुआ आर्टिकल है। आपको विकास भी चाहिए, और फिर ये भी राज्यसभा में भाजपा बहुमत में न आए ताकि आपके मालिक जिसकी गोदी में खेलते हैं, वो पार्टी बिल पास न होने दे।

पूरी आर्टिकल बकवास है। ये मैं एक लाइन में भी कह सकता हूँ, लेकिन बेहतर ये होता है कि बताया जाय कि बकवास क्यों है। प्रधानमंत्री को मणिपुर में भी कैम्पेनिंग करनी चाहिए, और तमिलनाडु में भी। क्योंकि प्रजातंत्र का यही ढाँचा है। जब साथ बैठकर पास किए जीएसटी पर कॉन्ग्रेस गुजरात में हल्ला कर रही है कि ये सही नहीं है, तब तो राज्यसभा में संख्या का बहुत महत्व है ही।

बाकी की छेड़छाड़, घोटालेबाज़ी, सामाजिक वैमनस्यता, आर्थिक पिछड़ापन, खस्ताहाल स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढाँचों में लगती जंग आदि को सुधारने के लिए सरकार को जिस हद तक की संख्या चाहिए, और वो रास्ते जब तक कानून और संविधान के दायरे में हैं, तो उन्हें आज़माने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री दिल्ली में क्यों नहीं है, वाहियात सवाल है। वो इसलिए कि तंत्र अपने हिसाब से चलता रहता है, और आज के दौर में कम्युनिकेट करना कबूतरों के ज़रिए नहीं होता कि प्रधानमंत्री की ज़रूरत होगी तो पता चलेगा कि बैलगाड़ी पर बैठे हैं, सात दिन में दिल्ली पहुँचेंगे।

मेरा तो ये सवाल होता है कि प्रधानमंत्री दिल्ली में ही क्यों रहते हैं? उनको तो हर जगह होना चाहिए। हर प्रधानमंत्री को दिल्ली से बाहर जाकर देखते रहना चाहिए कि क्या चल रहा है। क्या वो दिल्ली के पीएम हैं, या पूरे देश के। ये सवाल आप कहेंगे कि बकवास है तो मेरा जवाब ये है कि पिछला सवाल भी उतना ही बकवास था।

बहरहाल, हर पार्टी को एब्सॉल्यूट मेजोरिटी पाने का प्रयत्न करना चाहिए। और हर विपक्ष को उसे ऐसा करने से रोकने के लिए बेहतर अजेंडे के साथ लोगों तक, घर-घर, जाना चाहिए। जब विपक्ष आलू डाल कर सोना निकालने में व्यस्त हो, और मीडिया सेलेक्टिव रिटेंशन की थ्योरी से चलते हुए, टीआरपी वाले मुद्दे पर या विपक्ष की कैम्पेनिंग करने में जुटा रहे, तब उन दोनों को ही सत्ताधारियों पर कटाक्ष करने का हक़ नहीं होता।

ऐसे लोग बोल सकते हैं, लेकिन अपनी ज़मीन तलाशने के बाद ही। रवीश कुमार की ज़मीन वैसी ही है। पत्रकार से आदमी वैयक्तिक घृणा और मालिक के अजेंडे को जीभ से चमकाता हुआ कब चिरकुट पत्रकार बन जाता है, उसका बहुत अच्छा उदाहरण रवीश कुमार हैं। लेकिन बीच-बीच में बढ़िया कार्यक्रम भी कर देते हैं, जिसके लिए मैं उनकी सराहना भी करता हूँ। हें हें हें!

नमस्कार!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *