हिन्दी साहित्य के कुण्ठित सर्कल में सफल औरतें पतिता हैं, चरित्रहीन हैं

आप में से कइयों ने कई लोगों के वॉल पर अनामिका नाम की महिला को टार्गेट करते हुए बेहूदे, अश्लील और हद दर्जे की गिरी हुई भाषा में लिखे पोस्ट देखे होंगे। बात ये है कि किसी युवा कवि को एक सम्मान दिया गया है, जिसकी ज्यूरी में अनामिका हैं, और उनके साथ चार पुरुष हैं जो बारी-बारी से एक कवि को ‘भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार’ देते हैं। इस बार एक युवा कवि को ये सम्मान दिया गया, जिसका चुनाव अनामिका ने किया तो हिन्दी साहित्य के पुरोधाओं ने हद कर दी।

इस बात पर चर्चा हो सकती थी कि कवि अच्छा लिखता है या बुरा। ऐसे पोस्ट आते जिस पर कवि की कविताओं की समीक्षा होती कि देखो क्या खराब कविता है, इसका शिल्प बेकार है, शैली चोरी की है, और भाषा सड़कछाप है। ये होती एक ढंग की बहस। उससे पता चलता कि ये कवि लायक है कि नालायक। लेकिन नहीं, हिन्दी के स्तम्भों ने बिना ऐसा किए हुए ‘जवान कवि’ और ‘महिला निर्णायक’ के समीकरण को उभारकर सेक्स का एंगल लाना बेहतर समझा।

अब आइए, अनामिका को जानिए। सत्यवती कॉलेज में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं। हिन्दी प्रेम और साहित्य में योगदान का अंदाज़ा इससे लगाइए कि उन्होंने आठ कविता संग्रह, पाँच उपन्यास, चार आलोचना, तीन अनुवाद लिखे हैं। और भी रचनाएँ होंगी, पर विकीपीडिया इतना ही कहता है। कई साहित्य सम्मान मिले हैं।

एक और परिचय आप मुझसे ले लीजिए। मुझे इन्होंने साल भर पढ़ाया है जब मैं अंग्रेज़ी साहित्य से स्नातक कर रहा था। अनामिका मैम हमें ‘ट्वंटिएथ सेंचुरी इंडियन राइटिंग’ का पेपर पढ़ाती थीं। मेरी जितनी समझ उस समय थी, और जितनी आज है, और जितना मुझे याद है, उस हिसाब से ये मेरे जीवन के बेहतरीन शिक्षक/शिक्षिकाओं में से एक थीं। कई सेमिनार में सुनने का सौभाग्य मिला और क्लास में बेठकर पढ़ने का भी। एक बेहतरीन स्त्री, शिक्षिका और माता की तरह बच्चों से स्नेह भरा व्यवहार करने वाली।

ये जानना आपके लिए ज़रूरी है क्योंकि इस स्त्री पर हिन्दी साहित्य के लीचड़ों ने ऐसे लांछन लगाए हैं कि उन्हें शर्म से मर जाना चाहिए कि वो खुद को कवि और लेखक मानते हैं। क्या एक स्त्री किसी युवा कवि को पुरस्कार देगी तो उसका मतलब इतना ही रह गया है कि वो उसके साथ सो रही होगी? उसकी किताबें, उसका व्यक्तित्व, उसके सम्मान, उसकी तमाम सफलताएँ बस इतने में सिमट कर रही गईं कि एक औरत किसी पुरुष को पुरस्कार सिर्फ सेक्स करने के बाद ही दे सकती है?

शर्म तो तब और आती है जब ऐसे कुत्सित पोस्टों के नीचे किसी औरत की ये टिप्पणी पढ़ने को मिलती है कि ‘सही है’। एक पुरुष, किसी स्त्री को भद्दे शब्दों में उसके व्यक्तित्व को बाज़ारू बनाकर रख देता है और आपको लगता है कि ‘सही है’? एक अन्य लेखिका से इस पर विरोध करने की बात की गई तो उन्होंने ये कह दिया कि ‘मैं विरोध क्यों करूँ, मुझसे इसका कोई लेना-देना नहीं’! ऐसे लोग हिन्दी साहित्य में नारीवाद का झंडा लेकर घूमते हैं!

एक सफल स्त्री, वस्तुतः एक स्त्री, इस कुण्ठित समाज में अपनी योनि, स्तनों, और यौन इच्छाओं की पूर्ति की पागलपन के हद तक आकाँक्षा रखने वाली देह होने के अलावा कुछ भी नहीं। सफल स्त्री को इस तरह देखा जाता है मानो उसने हर सीढ़ी चढ़ते वक़्त एक रात, या कई रातें, किसी मर्द के साथ गुज़ारी जिसने उसे ऊपर ढकेला। वो किसी मर्द को सराहती है तो इसका अर्थ यही होता है कि वो उसके साथ सो रही होगी, तभी तो ऐसा करती है।

ये कार्य वो लोग करते हैं जिन पर समाज की दशा और दिशा तय करने की ज़िम्मेदारी है। ये लेखक हैं, संवेदनाओं को शब्दों में ढालने वाले कवि हैं, सामाजिक समस्याओं पर अपनी बात रखकर हजारों शेयर पाने वाले विचारक हैं, नारियों की ब्रा से लेकर पीरियड्स पर संवेदनशील होकर लिखने वाले नारीवादी हैं। इनका चेहरा यही है कि इस समाज को सफल स्त्री नहीं चाहिए।

इस समाज को बेलन चलाती, बच्चे पालती, वैवाहिक बिस्तर पर पुरुषों के लिंग का आतंक झेलती, चुप रहने वाली स्त्री चाहिए। इनको आख्यानों में स्त्रियों की दिक़्क़तों पर बोले जा सकने के विषय बनने वाली नायिकाएँ चाहिए, और वो नायिका अनामिका नहीं हो सकतीं। अनामिका ने अपने लिए सफलता अर्जित की है। अनामिका वहाँ पहुँची हैं जहाँ पहुँचने में बहुत मेहनत करनी होती है, और इसी कारण वो सोचते हैं कि अनामिका तो बिना किसी के साथ सोए वहाँ जा ही नहीं सकती।

किसी ने अनामिका को पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई। किसी ने अनामिका के शब्दों को नहीं सुना। किसी ने अनामिका को खड़े होकर बोलते नहीं देखा। अनामिका महज़ एक नाम बनकर रह गई जो कि किसी लड़की का हो सकता है। चूँकि वो नाम किसी लड़की का है, जिसने किसी लड़के को, किसी भी बात के लिए चुना है तो वो नाम पतिता का, चरित्रहीन का हो जाता है।

अश्लील होने की परिभाषा अपने हिसाब से लिखकर, एक कविता से किसी पर फ़ैसला सुना दिया गया कि कवयित्री अश्लील है! वाह! कविता अश्लील हो, इस पर तो एक बार फिर भी चर्चा कर लेते, लेकिन लिखने वाला ही अश्लील है? ये सड़ी हुई सोच कहाँ से आती है? हलाँकि, तस्वीर में दिखते पोस्ट के शब्द तो सीधे वेद से उठाए गए प्रतीत होते हैं!

ये बेहूदगी, संकीर्ण मानसिकता और दिमाग़ी घाव हिन्दी साहित्य के पूरे वृत्त को जकड़े हुए है। ये केकड़े हैं। ये कुण्ठित लोग हैं जो इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते कि सम्मान उसको मिला जो उनसे बेहतर लिखता है, और सम्मान उसने दिया जो उनसे बेहतर स्थान पर है। यही कारण है कि आपको पिछले तीन दशक में हिन्दी में कोई नाम नहीं दिखता जिसने समाज को दिशा दी हो। एक पीढ़ी इसी राजनीति के चक्कर में निपट गई कि कौन कहाँ किसकी चाटुकारिता से क्या पा जाए। यही राजनीति आज भी इन ठरकी बुड्ढों की दबी हुई कामुकता उभार कर ला रही है। ऐसे लोग हमेशा ऐसी जगहों पर रहेंगे जो इस तरह की सड़ाँध फैलाते रहेंगे।

इससे अनामिकाओं को कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्योंकि नंगे ये खुद हो रहे हैं।

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