प्राइम टाइम: आखिर डर की खेती कौन कर रहा है? सरकार या पत्रकार?

नमस्कार,
मैं डरा हुआ पत्रकार!

आजकल कुछ पत्रकार महोदय पत्रकारिता छोड़कर पहाड़ी वाले बाबा टाइप पुड़िया बेचने लगे हैं। इनमें सबसे ज्यादा जिनकी गुप्त रोग दूर करने की दुकान चल रही है उनका नाम है रवीश कुमार। इधर इन्होंने एक भाषण दिया है जिसमें इन्होंने ‘डर’ के प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी है। किसी पत्रकार की हत्या हो गई थी, तो उस पर निंदा सभा में पहुँचे थे। मैं नहीं पहुँचा क्योंकि मैं एलीट पत्रकार नहीं हूँ, और मुझे हर पत्रकार की मौत राजनैतिक नहीं लगती।

कई बार ये मौतें बस मौतें होती हैं। कई बार लोग गोली उठाते हैं और बाइक सवार पत्रकार को मार देते हैं क्योंकि वो उनके ख़िलाफ़ लिख रहा था। खैर, रवीश बाबू बोलने पत्रकारिता पर गए थे, और बोले वही जो इनका अपना प्रोजेक्ट है। रवीश कुमार ने गोएबल्स की बात की। हमने विकिपीडिया पर खोजा। पता चला कि प्रोपेगेंडा मंत्री था हिटलर का जो कि मीडिया का इस्तेमाल करता था सरकार के प्रोपेगेंडा को फैलाने में।

मैं पहले हँसा। क्योंकि रवीश कुमार भी अपनी जमात के गोएबल्स ही हैं। उनका काम भी वही है। पाँच कीवर्ड हैं रवीश बाबू के, जो वो हर बार, हर जगह पर बोलते हैं। बोलने की शैली प्रभावी है, और इनके प्रशंसक, जो कि एक ज़माने में मैं भी था, बहुतायत में हैं, तो इनकी बात शेयर करना बुद्धिजीवी होने के सबूत के तौर पर भी बाँटी जाती है।

इनके कीवर्ड्स हैं: डर, आपातकाल, भीड़तंत्र, ट्रोल, स्वतंत्रता का हनन आदि। इनके पूरे स्पीच में यही प्रोपेगेंडा चलता है। अब ये चालाक हो गए हैं, अब ये सरकारों के नाम नहीं लेते लेकिन ज्यादा चालाक लोगों को नाम लेने की ज़रूरत होती भी नहीं। आपको पता चल जाएगा कि किसके ऊपर बिल फट रहा है। पिछले तीन सालों से ये कहते फिर रहे हैं कि विकास कहाँ है? नंबर दिखाने से क्या होगा? सड़कों पर तो नहीं दिखता, सब्ज़ी महँगी है, लोग भूखे हैं आदि आदि।

इनका जो नया प्रोजेक्ट है कि सरकार सबको डरा रही है, इस प्रोजेक्ट पर मैं इन्हीं का फ़ॉर्मूला लगाता हूँ तो पता चलता है कि डर तो सिर्फ इनके चैनल, प्रोपेगेंडा वाले अख़बारों में है। सड़कों पर तो मुझे डरे लोग नहीं दिखते। हर मारपीट को हिन्दू बनाम मुसलमान सरकार बनाती है या फिर अजेंडाबाज मीडिया? सात लोग मरते हैं, तो बीबीसी तीन मुसलमानों के घर जाती है, चार हिन्दुओं के नहीं! हिन्दू को जब भीड़ घेरकर मार देती है तो वो एक आदमी की मौत होती है, जबकि बिना मज़हबी बात के मार दिया गया मुसलमान हिन्दुओं द्वारा मारा बताया जाता है?

इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा रवीश जी? इसकी निंदा सभा होगी कभी? क्या कभी आप जैसे स्तंभ बैठकर ये सोचेंगे कि आप लोग रिपोर्टिंग के नाम पर लोगों में दहशत की खेती कर रहे हो, उसका लक्ष्य क्या है? ये कहाँ रुकेगा पत्रकार बाबू? डर की खेती अगर सरकार कर रही है तो आप उसमें खाद, पानी, धूप सब दिखा रहे हो। सरकार के प्रोजेक्ट का हिस्सा आप हैं, और बहुत ही बारीकी से आप अपने मालिकों के जेब भरने के लिए वो कर रहे हैं जिससे आपको ज्यादा नज़रें देखे। ये चश्मा लगाकर ज्ञान बाँटना बंद कीजिए।

और बंद कीजिये ये कीवर्ड्स का व्यापार। आपकी हरकत समझ में आती है। तीन साल से आप कह रहे हैं कि टीवी मत देखो, आपने फिर कहा कि कूड़ा है वहाँ। तो आखिर ये कूड़ा फैलाने में दो पॉलिथिन कचड़ा तो आपके शो का भी होता होगा ना? पब्लिक के हित में बंद कर दीजिए। बंद कर दीजिएगा तो सैलरी नहीं मिलेगी, लेकिन हर रात प्रणय रॉय की नौकरी बजाने वाले शर्म से होने वाले नींद की हानि तो नहीं होगी ना?

पैसा तो आप यूट्यूब चैनल खोलकर कमा सकते हैं। लोग ढंग के पत्रकार को देखने के लिए तरस गए हैं। आप ढंग के पत्रकार हैं। ये आप भी जानते हैं, और मेरी औक़ात नहीं है आपको सर्टिफ़िकेट देने की। मैं आपके लहजे का, इशू तलाशने का फ़ैन था। लेकिन अब हाइबरनेशन में हूँ क्योंकि आप जूता पटापटाते हुए मालिक से पूछकर कार्यक्रम करते हैं। आप अब सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा लेकर बैठे हैं मानों सरकार ने कुछ किया ही नहीं! ठीक और गलत तो बाद की बात है। लग रहा है कि लोग सड़कों पर नाम पूछेंगे, और चाकू घोंप देंगे।

आप जिस भयावहता से चित्रण करते हैं वो एक धूर्त आदमी के बेहतरीन शब्द-विन्यास से ज्यादा कुछ नहीं है। मुझे आपको धूर्त कहने में बुरा लग रहा है लेकिन संकोच नहीं है। क्योंकि आप आपातकाल ले आते हैं, डर का राष्ट्रीय प्रोजेक्ट का पीआर कर रहे होते हैं, तो कभी माहौल में इतना विष घोल देते हैं कि लगता है कि हर साँस में जलते लाशों की गंध आती है भारत में।

रवीश जी, ऐसा नहीं है। जैसे जीडीपी का आँकड़ा गरीब के पेट में अनाज नहीं पहुँचा रहा, वैसे ही आपका एकेडमिक ‘प्रोजेक्ट डर’ किसी को सड़क पर मार नहीं रहा। मरने और मारने वाले हमेशा रहे हैं। कहने में संवेदनहीन लगूँगा लेकिन एक सौ तीस करोड़ की जनसंख्या में हर दिन कोई मुसलमान मरेगा, कोई हिन्दू मरेगा, कोई मज़हब के नाम की बलि चढ़ेगा, कोई पंडित उपनाम के कारण घसीट कर मारा जाएगा। इसमें से बस आप एक काम कर दीजिए, मीडिया के मित्रों को कह दीजिए कि देश में डर का माहौल ना बनाएँ।

आपने जो बाग़ बना दिया है ना, वहाँ लगता है कि कोई नमाज़ पढता मिलेगा तो दूसरा आदमी पीछे से छूरा मार देगा! आपके बाग़ में ख़ून की झील है, नंगी तलवारों वाले तिलकधारी हिन्दू हैं, ख़ून से लथपथ बुर्क़े में जाती मुसलमान लड़की है, हँसती हुई भीड़ है जो टोपीवालों पर तंज कस रही है… इस ख़्याल में एक ही लोचा है रवीश जी, वो ये कि ये आपके ख़्यालों में है, हक़ीक़त नहीं है।

नमस्कार

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