प्राइम टाइम (विडियो): मुद्दों को गौण करने का तंत्र

नमस्कार

ये वही तंत्र है जो विश्वविद्यालय में लड़की के कुर्ते में हाथ डालने की घटना को मालवीय की मूर्ति पर कालिख पोतकर स्टेटमेण्ट देने के चक्कर में डाल्यूट करता है। ये तंत्र बहुत ही प्रबल है जो कि रोहित वेमुला की आत्महत्या को छात्र आत्महत्या की जगह ‘दलित’ की आत्महत्या कहकर बर्बाद कर देता है। ये तंत्र वही है जो नजीब अहमद की माँओं को सड़कों पर अपने राजनैतिक फ़ायदे के लिए बिठाता है, और फिर उसे वहीं छोड़कर गायब हो जाता है। ये तंत्र वही है जो देश की सारी समस्या को परे रखकर गाय और गोबर में व्यस्त हो जाती है।

इस तंत्र की व्यापकता इतनी महीन और सर्वव्यापी है कि आप अवचेतन तक प्रभावित होते हैं और फिर निकल नहीं पाते। ये आपके नसों में, जीन्स में उतर जाता है कि आप किसी लड़की के बलात्कार को अपनी कॉलोनी की गंदगी के समकक्ष कर देते हैं और कहते हैं कि मोदी हर बात पर जवाब क्यों दे। मोदी हर बात का जवाब बिल्कुल नहीं दे, न ही उसकी ये ज़िम्मेदारी है, लेकिन जब मोदी वहीं होता है, और उसका संसदीय क्षेत्र है, तो उससे दो सेकेंड की अपेक्षा उसकी तमाम बेटियों को तो होगी ही।

महामना की मूर्ति लीप दो कालिख से और फिर लड़ लो उन गुंडों से जो जातिवाद, साम्प्रदायिकता, लिंगभेद और सामंती सोच से लिपे हुए हैं। फिर क्या होगा? फिर वही होगा जिसका डर हर उस लड़की को होगा जो डेढ़ दिन से बाहर बैठी चिल्ला रही है कि उसे सुरक्षा दी जाय। उसका डर ये है कि पार्टी और पॉलिटिक्स में उनकी ज़ायज माँगों की बलि वैसे ही चढ़ जाएगी जैसे कि रोहित वेमुला की चढ़ी, नजीब अहमद की चढ़ी, अखलाख की चढ़ी…

सबको रंग दो। सबको एक रंग में रँगते रहो। गेरूआ-लाल करते रहो। मोदी को घेरने के सौ तरीक़े हैं, उनमें से एक यह नहीं है कि लड़कियों के विरोध को मालवीय की मूर्ति काली करते हुए ‘डाउन विद फासिज्म’ का नारा लगाने तक गिरा दिया जाय। लड़कियों की सुरक्षा राजनैतिक समस्या नहीं है। फासिज्म डाउन हो जाएगा, फिर भी ये मुद्दा वहीं रहेगा।

यही कारण है कि इन वामपंथियों की ये दशा हो गई है कि इनका सारा फ़ोकस अकादमिक जुमलों को चिल्लाने में ही जाया होता गया है। ये मुद्दे से विलग पता नहीं कहाँ घूम आते हैं। जबकि इनके हाथ में दो यूनिवर्सिटी की चार कुर्सियों के अलावा कुछ नहीं है। इनके पास इतने मौक़े होते हैं जिन पर ये बोलें, और लोगों का समर्थन वापस पाएँ लेकिन ये बस ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ से लेकर ‘डाउन विद फासिज्म’ में लगे हुए हैं।

चूतियो! फासिज्म की समझ तुम्हारी यूनिवर्सिटी के बच्चों को भी नहीं होगी। उन्हें भी नहीं जो मूर्तियों को कालिख से काला कर रहे हैं। तुम अपनी उखड़ी हुई जड़ों को लेकर हवा में धान बोते रहो। आखिर फासिज्म-फासिज्म चिल्लाने से क्या हो जाएगा, और क्या हो गया? हर जगह तुम्हारे इसी स्वभाव के कारण तुम्हारी ये दुर्दशा है कि तुम्हारे कॉमरेड अब कामरेड और बलात्कारी हो गए हैं, तुम्हारे ज़मीन से जुड़े नेता हवाई यात्रा में 65 लाख ख़र्च कर देते हैं, और तुम्हारे धर्मविरोधी नेता का नाम सीताराम है!

ये लड़कियों की सुरक्षा का मुद्दा है। इसे मोदी-योगी, राइट-लेफ़्ट में बर्बाद मत करो। हो सकता है कि पूरा आंदोलन एक प्लानिंग के साथ मोदी को घेरने के लिए हुआ हो, जैसा कि कई लोग बता रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद ये मानना असंभव है कि लड़कियाँ वहाँ सुरक्षित हैं। लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। कहीं भी नहीं।

इसलिए उनकी लड़ाई उन्हें अपने पार्टी पॉलिटिक्स से अलग होकर लड़ने दो। जहाँ तुमने उसे अपनी कोढ़ी विचारधारा का मंच बनाया, वहीं उनका मूवमेंट बर्बाद हो जाएगा। ऐसे मूवमेंट बहुत ही कम होते हैं, उनको हायजैक करके बेकार मत करो। भीड़ को तोड़ो मत।

नमस्कार

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