प्राइम टाइम: मेवाड़ के राजसमंद में ५० साल के मुस्लिम की हत्या किसने की?

(विडियो के शुरुआती दो मिनट में हिंसा के दृश्य हैं, जिन्हें समस्या हो, वो आगे बढ़ा लें)

मेवाड़ के राजसमंद में ५० साल के मुस्लिम की हत्या ‘लव जेहाद’ से बचाने के नाम पर होती है। आखिर ये किया किसने? उस आदमी ने जिसके हाथ में हथियार और माचिस की तीली थी, या फिर किसी और ने?

देखने पर तो सीधा लगता है कि एक आदमी है, जिसे लगता है कि एक मुसलमान किसी हिन्दू लड़की से प्रेम करने की कोशिश कर रहा है, वो उसके धर्म के लिए ख़तरा है, और वो उसे कहीं ले जाता है, मारता है, मार देता है, काट देता है, तेल छिड़ककर आग लगा देता है।

सात दिन पहले बिहार में पंद्रह साल के हिन्दू लड़के की लाश, चौदह साल की मुस्लिम लड़की के साथ पाई जाती है पश्चिमी चम्पारण में। इसमें मारने वाले लड़की के परिवार के थे। ये मैं बैलेंस नहीं कर रहा, ये मैं बता रहा हूँ कि हो क्या रहा है।

ये हत्याएँ कौन करता है? क्या वो आदमी जिसके हाथ में हथियार है, या फिर वो समाज जहाँ अखण्ड भारत से लेकर ख़लीफ़ाओं के शासन की बातें होती हैं? हत्यारा एक मानसिकता है या एक मानव? किस उन्माद में कोई चलता होगा, सोचता होगा, प्लान बनाता होगा और फिर जैसा कि आपने विडियो में देखा, एक सधे हुए तरीक़े से मार देता होगा?

किस उन्माद में कोई बाप, भाई, मामा, चाचा अपनी चौदह साल की बच्ची को मार देता होगा क्योंकि उसने किसी दूसरी जाति, धर्म, या समुदाय के लड़के से दो-चार बातें कर लीं थीं?

आप इसमें धर्म खोजना चाहें, खोज लें। इसमें राजनीति खोजना चाहें, खोज लें। इस्तीफ़े माँगने हों, माँग लें। लेकिन क्या वाक़ई इसमें धर्म, राजनीति और राज्य का हाथ उतना है जितना एक आदमी का, उस समाज का जहाँ ऐसे ग्रुप में पढ़े-लिखे ज़हीन लोग मैसेज शेयर करते हैं और दंगा फैलाते हैं?

कितने इस्तीफ़े माँग लेंगे आप? हर राज्य में हत्याएँ होती हैं, इसी क़िस्म की होती हैं। दिल्ली में बैठकर जितनी ख़बर पहुँच पाती है, उस पर आप विचलित हो जाते हैं। लेकिन क्या आपने अपने दोस्तों से इसका जवाब माँगा है कि वो ऐसे उन्मादी पोस्ट, मैसेज आदि पर अपनी सहमति क्यों दे देता है?

क्या आपने अपने प्रोफाइल वाले दोस्तों से पूछा है कि आतंकवाद पर वो क्यों नहीं बोलते?

ऐसे समय में चुप रहना सहमति देना है इस तरह के उन्माद को। ऐसे समय में चुप रहना बताता है कि आपके मन में चोर है। आप चाहते हैं कि हर मुसलमान ऐसे ही काटकर जला दिया जाय, और आप ये भी चाहते हैं कि पूरी दुनिया में बम और धमाकों के नाम पर इस्लामी हुकूमत आ जाय।

ये मैं बैलेंस नहीं कर रहा हूँ कि बात मुसलमान को जलाने की हुई, और मैं इसमें इस्लामी आतंक खींच रहा हूँ। बात एक मुसलमान को जलाने की नहीं है, बात है तमाम चुप्पियों की जो हम और आप अपने हिसाब से ओढ़ते हैं। आप बहुसंख्यक हैं तो आप आराम से मज़े लेते हैं कि जला दिया साले को! लेकिन आपके समस्या होती है जब वही अल्पसंख्यक कहीं बहुसंख्यक होकर पंद्रह मिनट में रॉड और मशाल लेकर जयपुर की सड़कों पर उतर आता है, पुलिस स्टेशन में आग लगा देता है।

ये बात समाज के क्रूर हो जाने की है। ये बात समाज के उस स्तर पर पहुँच जाने की है जब आपको तमाम नेता, अलग-अलग समय पर आदमी से हिन्दू और मुसलमान बना देते हैं। जिनके हाथ में हथियार होते हैं, उन्हें लगता है कि वो धर्म के नाम पर पुण्य कर रहे हैं। पेट में बम मारकर अल्लाह के नाम पर लोगों को उड़ाने वाला भी यही सोचता है, और राजसमंद का शंभु भी देवी की तस्वीर के सामने खड़े होकर यही कहता है कि हिन्दुओं के नाम पर ये किया।

लव जिहाद क्या है, इस पर केरल की हाय कोर्ट कह चुकी है कि ऐसा हो रहा है। लेकिन क्या ये इल्लीगल है? क्या विधर्मी से प्रेम करना जुर्म है? जब तक ज़बरदस्ती के कन्वर्जन पर कोई कानून नहीं बन जाता, जब तक विधर्मी से विवाह ग़ैरक़ानूनी नहीं हो जाता, किसी को कोई हक़ नहीं ये कहने का कि गलत हो रहा है।

ये एक सामाजिक समस्या है, जिसमें राजनीति का भी हाथ है। छुटभैये नेताओं को नेशनल लेवल पर चमकने के लिए ऐसी ही किसी घटना का इंतजार रहता है। इसी के नाम पर गौरक्षक किसी को पीट देते हैं। इसी के नाम पर कोई किसी को मार देता है। इस पर बोलिए, इसको बंद कीजिए।

और हर तरह की हिंसा पर बोलिए। अपने वाले पर चुप रहना दोगलापन है। अगर आप चुप हैं तो आप ये मानते हैं कि किसी को जलाकर मार देना हिन्दुओं के देवी-देवताओं पर किया गया एहसान है और मुसलमानों से लिया गया बदला। वैसे ही देश में इस्लाम का राज चाहने वालों को भी आज बोलने का हक़ नहीं है, उन्हें भी नहीं जो बाकी समय चुप रहते हैं।

हर तरह की हिंसा ग़ैरज़रूरी और मानसिक पागलपन होती है। इसको किसी भी तरह से जस्टिफाय करना सिवाय बेहूदगी और नासमझी के कुछ भी नहीं है।

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