प्राइम टाइम: मुंबई ‘स्पिरिट’ से भीगीं मशालें फेसबुक पर ही जलती हैं!

… और जैसा कि होना था ‘मुंबई स्पिरिट’ ज़िंदा है! जी हाँ, जब इतनी मौतों के बाद, हर दिन होती पाँच मौतों को भूलते हुए, तमाम बम ब्लास्ट और बरसात, बाढ़ आदि में जर्जर बिल्डिंगों को टूटते देखने के बावजूद जब आप अगले दिन नौकरी पर निकल जाते हैं, तो उसे मुंबई स्पिरिट कहा जाता है।

ये स्पिरिट भारत के लगभग हर हिस्से में पाया जाता है। बस इनका ब्राण्ड बदल जाता है। ये स्पिरिट थोड़े खास तरह की होती है: सर्वप्रथम अतिप्रज्ज्वलनशील, और उसके बाद उसी अनुपात में मंद। इसमें जो आग लगती है वो रात के अंधेरे तक ख़त्म हो जाती है, और सुबह वो पानी में भींगी रुई की बत्ती की तरह लुंज-पुंज हो जाता है।

ये आग इतनी भभकती है कि किसी को भी नहीं छोड़ती। पूरे दिन तमाम तरह के मंथन होते हैं कि ये अपराधी है, वो अपराधी है, सब अपराधी है, इस पर हत्या का मुकदमा दर्ज करो, उस पर हत्या का मुकदमा दर्ज करो… और फिर सुबह उसी ओवरब्रिज की सँकरी सीढ़ियों से साढ़े तीन लाख पाँव, उसी टक-टक की आवाज़ के साथ, उतना ही समय लेते हुए, उसी रूट की ट्रेन पर, उसी भीड़ का हिस्सा बने हुए, उसी सिस्टम से ऑफ़िस जाते हैं और फिर शाम को उसी ओवरब्रिज की सँकरी सीढ़ियों से वही साढ़े तीन लाख पाँव, उसी टक-टक की आवाज़ के साथ, उतना ही समय लेते हुए, उसी रूट की ट्रेन से, उसी भीड़ का हिस्सा बने हुए, उसी सिस्टम से घर लौट जाते हैं!

कारण? मजबूर हैं। किस बात के लिए? घर चलाना है। क्यों? ज़िंदा रहना है। कैसे? इसी सिस्टम को गरियाते हुए, लेकिन ऑफ़िस आवर्स के बाद। क्या मिलता है? संतुष्टि कि हमने अपनी ज़िम्मेदारी सरकार और सिस्टम को कोस कर निकाल ली। फिर क्या होगा? पता नहीं। ऐसे ही चलता रहेगा? जी बिलकुल। क्यों? क्योंकि असली आंदोलन के लिए समय नहीं है।

क्या आप, जो ब्लू और व्हाइट कॉलर जॉब करते हैं, जो महँगी कारों का, घरों का सपना लिए लगातार ओवरटाइम कर रहे हैं, जो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा पार्टी, शराब और सिगरेट में उड़ाते हैं, दो दिन के लिए मुंबई को बंद कर सकते हैं? क्या आप सूट पहनकर रेल की पटरी पर बैठ सकते हैं? क्या आप दो दिन के लिए अपनी सैलरी का गणित भूलकर आंदोलन के नाम पर दान कर सकते हैं? छोटे मज़दूर तो हर दिन कमाते हैं, और खाते हैं, लेकिन आपके पास दो दिन है? हर इलाके के लाखों आईटी मज़दूर ये काम कर सकते हैं, लेकिन क्या वो हो पाएगा आपसे? क्या मुंबई स्पिरिट मुंबई के सवालों को पूछने के लिए प्रयोग में लाई जा सकेगी?

ये स्पिरिट का जो खेल है वो एक ऐसा शब्द है जो कि हम अपने दिल को बहलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। मैं भी करता हूँ। ये काहिल, हारे और थके हुए समाज की पहचान है। आंदोलन सबको चाहिए लेकिन करेगा कोई नहीं। और आंदोलन हर बात पर चाहिए। आंदोलन और क्रांति जैसे शब्द अब शब्द से ज्यादा कुछ नहीं हैं। हर बात पर हम आंदोलनरत हो जाते हैं और बहुत ज्यादा खुश हुए तो इस्तीफ़ा माँग लेते हैं। फिर अगले दिन नौकरी पर चले जाते हैं।

ऐसे तमाम हादसों के एक दिन बाद कभी हमारे पत्रकारों और मीडिया वालों के द्वारा चलाई गई ख़बरों का आकलन कीजिए। सबके सब ‘ह्यूमन इंटेरेस्ट स्टोरी’ करने लगते हैं कि कैसे फलाने ऑटोड्राइवर ने बिना भाड़ा लिए लड़कियों को घर तक पहुँचाया; फलाने कॉलोनी के लोग घायलों की मदद कर रहे थे; लोग ऑफ़िस जाने की बजाय घायलों को अस्पताल पहुँचा रहे थे… जरा सोचिए कि कौन सा इन्सान ये काम नहीं करेगा? क्या हमारा समाज इतना गिर चुका है कि घायलों को अस्पताल पहुँचाने की जगह वो अपनी नौकरी के बारे में सोचे? जी हाँ, कई बार मीडिया में ऐसी ही ख़बरें आती हैं कि ‘वो मरती रही, लोग विडियो बनाते रहे’। ये इतना होता है कि जो प्राकृतिक प्रतिक्रिया है किसी दुर्घटना को लेकर, वो हमें दैवीय और मानवीय संवेदना की पारकाष्ठा जैसी दिखने लगती है कि ‘अरे! उसने तो घायल की मदद कर दी!’

हमारा समाज और हम बहुत ही स्वार्थी हैं। इसमें मैं भी शामिल हूँ। मैं आजतक न तो किसी आंदोलन में गया, न ही मोमबत्ती जलाई, न ही प्रोफाइल पिक्चर बदलकर अपनी संवेदना दर्ज की, न ही काला धब्बा लगाया फेसबुक पर। क्योंकि इस तरह की बातें मुझे एक घटिया मजाक लगती हैं। आप इन जगहों पर जाते हैं, संवेदनशील होते हैं, आपका अपना अनुभव होगा, तर्क होंगे, लेकिन मैं इस बात को लेकर पूरी तरह से निश्चिंत हूँ कि इन बातों से कुछ भी नहीं होता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण निर्भया वाला मसला है। क्या हुआ उसका परिणाम? अन्ना के आंदोलन का क्या हुआ जिसे दूसरा स्वतंत्रता संग्राम बनाकर दिखाया गया था?

मैं निराशावादी और सिनिकल हूँ, आप ये कह सकते हैं। लेकिन आपके आशावादी होने से क्या फ़र्क़ पड़ा? अंततः, मैं और आप स्वार्थी हैं। मैं और आप अलार्म लगाकर सो जाते हैं कि सुबह तो जगेंगे ही जबकि उस बिल्डिंग का मेंटेनेन्स सौ सालों से नहीं हुआ है; जबकि जिस सड़क से आप जाते हैं उस पर इतना प्रदूषण है कि आपकी उम्र दस साल कम हो चुकी है; जबकि जिस रेलगाड़ी पर आप बैठते हैं उसकी पटरी कहीं भी टूटी हो सकती है; जबकि आपके बच्चे को जो खाना मिल रहा है उसमें जानलेवा मिलावट हो सकती है; जबकि आपका बच्चा जिस इंटरनेशनल स्कूल में जा रहा है, वहाँ उसका गला रेत कर मामले को रफादफा करने की पुरज़ोर कोशिश की जाती है; जबकि आपकी बहन जब सड़क पर चलती है तो कोई भी उसके कुर्ते में हाथ डालकर निकल सकता है; जबकि तमाम आंदोलनों को पढ़े-लिखे क्रांतिकारी सभा के सदस्यगण हायजैक कर के बर्बाद कर सकते हैं…

हमलोग फेसबुक पर इस स्पिरिट की मशालों की लौ दस-बारह घंटे तक इतना ज्यादा जला लेते हैं कि अगली सुबह सिवाय ऑफ़िस जाने के कोई और विचार आता ही नहीं। आंदोलन करने वाले ऑफ़िस नहीं जाते, और ऑफ़िस जाने वालों से आंदोलन नहीं होता। साथ ही, फेसबुकिया आंदोलन से सरकारों को न तो फ़र्क़ पड़ा है, न पड़ेगा क्योंकि यहाँ दोनों तरह के लोग हैं। आप स्पिरिट जलाइए, वो लगातार पानी फेंकते रहेंगे।

हर हादसे के बाद जाँच कमेटी बैठाकर उसे भुला दिया जाता है। जिसके अपने लोग मरे हैं वो उसे प्रारब्ध समझकर या फिर सरकारी चक्कर में लगातार घूमने के बाद छोड़ देते हैं। जो एक आदमी तीस साल तक सिस्टम के खिलाफ लड़ता है, उसके नाम हम आर्टिकल छापकर उसे हीरो बना देते हैं। जबकि उसे हीरो नहीं बनना था। वो इंसाफ़ और मानवता की जीत नहीं, हार है कि एक आदमी सिस्टम से लड़ते हुए बूढ़ा होकर मर जाता है।

हम राम मंदिर, बाबरी मस्जिद, गाय, गोबर की रेडियोएक्टिवटी रोकने की क्षमता, रोहिंग्या, फासिज्म, वामपंथ, पाकिस्तान, रितिक रौशन, जैसे शब्दों पर, (शब्दों पर ही, मुद्दों पर नहीं) आंदोलनरत रहने वाले लोग हैं। हमें हर दिन एक ट्रेंडिंग मुद्दा चाहिए ताकि हम व्यस्त रहें। हमें लोकल ट्रेन में दरवाज़े नहीं चाहिए। हमें जर्जर पुलों पर जाने का रास्ता बंद करना नहीं आता क्योंकि एक आदमी अभी चलकर गया और उसे कुछ नहीं हुआ। हम अपनी सरकारों को पहचानते हुए भी नहीं पहचानना चाहते और ये इंतजार करते हैं कि कब हादसा हो तो कोस लें!

हादसे सरकारों के मोहताज नहीं होते। हादसे बस होते हैं। इनको टालने का उपाय कीजिए। क्या मुंबई के लोग पटरियों पर बैठकर इन तमाम कॉरपोरेट ऑफ़िस तक पहुँचना बंद कर सकते हैं? क्या ये काम हर दिन दो-दो घंटे के लिए हो सकता है? क्या सरकारों पर ये दबाव बनाया जा सकता है कि वो कमेटी बिठाने की जगह पुराने पुल तोड़कर नए का निर्माण कर दे? क्या मुंबई स्पिरिट लोगों के अगले दिन चलायमान होने की जगह मुंबई को बंद करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है?

सोचिए कि क्या सही है, क्या नकली है। स्पिरिट का नाम लेकर अपने काम पर निकल लेना बहादुरी नहीं, मजबूरी है। और मजबूर लोग आंदोलन नहीं करते। वो मेरी तरह फेसबुक पर पोस्ट लिखकर सो जाते हैं।

नमस्कार!

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