राफ़ेल डील: डील के पहलू, निकम्मा विपक्ष और अनभिज्ञ जनता

(आर्टिकल का विडियो यहाँ देखें)

निकम्मी सरकार से ज़्यादा ख़तरनाक निकम्मा विपक्ष होता है। भारत जैसे देश में आप सरकारों को कोसने के मुद्दे एक ढूँढेंगे तो दर्जन मिलेंगे। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि विपक्ष वैसे मुद्दों को उठाती है जिसके बारे में उसे पता है कि वो फ़र्ज़ी के मुद्दे हैं, या वो मुद्दे हैं जो बाकी के मुद्दों को ढक लेते हैं? आखिर क्या बात है कि मीडिया में विपक्ष के सारे प्रवक्ता और विपक्ष के दैनिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आपको ऐसे मुद्दों पर बात होती मिलती है जिसके बारे में आम जनता को बहुत मालूम नहीं?

आपके विचार मीडिया को लेकर नकारात्मक होंगे कि ये दो हिस्सों में बँटा हुआ है, बेकार की बहस करता रहता है, सेन्सेशनल है आदि। लेकिन आप यह भी तो देखिए कि हमारी सरकार और विपक्ष किस तरह के मुद्दों को चुनती है। चूँकि मीडिया की क्रेडिबिलटी लगभग शून्य है, तो मुद्दे भी वैसे ही लिए जाते हैं जिनपर शोर तो बहुत ज़्यादा हो पर उसका समाधान कुछ न निकले। हिन्दू-मुसलमान की बातें, तैमूर-मीशा की बातें, अभिव्यक्ति और पत्रकार हत्या की वैचारिक बातें, बलात्कार में धर्म की बातें, सामाजिक अपराधों को धार्मिक बनाने की बातें… विपक्ष के पास कुछ होता नहीं, और सत्ता इसका लाभ उठाकर उससे झुनझुना बजाने दे देती है।   

आज जितनी पार्टियाँ विपक्ष में है, उनकी मजबूरी है कि बूढ़े शेर के नादान शिशु को अपना राजा मानकर चलना है। बाकी के पार्टियों के अनुभवी और क़द्दावर नेता ये कहते नज़र आते हैं कि राहुल जी ही उनके नेता हैं, और उन्हीं के नेतृत्व में हम मोदी के ख़िलाफ़ लड़ेंगे। जबकि ये वो राहुल गाँधी हैं जो कुल ₹60,000 करोड़ की राफ़ेल डील में सरकार के नाम ₹110,000 करोड़ का घोटाला करवा देते हैं। ये वो राहुल गाँधी हैं जो अपनी स्पीच के तीन मिनट में एक विमान का दाम तीन बार अलग-अलग बताते हैं।

राहुल गाँधी की मानसिक क्षमता क्या है, उससे मतलब बहुत ज़्यादा नहीं है क्योंकि नेताओं में नब्बे प्रतिशत बैल बुद्धि वाले ही हैं, और ये आपको लगातार हर जगह मिलते रहेंगे। कोई बलात्कारियों को ‘बच्चे हैं’ कह देता है, कोई चाहता है कि सारे मुसलमान पाकिस्तान भेज दिए जाएँ, किसी को ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ कहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगती है, किसी के लिए किसी नन का बलात्कार बारह बार एक मज़े लेने वाली घटना है… 

तो मानसिक क्षमता को दरकिनार करते हुए इस पर बात की जाए कि राहुल गाँधी पन्ने पर लिखा हुआ भी पढ़ सकते हैं कि नहीं? आख़िर उनकी स्पीच कौन लिखता है, उनका राजनैतिक गुरु कौन है, उसकी तैयारी कौन कराता है? इन सबके बीच जो कारण मुझे समझ में आता है वो बस यही है कि राहुल गाँधी एक रिलक्टेंट पॉलिटिशियन है। वो गलत घर में पैदा हो गए हैं, वरना इतने ही अमीर किसी और परिवार में पैदा हुए होते तो उनकी ज़िंदगी कमोबेश ऐसी ही होती, बस राफ़ेल जैसे मुद्दों पर बयान नहीं देना पड़ता। मतलब, चरस, गाँजा, थाईलैंड, माँ-बाप की दुकान, विदेशों में छुट्टियाँ आदि सब बातें जैसे अभी होती हैं, वैसी ही होती, बस राफ़ेल पर इतनी चरस न बो रहे होते। 

भाजपा ने राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ ये योजना बनाई है, या गलती से बन गई है, कि उसको कभी भी गम्भीरता से नहीं लेना है। राहुल और भाजपा दोनों ही इसी स्ट्रैटेजी से चल रहे हैं कि एक बात को, एक काम को, लगातार बोलते और करते रहने से पब्लिक में एक परसेप्शन बन जाता है। राहुल गाँधी को जोकर बोलते-बोलते उनको राजनीति का जोकर बना ही दिया गया है, और राहुल गाँधी ने स्वयं इसमें खूब सहयोग दिया है भाजपा का। बाद में, कॉन्ग्रेस को ये समझ में आया तो अब राहुल गाँधी राफ़ेल-राफ़ेल जपते रहते हैं।

इसका परिणाम यह निकला है कि लोग अब राफ़ेल पर चर्चा करने लगे हैं, और भाजपा राहुल गाँधी को काटने के चक्कर में ही उस इशू पर बोल रही है, जिस पर उसे बोलने की कोई ज़रूरत नहीं थी। जिस तरह की स्ट्रेटेजी भाजपा ने नोटबंदी और जीएसटी पर अपनाई, राफ़ेल पर भी वही करना था। नोटबंदी क्यों और कैसे सफल है, और कैसे इसने अपने सारे लक्ष्यों को पाया है, मैं उस पर भी आने वाले दिनों में आँकड़ों के साथ बातें करूँगा। 

फ़िलहाल राफ़ेल की बात करते हैं। राफ़ेल एक फ़ाइटर जेट विमान है जो अपने वर्तमान कन्फिगरेशन में दुनिया का बेहतरीन जेट है। बेहतरीन से मतलब यह कि इसमें वो सारे हथियार, सेंसर, टेक्नॉलॉजी आदि हैं जो इससे अपनी श्रेणी का सबसे घातक फ़ाइटर बनाते हैं। इसके बारे में 2007 में एक डील यूपीए सरकार ने तय की थी, जिसके समझौते में इसके कुछ विमान हमें तैयार मिलने थे, बाकी यहीं बनने वाले थे। 

यूपीए के समय में डील फ़ाइनल नहीं हो पाई। उस समय जो राफ़ेल ख़रीदा जा रहा था उसका मूल्य लगभग ₹570 करोड़ प्रति जेट था। आज जो ख़रीदा जा रहा है वो लगभग तीन गुणा दाम पर लगभग ₹1600 प्रति जेट है। ज़ाहिर-सी बात है कि 11 साल में इन्फ्लेशन जोड़ने के बाद भी इतना ज़्यादा दाम तो पागलपन ही लगता है। और यही बात राहुल गाँधी ने लगातार उठाई है कि मोदी जी ने ये डील में इतने पैसों में क्यों लिया जेट? 

इसको समझने के लिए इस तरह से देखिए कि आपको महिन्द्रा की एक स्कॉर्पियो लेनी है। मान लीजिए कि 2007 में आपको उस गाड़ी का दाम लगभग सात लाख पड़ रहा था। और आपने किन्हीं कारणों से वो गाड़ी तब नहीं ली। फिर आप एक महत्पूर्ण आदमी बन गए और 2018 में आपको लगा कि वही गाड़ी आपके कार्य के लिए सबसे अच्छी रहेगी। लेकिन इन बीते सालों में दाम में बहुत अंतर आ गया है, और आपका ओहदा भी एक आम शहरी से बढ़कर, एक बड़े व्यवसायी का हो गया है जिसकी जान को ख़तरा बढ़ गया है। 

आप स्कॉर्पियो लेने जाते हैं उसी शोरूम में, जिससे आपने पहले बात की थी तो पता चलता है कि दाम तो लगभग दस लाख हो गया है अब। फिर सेल्समैन आपको बताता है कि नई तकनीक आ गई है, और जो गाड़ी तह अपने बेस मॉडल के लिए 7 लाख की थी, उसी बेस मॉडल का दाम दस लाख है, लेकिन वो आपकी आज की ज़रूरतों के हिसाब से कमतर है। 

सेल्समैन आपको ऑप्शन्स बताने लगता है। जैसे कि आपको नॉर्मल पहियों की जगह अलॉय व्हील्स और ट्यूबलेस, पंक्चरप्रूफ टायर लेना चाहिए। अब सवारी की सुरक्षा के लिए बेहतरीन एयरबैग्स हैं। गाड़ी के अंदर आप टॉप क्लास एसी और बोस का साउंड सिस्टम लगवाना चाहते हैं। फिर आपको ध्यान आता है कि आपके दुश्मन भी बढ़ गए हैं, तो आप बुलेटप्रूफ़ करवाना चाहते हैं गाड़ी को। आपको गाड़ी के अंदर इंटरनेट चाहिए, फोन चाहिए, सीटों के पीछे आईपैड चाहिए। 

अब इसका दाम आपको जब बताया जाता है तो वो बीस लाख हो चुका होता है। आप ये बात अपने रिश्तेदारों को बताते हैं, तो घर के जो सबसे जानकार माने जाने वाले आदमी हैं, जिनकी हर बात पर एक राय होती है, जो मानते हैं कि रेलगाड़ी की चाभी कम से कम डेढ़ मीटर लम्बी होती है, वो आगबबूला हो जाते हैं कि आप अपने बाप की कमाई को उड़ा रहे हैं क्योंकि तीनगुणा दाम पर वही स्कॉर्पियो ले रहे हैं जो बाज़ार में उपलब्ध है। उन्हें सिर्फ ये पता है कि गाड़ी का नाम स्कॉर्पियो है, लेकिन ये नहीं पता कि उसके एक्सेसरीज़ क्या-क्या हैं।

ये जानकार आदमी राहुल गाँधी हैं, और उनके पीछे-पीछे हो-हो करने वाले उनके चमचे जो जानते सबकुछ हैं लेकिन मज़े लेना उनकी फ़ितरत है, तो लेते रहते हैं। राफ़ेल का नाम बेशक वही है जो ग्यारह साल पहले था। लेकिन जो क्षमता तब के राफ़ेल में थी, और जो अब के राफ़ेल में है, उसमें बहुत अंतर है। अब आपका सवाल यह होगा कि मोदी जी बता क्यों नहीं देते कि उसमें बोस का साउंड सिस्टम है, और ब्लू स्टार का एसी? 

बात यही है कि ये स्कॉर्पियो नहीं है, और दो देशों के रक्षा समझौतों की कुछ शर्तें होती हैं जिन्हें कई कारणों से बताया नहीं जा सकता। ऐसा नहीं है कि राहुल गाँधी ये नहीं जानते, वो जानते हैं कि सरकार नहीं बता सकती, इसीलिए वो बार-बार पूछ रहे हैं। बार-बार ललकार रहे हैं कि मोदी बताता क्यों नहीं कि ऐसा क्या है उस जेट में कि इतना ज़्यादा पैसा देना पड़ रहा है। आम आदमी भी सोचता है कि सही बात है आखिर सरकार बोलकर कॉन्ग्रेस का मुँह क्यों नहीं बंद कर देती क्योंकि आम आदमी ये नहीं जानता कि हर बात आरटीआई के दायरे में नहीं आती, और दो देशों के बीच रक्षा समझौतों की शर्तें क्या-क्या हो सकती हैं।

ये बात अलग है कि हम वही आम आदमी हैं जो हर विज्ञापन के नीचे लिखे ‘शर्तें लागू’ पढ़कर मुस्कुरा भर लेते हैं। दूसरी बात यह भी है कि विपक्ष के पास मुद्दों के न होने को कारण उनकी हर बात को गम्भीरता से नहीं लिया जा सकता कि हम पाकिस्तान और चीन के बीच खड़े होकर ये बताते चलें कि देश में किस तरह का फ़ाइटर आ रहा है और वो क्या कर सकता है। इस प्लेन पर तमाम वायुसेना अफ़सरों के बयान आ चुके हैं कि ये बेहतरीन विमान है सामरिक दृष्टि से। 

चूँकि राहुल गाँधी ऐसा चाहते हैं कि देश जाने कि विमान में रीयर व्यू मिरर और पार्किंग असिस्टेंट है कि नहीं, देश के कुछ लोगों को लगता है कि उन्हें ये जानना चाहिए। ये कुछ लोग वही लोग हैं जिन्हें राहुल गाँधी में देश का भविष्य नज़र आता है। अब इसके बाद कुछ कहने को बचता नहीं, और ऐसे लोग डिबेट में काउंटर आर्गुमेंट सुनने की पात्रता भी खो देते हैं। 

ख़ैर, आगे चलते हैं और देखते हैं कि इसमें और किन बातों पर विवाद हुआ है, या पैदा किया जा रहा है। इस विवाद का दूसरा हिस्सा है कि रिलायंस को इस समझौते में इसलिए शामिल किया गया क्योंकि वो मोदी के क़रीबी हैं। इसमें कॉन्ग्रेस चालाकी कर रही है, लेकिन ये इन्दिरा गाँधी वाला दौर नहीं है कि आप एशियन गेम्स में पहली बार रंगीन टीवी टेलिकास्ट करवा रहे हैं। आज वो दौर है जहाँ किस नेता ने, किस दिन, क्या बोला था, वो सब इंटरनेट पर मिल जाता है।

जब हम इस दौर में हैं, तो हमें ये आर्टिकल भी मिल जाता है कि 2012 में यूपीए के शासनकाल में ही रिलायंस को डसॉल्ट (राफ़ेल निर्माता कम्पनी) की तरफ से जेट को बनाने के लिए पार्टनर के तौर पर लिया गया था। मतलब यह कि वो रिलायंस के साथ ज्वाइंट वेन्चर बनाकर कुछ विमान भारत में ही बनाएगा। कालांतर में रिलायंस दो हिस्सों में टूटा और रिलायंस डिफ़ेन्स अनिल अम्बानी के हिस्से में आया। तो यह बात भी बिलकुल झूठ है कि इसमें मोदी का हाथ है। 

इसी से जुड़ी एक और बात है कि राफ़ेल के निर्माण के लिए सिर्फ रिलायंस ही एक भारतीय कम्पनी नहीं है, बल्कि सत्तर और कम्पनियाँ हैं जो इसके कल-पुर्ज़ों के निर्माण करेगी और उसकी असेम्बली डसॉल्ट-रिलायंस फ़ैक्ट्री में होगी। 

अगला लँगड़ा तर्क यह आता है कि भला रिलायंस को कब से डिफ़ेन्स का अनुभव हो गया। ये लोग वही लोग हैं जो राहुल गाँधी को आलमपनाह मानने के लिए उनकी टोपी के लिए बगुले के सफ़ेद पर ढूँढ रहे हैं। ये तर्क इतना वाहियात है कि एक लाइन में ख़ारिज किया जा सकता है: कपड़ा बनाने वाली कम्पनी आज दुनिया की सबसे बड़ी 4G फ़ाइबर ऑप्टिक्स नेटवर्क खड़ा करने वाली कम्पनी कैसे बन गई? 

मतलब, ये लोग कहना चाहते हैं कि आपके बाप किसान थे तो आप स्कूल जाकर कम्प्यूटर पर कोडिंग कैसे करने लग सकते हैं, आपको तो कुदाल चलाते रहना चाहिए था! मतलब, एक कम्पनी, जो भारत की सबसे बड़ी कम्पनी है, वो दूसरे क्षेत्रों में नहीं जा सकती क्योंकि उसे अनुभव कितना है! जैसे कि वो कम्पनी नया ऑफिस नहीं बना सकती, नए लोगों को नौकरी नहीं दे सकती, नए मशीन नहीं ला सकती, नई फ़ैक्ट्री नहीं लगा सकती, नए विशेषज्ञ नहीं बुला सकती? ये लोग किस दुनिया में जी रहे हैं? 

और अगर अनुभव की ही बात की जाए तो आप में से बहुतों ने पीपावाव शिपयार्ड का नाम सुना होगा जो कि पहली कॉर्पोरेट कम्पनी है जो भारतीय नौ सेना के लिए जहाज़ों को निर्माण करती है। जहाज का मतलब चप्पू वाली नाव नहीं, उसमें तमाम नए उपकरण आदि होते हैं जो सैन्य जहाज़ों के लिए ज़रूरी होते हैं। कमाल की बात यह है कि ये कम्पनी इसी रिलायंस डिफ़ेन्स से ताल्लुक़ रखती है, या यूँ कहें कि इसी के अंदर आती है। 

अब आते हैं ताज़ातरीन नौटंकी पर जो कि फ़्रान्स से आ रही है। इसमें वैसे लोग मज़े ले रहे हैं जो सिर्फ़ इस बात से खुश हैं कि उन्हें पूर्व राष्ट्रपति ओलाँ के नाम का सही उच्चारण आता है। वो बस इतना कर पा रहे हैं तो उनकी विश्वसनीयता इतने से बढ़ जाती है जैसे कि लोग ग़ालिब के नाम पर तमाम शेर फेंक कर उर्दू के जानकार बन जाते हैं, और शेक्सपीयर बोलकर ये बता देते हैं कि अंग्रेज़ी साहित्य से उनका गहरा नाता रहा है। 

फ़्रान्स में राफ़ेल से जुड़ी दो नौटंकियाँ हुई हैं। पहली थी कि इस पूर्व राष्ट्रपति फ़्रैंक्वा ओलाँ की एक जानेमन, जूली गेये, की किसी फ़िल्म को रिलायंस एंटरटेनमेंट द्वारा प्रोडक्शन में सहायता दी गई। इसे कहा जा रहा है कि इस कारण रिलायंस को ये डील मिल गई होगी। उसके बाद ओलाँ ब्रो के बारे में परसों फ़्रान्स के एक वेब न्यूज़ पोर्टल ने ख़बर चला दी कि उन्होंने ये कहा कि भारत सरकार की तरफ़ से रिलायन्स का नाम सुझाया गया था और फ़्रान्स चाहकर भी उसे नकार न सका। 

जबकि ओलाँ जैसे लोगों की बातों का बहुत ठिकाना है नहीं क्योंकि वो भी सत्ता से बाहर हैं, और उनकी लोकप्रियता की रेटिंग फ़्रान्स के इतिहास में सबसे कम चार प्रतिशत तक की जा चुकी थी। ऐसा व्यक्ति अपनी छवि को बचाने के लिए और सत्ता पक्ष के नेता को नीचे लाने के लिए दो दिन में दो तरह की बातें कर सकता है। पहले दिन उसने मीडियापार्ट नामक पोर्टल को इंटरव्यू में ये कहा कि भारत ने रिलायंस का नाम सुझाया और फ़्रान्स के पास उनकी बात मानने के सिवाय कोई चारा न था। 

इससे सीधा बवाल यह खड़ा हुआ कि हाँ, मोदी ने रिलायंस का नाम सुझाया और फ़्रान्स पर दबाव बनाया कि डसॉल्ट अनिल अम्बानी से ही समझौता करे। सतही तौर पर ये बात सही लगती है। लेकिन दूसरे ही दिन जब बवाल ज़्यादा हो गया तो ओलाँ ब्रो ये कहते पाए जा रहे हैं कि फ़्रान्स ने रिलायंस को किसी भी तरीके से नहीं चुना। मतलब, अब कह रहे हैं कि रिलायंस के साथ डील करना डसॉल्ट का निर्णय था, न कि किसी सरकार का। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ओलाँ को जूली के साथ ओले-ओले करने दीजिए, उसकी बातों को गम्भीरता से मत लीजिए। 

दोनों सरकारों का यह कहना है कि उनके बीच क़रार राफ़ेल विमानों को लेकर है जो कि डसॉल्ट बनाती है, और ये पूर्णतः डसॉल्ट का चुनाव है कि वो भारत की किस कम्पनी के साथ ये समझौता करे। यानि, डसॉल्ट एविएशन का निर्णय होगा कि उसे टाटा के साथ काम करना है कि महिन्द्रा के साथ। अगर उसे लगता है कि भारत में रिलायंस की डिफ़ेन्स आर्म राफ़ेल विमानों को एक नियत समय और मूल्य के दायरे में, उसी गुणवत्ता पर बना सकेगी, तो बेशक वो उसी को चुनेगी। 

जो लोग ये तर्क दे रहे थे कि रिलायंस को किसी तरह का अनुभव नहीं, वो घूम-फिरकर हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड या हाल के पास जाने की सोचते हैं। उसका एंगल यह है कि यूपीए के समय में वो भी इस समझौते के लिए कन्सिडर किया जा रहा था। लेकिन उसे नकार दिया गया। अब कुछ दिन पहले इसी सरकारी कम्पनी के पूर्व चीफ़ ने ये बयान दिया कि हाल भी राफ़ेल बना लेती। 

हो सकता है बना लेती, लेकिन जो कम्पनी एयरफ़ोर्स के हेलिकॉप्टर तक ऐसे बनाती है जिसके पायलट को मुक्का मारकर ऑल्टमीटर के सही चलने की आशा करनी होती है, उसे राफ़ेल बनाने में कितने साल लगते भगवान ही जाने। और हाँ, मुक्का मारने वाली बात मैं मजाक में नहीं कर रहा, ये खूब होता है और ऐसे हेलीकॉप्टरों में बैठने वाला हर पायलट ये जानता है कि ये उसकी अंतिम उड़ान हो सकती है। 

उस चीफ़ का बयान एक जज़्बाती बयान कहा जा सकता है जैसा कि तमाम बापों को लगता है कि उनका बेटा तो आईएएस बन ही जाता, बस कॉपी थोड़ी टाइट चेक हो गई। हाल का रिकॉर्ड कितना ख़राब है आपको ये जानने के लिए गूगल में ‘क्वालिटी इशूज़ विद हाल मैनुफैक्चर्ड एयरक्राफ्ट्स’ लिखकर आने वाले लिंक्स को पढ़कर पता चल जाएगा। इनके सर पर ऐसे विमानों के खराब इंजन बनाने के तमग़े लगे हैं जिसका सेफ़्टी रिकॉर्ड सौ प्रतिशत को छूता है। 

ये टेक्नॉलॉजी ट्राँसफर के नाम पर सिर्फ मिग फ्लीट के 200 पायलट्स की मौत और आधे एयरक्राफ्ट्स की दुर्घटनाओं के ज़िम्मेदार हैं। इनके हाथों पर मिग, सुखोई, हॉक जैसे विमानों में मरने वाले पायलट्स के ख़ून के धब्बे हैं, जिनसे ये मुक्ति नहीं पा सकते। बेशक, एक सरकारी संस्था की इस हालत की ज़िम्मेदार भी तमाम सरकारें ही हैं जिन्होंने यहाँ बेहतर इंजीनियर्स, वैज्ञानिक और मशीनों के लिए कुछ भी नहीं किया। 

इसलिए जब सरकारी कर्मचारी ऐसी बातें करते हैं तो हँसी ही आ सकती है। कई बार तो ये भी लगता है कि कॉन्ग्रेस ये सारे बयान दिलवा रही है ताकि उसको ये कहने को मिल जाए कि घोटालों के दाग मोदी के गिरेबान पर भी हैं। उस पार्टी के इतने लोग तो बाहर होंगे ही जिन्होंने मलाई खाई है, और कर्ज चुका रहे हों! यही कारण है कि जिन घोटालों के मुद्दों पर इनकी हालत चौवालीस की हो गई, वो बहुत ज़ोर लगा रहे हैं कि वो मोदी को भी घेर लें। लेकिन ये हो नहीं पा रहा क्योंकि जिसका नेता राहुल गाँधी हो, और विपक्ष सपोर्ट दिखाने के नाम बहुत ज़्यादा भी करे तो स्टेज पर हाथ पकड़ कर खड़ा हो जाए, या ट्वीट कर दे, वो सत्ता पक्ष पर दबाव तो नहीं ही बना पाएगी। 

सबको पता है कि राहुल गाँधी ‘गधे को बाप’ बनाने वाली परिस्थिति हैं। जी, राहुल गाँधी व्यक्ति नहीं, परिस्थिति हैं जिनके मध्य में तमाम पार्टियाँ फँसी पड़ी हैं। एक से एक क़द्दावर नेता जो अपने क्षेत्रों के महामहिम हैं, लेकिन उनके पास एक राष्ट्रीय चेहरा नहीं है तो राहुल को बाप बनाकर जब-तब हो-हल्ला कर लेते हैं। राहुल जैसे नेता तो बहुत होंगे, लेकिन वो कभी भी पार्टी अध्यक्ष नहीं बने, वो भी कॉन्ग्रेस के तो बिलकुल ही नहीं। यही कारण है कि कॉन्ग्रेस के राहुल को विपक्ष में क्या करना है इसका तनिक भी ज्ञान नहीं है, और विपक्ष की बाकी पार्टियों को राहुल जैसी परिस्थिति के साथ क्या करना है इसका ज्ञान नहीं है। ये लोग हिट एण्ड ट्रायल विधि से चल रहे हैं, और सफलता नहीं मिल रही। आपलोग भी चिल मारिए और शेयर करते रहिए।

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