प्राइम टाइम: रवीश जी, वीकेंड का मुद्दा सोमवार का इंतजार नहीं करता!

नमस्कार!
मैं वीकेंड से लौटा लेट रिएक्शन देने वाला पत्रकार।

रवीश बाबू लेट हो गए इस मुद्दे पर क्योंकि बीच में शनिवार और रविवार आ गया था। प्राइम टाइम ठीक-ठाक था, लेकिन लगा कि बस सबकुछ रिपीट हो रहा है, और पुराना हो गया है। ख़ैर, सोशल मीडिया ने उनकी (यानि मीडिया के साप्ताहिक अवकाश की) कमी पूरी कर दी और लगातार लाइव रिपोर्टिंग हुई। लोगों ने लिखा। उन्होंने भी लिखा जो कभी लिखते नहीं थे।

मैं जब पत्रकारिता की शिक्षा ले रहा था तो हमारे डायरेक्टर अम्बरीश सक्सेना हमेशा कहते थे कि ये ‘ट्वन्टी फ़ोर सेवन’ जॉब है। ख़ैर, वो तो एक आदर्श स्थिति की बात है। ऐसा होता थोड़े है! आई मीन, लोग क्लेम करते हैं कि वो पत्रकारिता को ढोते हुए चल रहे हैं और टीवी पर प्राइम टाइम में कोर्ट पहन कर आने वाले एंकर (उनको छोड़कर बाकी वाले) जनता को बरगलाते हैं, आदर्श तो बस वही हैं।

वो ऐसा कहते नहीं, फ़ील कराते हैं। आपको लगेगा कि असली पत्रकार तो यही है। लेकिन इस घटना को, जो कि राष्ट्रीय स्तर की ख़बर बनी, और दो दिन तक फेसबुक पर अतिसंवेदनशील माहौल था, इसके लिए वीकेंड आ गया बीच में! घटनाक्रम हर घंटे बदलता रहा, और पत्रकारों की जमात, जिनसे कोई डिबेट शुरु होता, छुट्टी पर थी। यानि कि इस देश में शनिवार और रविवार को होने वाले मुद्दे आदर्श पत्रकार सोमवार तक टाल सकते हैं। क्यों? मुझे नहीं पता।

आज तो सब ख़त्म हो गया! आज तो बस चार लड़कियाँ बची हैं जिन्हें वीसी त्रिपाठी की तर्ज़ पर कॉलेज के ही बच्चे कह रहे हैं कि एनडीटीवी वाले कार में भरकर ले गए, निकाला और इधर-उधर बैठा दिया, फिर उन्हीं से पूछ लिया और चलते बने! मतलब इनको लड़कियों पर विश्वास नहीं था कि वो अपनी बात इनके चैनल के पत्रकार को बताएँगी?

और ये जो त्रिपाठी है, ये भाजपा के लिए वैसा ही अनुभव होगा जैसा गजेन्द्र चौहान और पहलाज निहलानी का रहा है। आपके पास प्रसून जोशी थे, नामी फ़िल्मी हस्तियाँ थीं जिनकी पब्लिक एक्सेप्टेन्स है और उनका पूरा काम भी, लेकिन आपको ‘खड़ा है, खड़ा है, खड़ा है’ ही मिला। विश्वविद्यालयों के वीसी के लिए क्या भाजपा के पास कोई उस स्तर का एकेडमिशियन नहीं है?

क्या साफ-सुथरी छवि वाले लोग, जो वामपंथी कैंसर से ग्रस्त न हों, नहीं बचे इस देश में? वामपंथियों के घटियापन को काटने के लिए त्रिपाठी के दर्जे का दक्षिणपंथी विकल्प! कम से कम ऐसे को तो बनाओ जो पहले की घटिया व्यवस्था को सुधारे। बेहतर राष्ट्र का सपना क्या निहलानियों और त्रिपाठियों के बल पर पूरा होगा?

आईआईटी से इंजीनियर निकाल कर बहुत काम हो जाएँगे, लेकिन जब तक तुम्हारे पास समाज को लेकर संवेदनशील चिंतक महत्वपूर्ण पदों पर नहीं जाएँगे, समाज बर्बाद होता रहेगा। ये बात सच है कि लड़कियों की सुरक्षा का समस्या एक हॉस्टल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी या राज्य से परे है। ये एक विश्वव्यापी समस्या है। इसका निदान कैम्पस में पुलिस छोड़कर नहीं है। कैम्पस में पुलिस की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

वहाँ लोग पढ़ाई करने गए हैं कि बम बनाने? क्या वो माँगें, जो लड़कियों ने रखी थीं, इतनी क्लिष्ट थीं कि उसको डिसाइफर करने में वीसी को तीन दिन लग गए और वो फिर भी आश्वासन तक न दे सका? हॉस्टल में पुलिस किस कानून की किताब के किस धारा के अंतर्गत घुसी? क्या सात बजे के बाद किसी लड़की को कोई भी पुलिस हाथ लगा सकती है? क्या उसके हॉस्टल में पुरुषों को किसी भी वक़्त घुसने की अनुमति है पुलिस कोड में? मेरे हिसाब से तो नहीं है।

सोमवार को मुद्दा इतना शांत हो गया है कि अब इस पर कोई बात ही नहीं कर रहा। रवीश जी प्राइम टाइम कर रहे हैं, क्योंकि वीकेंड में ये दुर्घटना और घटना हुई। मुझे यही सब देखकर उनकी प्रतिबद्धता पर संदेह होता है। क्या शनिवार को प्राइम टाइम कर देते तो नुक़सान हो जाता? टीवी की प्रोग्रामिंग देखी है शनिवार और रविवार की? बस खानापूर्ति ही होती है। उसमें से क्या शिफ़्ट होकर ये आवाज़ नहीं लगा सकते थे?

ख़ैर, पत्रकारिता के स्तम्भ हैं, इनको क्या कहा जाय। ये जब ही करें, वही ठीक है। लेकिन बात वही है कि मुद्दा पुराना हो गया। इसका अब कोई असर नहीं। वैसे ही जैसे मोदी जी की डाँट घटना के तीन महीने बाद पड़ती है।

पत्रकारों को रवैया बदलना होगा। कम से कम उन्हें जो खुद को स्वतः एक हायर पैडेस्टल पर देखते हैं और दूसरों की खिल्ली उड़ाते हैं। अब बीएचयू में छुट्टी हो गई है। त्रिपाठी जी की कॉन्सपिरेसी थ्योरी के तहत ‘बाहर के लोग’ आकर हिंसक हो गए, तो उन्हें लाठीचार्ज आदि कराना पड़ा। ऐसा है त्रिपाठी जी कि आपने जिस सुबह ये सब हुआ उसी सुबह कह दिया होता कि इसकी जाँच होगी और लड़कियों की सारी माँगे मान ली जाएँगी, या उस पर विचार होगा, तो भी ये सब टल जाता।

बाकी, सोशल मीडिया और नेताओं का क्या है, इसमें नए रेटोरिक सुनने को मिलेंगे। ,नवरात्रि में दुर्गा समान बेटियों पर डाँडिया की जगह डंडे चले’, ‘कन्या पूजन करते हो और लाठी मारते हो’, ‘सुरक्षा के लिए आवाज़ उठाई और मिली लाठी’… ये जुमलेबाजी भर है। ये सब होता है, और फिर लोग बेहतर शब्दों की कमी के कारण इसे साहित्यिक बनाने की कोशिश में बर्बाद कर देते हैं।

लोगों को पता ही नहीं होता कि बेवजह के शब्द डालकर आप पूरी बात को महज़ नारे में समेट देते हैं। और नारों को कोई भी सीरियसली नहीं लेता। लगता है कि ये भी नारेबाज़ी ही है। कुछ भी क्रेडिबल नहीं बोलना है, बस वन लाइनर मारते रहिए कि ये नवरात्रि है, कन्या पूजन, दिस-दैट! सोचिए जरा कि इसमें किसी भी बात का कोई मतलब है? या आप सिर्फ ड्रेमैटिक इफ़ेक्ट के लिए ये लिख देते हैं? और जब आप ऐसे शब्द चुनते हैं तो मामले से मुख्य मुद्दा खिसक कर बाहर चला जाता है, आपका टार्गेट ही गुम हो जाता है।

किसको नहीं पता कि लड़कियों की स्थिति कैसी है? कौन नहीं जानता? आपके बार-बार दुर्गा और नवरात्रि करने से क्या होगा? ये बातें आप किसी भी दिन बोल सकते हैं और वो सही है। जो आदमी कन्या पूजन के लिए लड़कियों को बुलाता है वही लाठी मार रहा है? क्या सारे लोग यही कर रहे हैं? ये कौन सा लाइन ऑफ थॉट है आप लोगों का?

यही कारण है कि आपकी बातों को कोई नहीं सुनता। फिर ये मामला शिफ़्ट होकर हिन्दुओं को बदनाम करने का हो जाता है क्योंकि लोग तो बैठे हैं ये मतलब निकालने के लिए, आपने उनको दे दिया। आप लोग तो सोशल मीडिया पर है, आपको बैकग्राउंड म्यूज़िक के साथ ‘डाँडिया के दिन पड़े डंडे’ कहने की क्या ज़रूरत पड़ गई? आप सीधा अपनी बात कहिए। इसमें उपमा और रूपक का प्रयोग करके इसको बेवजह बिगाड़िए मत। उसके लिए पत्रकार लोग हैं।

आगे से ध्यान रखिए कि मुद्दे को गायब करने के लिए पूरा तंत्र लगा हुआ रहता है। उसको घुमाकर हिन्दू-मुसलमानों, लेफ़्ट-राइट करने के लिए भी बहुत लोग हैं। आप आम आदमी हैं, जिनके पास आवाज़ है। इसको दूसरों से प्रभावित होकर, या दूसरों को प्राभविक करने के चक्कर में मरोड़िए मत। आप एकदम सहज भाषा का प्रयोग कीजिए, अपनी भावनाएँ लिखिए। लड़कियों की स्थिति पर लिखने के लिए बहुत कुछ है। लाठीचार्ज की निंदा के लिए बहुत शब्द हैं।

ये आंदोलन मर चुका है। ये अब फिर कब होगा पता नहीं। इसको एक तय तरीक़े से ख़त्म कर दिया गया। स्ट्रीट लाइट लगेंगी कि नहीं पता नहीं। कार्डों की तैनाती होगी कि नहीं, पता नहीं। लड़कियाँ सुरक्षित होंगी कि नहीं पता नहीं। इससे संबंधित कुछ काम तो विश्वविद्यालय प्रशासन का ज़रूर है, लेकिन नब्बे प्रतिशत काम वहाँ के छात्रों का है।

लाइट और गार्ड की ज़रूरत ही क्यों है? ‘सर्वविद्या की राजधानी’ में अंधेरे का फ़ायदा उठाने वाले छात्र हैं ही क्यों? इस कल्चर को पनपने ही क्यों दिया गया? लाइट लगवाना, गार्ड खड़े करने का मतलब है कि हमने मान लिया है कि बीएचयू में हरामी लौंडे तो घूमते रहेंगे, आप लाइट और गार्ड से बचाव करा लो! और लाइट में दुपट्टा खींचा गया तो? फब्तियाँ कसी गईं तो?

बीएचयू के छात्रों को अपना आचरण सुधारना होगा, और लाइट से ज़्यादा ज़रूरी है कि वहाँ जो माहौल है, उसको सुधारा जाय। इस विश्वविद्यालय को, जो किसी पुराने छात्र के अनुसार मादाभक्षी मर्द बनाने की प्रयोगशाला है, अपने छात्रों को नियंत्रण में लाना होगा। इन्हें घसीट कर निकालो, चौराहों पर पिंजरे में बंद करो और सर पर लिख दो कि ‘ये छेड़ते हैं लड़कियों को’। इनके माँ-बाप को बुलाकर इनकी क्लास लो। या जो भी करो, मुझे नहीं पता। लेकिन लाइट और गार्ड की ज़रूरत से पहले लड़कों की इस नीच मानसिकता को सुधारना ज्यादा ज़रूरी है।

खैर, चलता हूँ, रात हो गई है। आवाज़ उठाते रहिए। सरकारें मत देखिए। मुद्दे को पहचानिए, भटकिए मत। और हाँ, हमारे बड़े पत्रकारों की तरह सोमवार का इंतजार मत कीजिए प्राइम टाइम के लिए।

नमस्कार!

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