प्राइम टाइम: नीरव मोदी कांड में फ़ेसबुकिया विश्लेषकों की गट फीलिंग का दम्भ देखने लायक है

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कुछ लोग फ़ेसबुक स्टेटसों से ज्ञान लेकर स्वतंत्र रूप से ही नीरव मोदी, पीएनबी, रिज़र्व बैंक और, ऑफ़ कोर्स, सरकार पर फ़ैसले सुना रहे हैं।

मज़े की बात ये है कि इनको उन सारे लोगों, पेपरों, चैनलों, एजेंसियों, बयानों पर विश्वास नहीं है, जो इनके हिसाब से नरेन्द्र मोदी को कठघरे में खड़ा नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी मज़ेदार बात ये है कि यही सारे लोग, पेपर, चैनल, एजेंसी और बयानबाज़ कई बार इनके लिए ही सही होते हैं। लेकिन वो तब होता है जब ऐसे लोगों के मन की बात होती है।

ये लोग ‘गट फीलिंग’ से चलते हैं। इनको रात में सपना आता है कि फ़लाँ तरीक़े से फ़लाँ बात हुई होगी, इसलिए फ़लाँ लोग ही ज़िम्मेदार हैं। ये सपना, जो इनके अवचेतन और चेतन में चार वेबसाइट से उठाए हुए रिपोर्ट्स के अलावा कुछ भी और नहीं हैं, खुली आँखों से देखा जाता है।

इन लोगों का लिखा आप पढ़ेंगे तो सबसे पहले ये सवाल पूछेंगे कि यार ये इतना जानता कैसे है? न… कभी नहीं पूछते। वो इसलिए नहीं कि ये आदमी आप पर ऐसे टर्म्स की बरसात कर देंगे जिनकी आपको हवा भी नहीं लगेगी। ये लोग ऐसे-ऐसे बात लिख और बोल देंगे, और इतने आत्मविश्वास के साथ, कि आप ये संदेह ही नहीं कर पाएँगे कि इनको खुद कुछ पता नहीं, बस अपने मतलब की चार रिपोर्ट इन्होंने पढ ली है और माइंड मेकअप है कि जो ये मानते हैं, वही (और सिर्फ वही) हुआ है।

ऐसे लोगों के पास समय में वापस जाने का यंत्र होता होगा, ऐसा मैं मानता हूँ क्योंकि मेरे पास और कोई कारण या तर्क नहीं बचता ये समझने के लिए कि कैसे एक रात में ये पता चल जाता है कि गौरी लंकेश को किसने मारा, कैसे ये पता चल जाता है कि चौकसे पर एफआईआर नहीं हुई जबकि कर्नाटक की सरकार ने एफआईआर के बावजूद उसको गिरफ़्तार नहीं किया, कैसे ये पता चल जाता है कि बैंक के कर्मचारी से पासवर्ड (या जो भी है) लेने के बाद भी ओटीपी नरेन्द्र मोदी के ऑफ़िस से आता था।

इन लोगों को एक रात में आदमी जेल में चाहिए। जो जाँच एजेंसी जाँच करे, और बयान दे, उनपर इनका विश्वास नहीं है। इनको विश्वास किस पर है? अपनी गट फीलिंग पर, अपने इन्सटिंक्ट पर। क्योंकि इनको जो ‘लगता’ है, वही सत्य होना चाहिए। इन लोगों को हर अपराध की जड़ में मोदी और भाजपा चाहिए। वो हो नहीं पा रहा है, तो उन्हीं वेबसाइटों पर प्रश्न उठा रहे हैं, जिनकी क़समें खाते रहे हैं।

कहीं तो विश्वास करोगे? अगर नहीं है तो ठीक है, पहले वो डिक्लेयर करो। चुनाव व्यवस्था अगर रिग्ड है तो वामपंथियों की जीत पर खुश कैसे हो लेते हो? कैसे कह देते हो कि उपचुनावों में भाजपा की हार मोदी लहर के लिए चुनौती है? कैसे कह देते हो कि फलाने नेता को जेल में उसी न्याय व्यवस्था द्वारा डालना सही है, लेकिन फलाने को डालना गलत?

कहीं तो टिकोगे? जब सबकुछ नरेन्द्र मोदी ने मैनेज ही कर रखा है तो फिर लिखते क्यों हो? क्या तुम्हारे जैसे लोगों को वो मैनेज नहीं कर सकता? एनडीटीवी पर जब मनी लाउंड्रिंग का मुकदमा चले, तो वही सीबीआई और सरकार फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच को दबाती दिखती है। उस पर डिसीजन के लिए इतनी तत्परता क्यों नहीं कि सीबीआई क्या कर रही है, प्रणय रॉय को जेल में क्यों नहीं डाल रही?

नीरव मोदी ने अपराध किया, उसका नाम सामने आ गया। उस पर जाँच चल रही है। वो भाग गया है। जाँच के बाद कुछ तथ्य सामने आ रहे हैं। सात साल से ये चल रहा था, किसी को पता नहीं चला। नीरव मोदी के साथ बैंक के कर्मचारी मिले हुए थे। विदेश में पैसे लेने के लिए जो लेटर चाहिए वो खुद बना रहा था, और वहाँ के बैंकों से पैसे ले रहा था, अपनी कम्पनी में डाल रहा था। उसमें भी सवाल है कि वो सारे बैंक बिना स्विफ्ट सिस्टम के पैसे दे कैसे रहे थे। किसी ने अलार्म क्यों नहीं बजाया?

हर साल ऑडिट होता है तो आखिर ये पकड़ में क्यों नहीं आया? क्या आरबीआई के लोग भी शामिल हैं? तीन लोगों ने चिट्ठी लिखी तो उस पर किसी ने एक्शन क्यों नहीं लिया? क्या पीएमओ मिला हुआ है? क्या मनमोहन, चिदम्बरम, मोदी और जेटली के शह पर ये सात साल से चल रहा था? जब मनमोहन और मोदी को पता रहा होगा, तो फिर सोनिया और अमित शाह भी इस दायरे में होंगे? राहुल भी होंगे, और जेटली भी।

ये सब आप ‘मान’ सकते हैं कि ऐसा हो ‘सकता’ है। क्योंकि होने को कुछ भी हो सकता है। लेकिन समस्या ये है कि कुछ लोग जो ‘मानते’ हैं, उसी को वो अंतिम सत्य मान रहे हैं। किस आधार पर? इस आधार पर कि मोदी तो है ही ऐसा ही, बिना उसके कहे कैसे हो जाएगा! कुछ लोग मोदी-मोदी मौसेरे भाई कह रहे हैं। ये वही लोग हैं जो मनमोहन सिंह को ‘डॉक्टर साहब’ कहकर सम्बोधित करते हैं और उनका ये स्टेटमेण्ट अपने पर्स में रखते हैं कि ‘हिस्ट्री विल बी काइंड टू मी’।

मनमोहन सिंह के सर पर ऑक्सफ़ोर्ड की नीली पगड़ी है तो उनके समय शुरु हुए इस कांड से उनको इम्यूनिटी दे दी जाय, और जिसके समय में पकड़ाया है, उसके सर पर ठीकरा फोड़ा जाय कि होने ही क्यों दिया। मनमोहन सिंह के नाम में डॉक्टर है तो वो सीज़र की बीवी हो जाते हैं जो संदेह के दायरे से ऊपर हैं, लेकिन मोदी तो २००२ का दंगाई है तो जो भी होगा उसी के नाम मढ़ा जाएगा।

कुछ तो ऐसे चिरकुट और मानसिक अवसाद से ग्रस्त लोग हैं जिनके लिए लालू प्रसाद यादव जैसा चोर एक मसीहा है। उनका तर्क ये है कि बाकी लोग तो बाहर घूम रहे हैं, वही जेल में क्यों है। इनका तर्क ये है कि चूँकि दस रेपिस्ट बाहर हैं, तो जिस पर अपराध साबित हो गया है उसे अंदर क्यों रखा जाय।

ये चालाक लोग हैं जो दिन में चार बार ये दिखाते हैं कि इन्होंने फ़लाने लेखक की ये किताब पढ़ रखी है, फ़लाने विदेशी पेपर का ऑनलाइन एडिशन का स्क्रीनशॉट इनके वाल पर चिपका रहता है, फ़लाना आदमी ग़रीबों का मसीहा है क्योंकि वो अपने भाषणों में ऐसा कहता है। लेकिन ये बेहद ही धूर्त क़िस्म के लोग हैं। इनके तर्क के अनुसार जब तक हमारे समाज के सारे अपराधी एक साथ जेल में नहीं हो जाते, तब तक हर अपराधी को बाहर घूमने की अनुमति होनी चाहिए।

इनका एक एक्ज़ियम है कि सारे नेता चोर हैं, सिवाय उनके जिन्हें ये वोट देते हैं। और उसके अनुसार जब तक मोदी और अमित शाह जेल में न चला जाय, तब तक हर लालू, राजा, कनिमोई, कोड़ा आदि बाहर घूमता रहे। इनका मानना है कि स्कूल के प्रिंसिपल की तर्ज़ पर जज लोग सबको एक साथ बुलाएँ और कहें कि सब दोषी हो, सबको जेल में डालो।

नीरव मोदी ने क्या किया, ये तो जाँच एजेंसी ही जानेगी। और जो बात वो जानेगी, वही बात पब्लिक में रखी जाएगी। तब तक कौन क्या सोचता है, किस अख़बार को पढ़ता है, इसका कोई औचित्य नहीं है। इसमें वो लोग सही हैं, और संतुष्ट होंगे जो इंतज़ार करते हैं। उन लोगों को अगले किसी कांड तक दुःख होता रहेगा कि इन्होंने जिसके बारे में सपने में देखा था, और गट फीलिंग के आधार पर सोचा था, उसे सजा क्यों नहीं हो रही!

जो लोग ये लिख रहे हैं कि फ़लाने पेपर को सीबीआई की बात नहीं माननी चाहिए, उनसे ये जानना चाहूँगा कि क्या पत्रकार एक स्वतंत्र जाँच एजेंसी बना ले? कारवाँ वालों ने एक ऐसी ही फ़र्ज़ी की ‘इन्वेस्टिगेटिव’ जर्नलिज़्म की थी जस्टिस लोया के संदर्भ में और अगले ही दिन, उस अख़बार ने जिसका नाम लेकर कई प्राइम टाइम एंकर क़समें खाते हैं, ब्लो बाय ब्लो हर तथाकथित तथ्य को झूठा साबित किया था। इंडियन एक्सप्रेस की ख़बरें उस दिन गलत हो गईं, बाकी दिन सही रहती हैं।

क्या ये संभव है कि कोई पत्रकार पंजाब नेशनल बैंक में सेंध मारकर वो जानकारी ले आए जो ये लोग सोचते हैं कि सही है? क्या ये फेसबुकिया विश्लेषक ये साबित कर सकते हैं कि कारवाँ की ही तरह गुजरात चुनावों से ठीक पहले जस्टिस लोया की हत्या की फ़र्ज़ी रिपोर्ट कवर स्टोरी बनाकर आपकी वाली इन्वेस्टीगेटिव स्टोरी को इस्तेमाल न किया जा सके? क्या ये हो पाएगा कि आप जो लिखेंगे वो अजेंडा नहीं हो?

अगर वो अजेंडा नहीं है तो मैं कैसे मान लूँ कि एक फ़ेसबुक पर लिखने वाला पत्रकार या स्वयंभू विश्लेषक जो कह रहा है वो सही है, और पंजाब नेशनल बैंक के चेयरमेन से लेकर सीबीआई के प्रवक्ता तक सब झूठ बोल रहे हैं?

जब सुप्रीम कोर्ट पर आपका विश्वास नहीं है, सीबीआई तोता है, और पत्रकार बिक गए हैं तो फिर ये हमेशा क्यों नहीं मानते? ईवीएम हैक तब ही क्यों हो जाता है जब भाजपा जीतती है? एक आम नागरिक आपको क्यों सही माने क्योंकि आपके पेट में एबीवीपी से लेकर भाजपा तक, कॉलेज चुनाव से पंचायत, निकाय, विधानसभा और लोकसभा तक की हर जीत में कॉन्सपिरेसी दिखती है, लेकिन इन्हीं में जब आपके मतलब की पार्टी और लोग जीतते हैं तो पूरा सिस्टम एक वेल ऑयल्ड मशीन की तरह ठीक काम करने लगता है?

ए राजा और कनिमोई को पहले स्तर के अदालत ने छोड़ा तो आप नाचने लगे कि भाजपा ने सरकार गिरा दिया झूठे घोटालों का हवा देकर, लेकिन सतहत्तर बार लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट और एसाईटी से अमित शाह और मोदी गुजरात दंगों से बरी हुआ तो वो गलत है।

एक जगह सीबीआई तोता नहीं है, एक जगह तोता है, और सरकार वही है! न तो हर अपराध एक दिन में गोली सटाकर पर्स छीनने के स्तर का होता है, न ही उसे पकड़ने में हर बार दो दिन लगते हैं। जो इतना बड़ा अपराध कर रहा है, जिसमें बैंक के कर्मचारी से लेकर वित्त मंत्रालय के सचिव और विदेश में बैंक के ब्रान्च के लोगों के नाम आ रहे हों, उस आदमी को दो दिन में पकड़ लिया जाए?

रात भर में चार्जशीट बन जाए, और ड्रोन भेजकर न्यूयॉर्क के होटल से उसे उठा लिया जाय? वैसे राजनाथ सिंह ने कड़ी निंदा की जगह यही कहा है कि उठा लेंगे जहाँ कहीं भी होगा।

आपको आदर्श स्थिति चाहिए लेकिन आप आदर्श खुद नहीं हैं। लालू जैसे चोर आपके लिए मसीहा हैं क्योंकि बाकी चोर सड़क पर घूम रहे हैं। सुबह में अदानी का शेयर ख़रीदकर पैसा बनाइए, और फेसबुक पर अदानी और मोदी ने किस तरह देश को चूना लगाया उस पर आर्टिकल लिखिए। किसी भी विषय का ढंग से ज्ञान नहीं, लेकिन हर विषय पर चार आर्टिकल पढ़कर अपनी बात पर अड़ जाइए।

ये सब मत कीजिए। न तो समाज आदर्श है, न ही राजनीति। आप और हम तो आदर्श नहीं ही हैं। ये मिश्रित वास्तविकताओं का दौर है। यहाँ कोई भी चीज शुद्ध नहीं है। बड़े लोग अपराध करके निकल लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि वो कभी पकड़े ही नहीं जाते। इन सरकारों को आप चुनते हैं। सिस्टम हर तरह से कॉम्प्रोमाइज्ड है, लोग हर जगह बिके हुए हैं। हर जगह कुछ पैसे लेकर बिकने वाले लोग हैं। आप भी बिक जाएँगे, मैं भी बिक जाऊँगा।

बुरे समय में आदर्श ढूँढना बंद कीजिए। किसी की बीवी का नाम नीरव मोदी वाले कांड में आ रहा है, तो किसी का सरनेम उससे मिलता है। किसी के वित्त सचिव ने किसी को मुँह बंद रखने को कहा, तो किसी के साथ उसकी फोटो है। एक प्राइवेट बैंक में गड़बड़ी हुई है, और बैंक ने अभी तक ये नहीं कहा है कि वो इस क्राइसिस ने निपट नहीं सकती।

हो सकता है कि मोदी सरकार इसमें शामिल हो, लेकिन ये भी तो हो सकता है कि वो शामिल न हो? आप ये किस बिना पर मान लेते हैं कि आप ही सही हैं, और आपके पास सिवाय चार आर्टिकल्स के कोट करने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो कम से कम जाँच एजेंसियों के बयान तो हैं? आपने कहाँ से जाँच करवाई? अंदेशे, संदेह, और इस बात पर कि आपको ऐसा लगता है? या इस बात पर इसमें मोदी शामिल न हो ये हो ही नहीं सकता?

करते रहिए, क्योंकि इसी से आपकी जवानी का जोश ज़िंदा है, और चार लोगों के बीच आपकी एक्सेप्टेन्स है। आपकी साँस इसी से ऑक्सीजन पाती है कि मोदी और भाजपा हर अपराध में शामिल है। हर दंगा अमित शाह के कॉल करने से नियंत्रित होता है, और हर फाइनेंसियल फ़्रॉड में मोदी और जेटली की सहमति के बिना कुछ नहीं होता।

आप स्वतंत्र हैं। और मैं भी। इसलिए अपने आप को मोरल हाय ग्राउंड देना बंद कीजिए और दूसरों को तिरस्कार से देखना बंद कीजिए। जितना आप पढ़ते हैं, उतना लोटा लेकर टट्टी करता वो युवक भी पढ़ लेता है जो ओपन डिफिकेशन फ़्री गाँव के बाँस के झुरमुट में बैठा हुआ है।

नमस्कार!

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