रोहिंग्या मुसलमानों का इतिहास उनके वर्तमान का ज़िम्मेदार है

रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर देश की मीडिया के एक हिस्से को वो टॉपिक मिल गया है जिसकी उन्हें हमेशा से तलाश रहती है। साथ ही, उन्हें भी किंकियाने का मौक़ा मिला है जो गिरोह इस तरह के समय पर ट्रोल बनकर छापामार छद्मयुद्ध करते पाए जाते हैं। मौक़ा क्या है: रोहिंग्या के विवाद को मानवतावाद का तड़का लगाकर मोदी सरकार को हिन्दू-मुस्लिम बाट पर तौलते हुए साम्प्रदायिक बता देना।

चूँकि इस देश में हर साल पाँच चुनाव होते हैं तो इन चिरकुटों का ये तर्क कभी ख़ारिज होता नहीं दिखता कि ‘चुनावों में ध्रुवीकरण के लिए भाजपा ऐसा कर रही है’। ये लगभग वही बात है कि किसी सिने तारिका द्वारा इंडस्ट्री की सड़ाँध पर सवाल उठाने को उसकी फ़िल्म के प्रमोशन से जोड़ना। मुद्दा कुछ भी हो, नैरेटिव ये निकाल लेते हैं जो उन्हें सूट करता है।

रोहिंग्या मुसलमानों की वर्तमान हालत समझने के लिए आपको इतिहास में थोड़ा पीछे जाना होगा। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय, जब बर्मा अंग्रेज़ों के अधीन था और जापान ने हमला बोल दिया तो अंग्रेज़ों ने एक तरकीब भिड़ाई। ये तरकीब उन्होंने कई जगह इस्तेमाल की थी: अपने विरोध में खड़े लोगों के एक हिस्से को सत्ता का लालच देकर अपनी तरफ कर लेना। रोहिंग्या मुसलमानों को भी इन्होंने ये लालच दिया कि अगर वो इस युद्ध में, आंतरिक रूप से बर्मा में आज़ादी का संघर्ष और बाहर से जापान का हमला, उनका साथ दें तो उन्हें एक इस्लामी राष्ट्र दे दिया जाएगा।

किस देश के मुसलमानों को इस्लामी राष्ट्र बनने का सपना नहीं आता! खासकर उन्हें ये सपना जरूर आता रहता है जो अल्पसंख्यक हैं और इन्हें लगता रहता है कि इन्हें सताया जा रहा है। रोहिंग्या मुसलमानों को अंग्रेज़ों ने हथियारों से सहायता की। इनके पास काफ़ी हथियार आ गए थे और ये जापान से लड़ने की जगह अपने ही देश में उत्पात मचाने लगे। बहरहाल, 28 मार्च 1942 को इन मुसलमानों ने बर्मा के मुस्लिम-बहुल उत्तरी अराकान क्षेत्र में 20,000 से अधिक बौद्धों को मार डाला। इसका समानांतर आप बंगाल में ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के तहत 10,000 हिन्दुओं की हत्या में देख सकते हैं।

विश्व के लगभग हर देश में जो सेकुलर है, या फिर किसी और पंथ/धर्म आदि को अपनाए हुए है, वहाँ अगर मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, तो अपनी संख्या के बल पर इनके व्यवहार में परिवर्तन आता रहता है। हरेक मुस्लिम के साथ ऐसा नहीं होता हो, पर इनके नेता ऐसा जताने लगते हैं कि उनकी जीवनशैली में बाकी लोग कठिनाई पैदा कर रहे हैं। एक से पाँच प्रतिशत की जनसंख्या के साथ ये बहुत मित्रवत् होते हैं; पाँच से दस में ये अपनी हक़ की बात करने लगते हैं जिसमें मस्जिद, क़ब्रिस्तान की जगह आदि की माँग होती है (जो कि ज़ायज है); दस से पंद्रह में ये भीड़ बनकर विक्टिम कार्ड खेलते हुए हिंसा करने लगते हैं; पंद्रह से बीस होने पर इनकी हिंसा उग्र होने लगती है और ये दंगे करते हुए दिखने लगते हैं। ये डॉक्टर पीटर हैमंड की किताब से और अपने अनुभवों से लिख रहा हूँ। आगे प्रतिशत बढ़ाते जाइए, आपको जिहाद, आतंकवाद और बाकी हर तरह के उदाहरण मिलते जाएँगे।

तो रोहिंग्या मुसलमान भी इसी पैटर्न पर आगे बढ़ते हुए बर्मा की स्वतंत्रता से ठीक पहले जिन्ना से मिलकर अराकान के एक जिले मायू को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाना चाह रहे थे। चूँकि एक ज़िला देश नहीं बन सकता था तो इस्लामी देश में मिलना इन्हें बेहतर विकल्प लगा। ज़ाहिर है कि कोई भी देश ऐसा नहीं चाहेगा। कोशिशें बहुत हुईं, इस्लामी संगठन बने, लेकिन परिणाम नकारात्मक रहे। संगठनात्मक शक्ति के बल पर इन्होंने भयंकर उपद्रव शुरु किया। मायू के दो मुस्लिम बहुल इलाके, ब्रथीडौंग एवं मौंगडाऊ में अब्दुल कासिम के नेतृत्व में लूट, हत्या, बलात्कार एवं आगजनी का भयावह खेल शुरू हो गया। हालत यह हो गई कि इन इलाक़ों से वहाँ के मूलनिवासी बौद्ध या तो मार दिए गए या जगह छोड़कर भागने को विवश हुए। इसी समय खुद को संख्या शक्ति में बड़ा करने के लिए बंग्लादेशी मुसलमान भी इस इलाके में घुसपैठ कर बसाए गए जो कि इनकी गोरिल्ला युद्धनीति का हिस्सा बने।

इसे अपने मक़सद की जीत मानकर रोहिंग्या मुसलमानों का क़हर जारी रहा और 1947 में इन्होंने सारे मुसलमानों को एकजुट कर मुजाहिदीन मूवमेंट के नाम से बर्मा पर लगभग आंतरिक आक्रमण कर दिया। दो साल बीतते-बीतते बर्मा सरकार के क़ब्ज़े में अराकान का छोटा सा हिस्सा अकयाब ही बचा था। बर्दाश्त से बाहर जाती स्थिति के कारण सरकार ने सेना को इनसे निपटने के आदेश दिये और फिर लगातार इन आतंकियों को पकड़ना, मारना, भगाना शुरु हुआ। सेना ने इनके आंदोलन की कमर तोड़ दी, इनके नेता भाग गए या भूमिगत हो गए। 1971 में बंग्लादेश बनने से इनकी उम्मीदों ने फिर जोर पकड़ा और इनके नेता जफ्फार ने जिहादियों को इकट्ठा करना शुरु किया। सेना ने फिर इनको पटखनी दी और पार्टी को बर्बाद कर दिया।

लेकिन अब बग़ल के देशों से इन्हें मदद मिलने लगी। अरब से पैसा, पाकिस्तान की आईएसआई से प्रशिक्षण के साथ ही तमाम मुसलमान आतंकी/जेहादी संगठन इनकी मदद को आने लगे। इनमें बंगलादेश एवं पाकिस्तान के सभी इस्लामी संगठन, अफगानिस्तान का हिजबे-इस्लामी, भारत के जम्मू-कश्मीर में सक्रिय हिजबुल मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन, मलेशिया के अंकातन बेलिया इस्लाम मलेशिया ( एबीआईएम) तथा इस्लामिक यूथ आर्गनाइजेशन ऑफ मलेशिया मुख्य रूप से शामिल थे।

इससे इनका हौसला बढ़ा और ये और भी हिंसक हो उठे। पैसे की कमी नहीं थी, प्रशिक्षण मिल ही रहा था तो इन्होंने वहाँ के बौद्धों पर फिर से आतंक बरपाना शुरु किया। लेकिन बर्मा का सेकुलर समाज अपनी ही सुरक्षा को लेकर उदासीन रहा, जैसे कि भारत के लोग आजकल हैं। पॉलिटिकल करेक्ट होने के चक्कर में बर्मा के मूलनिवासियों पर लगातार हमले होते रहे, और ये लोग ‘हम तो बच गए’ की तर्ज़ पर माला फेरते रहे। लेकिन तभी एक बौद्ध भिक्षु अशीन विराथु का आगमन होता है और फिर उसकी आवाज़ पर बौद्धों में अपने अस्तित्व को लेकर चिंता शुरू होती है। उनके भाषणों को डीवीडी, एमपीथ्री, यूट्यूब आदि के ज़रिए बर्मा में फैलाया जाने लगा और फिर बौद्ध अपनी रक्षा के लिए हथियार उठाकर मुसलमानों से लड़ने लगे।

यही वो समय था जब इंटरनेशनल मीडिया को ये बात पता लगी। जब तक रोहिंग्या का आतंक एकतरफ़ा था, किसी को कोई चिंता नहीं थी। लेकिन बौद्धों ने जब आत्मरक्षा में हिंसा की तो दुनिया को चिंता हो गई। विराथु को वहाँ की सरकार ने 25 साल के कारावास की सजा दी, लेकिन जनता के दबाव में आकर उन्हें 2012 में छोड़ना पड़ा। मुसलमानों को पैसा मिलता रहा, और वो उग्र होते गए। विराथु ने सबके सामने तथ्यात्मक तरीक़े से बताया कि कैसे रोहिंग्या मुसलमान बौद्धों से शादी करते हुए औरतों को बच्चा जनने की मशीन की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और जनसंख्या में कैसे बढ़ोतरी हो रही है। इन सारी बातों को समझते हुए बौद्धों ने जिहादियों को उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू किया। बदली सरकार ने भी इन पर कड़ा रुख़ अपनाया और आज ये भागते हुए नज़र आ रहे हैं।

जिनका इतिहास ऐसा हो कि बौद्ध उनसे लड़ रहे हैं तो फिर ऐसे उपद्रवियों को आखिर शरण क्यों देना? ये जो मुसलमानों के हिमायती बन रहे हैं उन्हें मानवाधिकार की कोई चिंता नहीं। उन्हें अपने साथ खड़े होकर अपनी शरिया के समर्थन में आवाज़ लगाने वाले दस और हाथ मिलने का सपना दिख रहा है। उन्हें बंगालादेशी मुसलमानों द्वारा बंगाल और असम के तर्ज़ पर पूरे भारत का वही हश्र होता दिख रहा है। मंशा मानवाधिकारों की चिंता, बिलखते बच्चों की नहीं है। मंशा संख्या बढ़ाने की है।

यही मंशा उन लोगों में भी नहीं जो कि लम्बे लेख लिखकर मानवतावाद और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ करते नज़र आ रहे हैं। इन्हें इस समस्या को हिन्दू-मुसलमान में रंगना है ताकि मोदी को साम्प्रदायिक बताया जा सके। क्योंकि कैराना भी ध्रुवीकरण ही था, मथुरा भी वही था और कश्मीरी पंडितों तो खैर अब अपने ही देश में भूला जा चुका है। दो आँसू उनके नाम भी गिरा देते कि उन विस्थापितों ने कौन सा पाप किया है कि उन्हें अपने ही देश में, सारी कानून व्यवस्था होते हुए, अपनी ज़मीन से बेदख़ल कर दिया गया है? या ये भी साम्प्रदायिक मुद्दा हो जाएगा?

पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों का क्या हाल है? उन्हें रहने की ज़मीन और पीने को पानी भी मिल रहा है? इस बात पर भी आप सरकार को घेर लेते हैं कि हिन्दुओं को भी ये सरकार नहीं देख रही! बात ये है कि हिन्दुओं का तो और कोई है भी नही भारत के सिवा, मुसलमानों के लिए तो बहुत सक्षम राष्ट्र हैं जिन्होंने इन्हें ट्रेनिंग दी, फ़ंड दिए, उनके दरवाज़े क्यों बंद हैं? फिर आप माइक लेकर पहुँच जाएँगे कि इन्हें सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा, पानी और भोजन नहीं दे रही। जिस सरकार के पास अपनी जनसंख्या के लिए ही इन सुविधाओं के नाम पर कुछ खास नहीं उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरने के लिए आप प्राइम टाइम करेंगे और उसमें रोते हुए नज़र आएँगे।

अंततः बात यह है कि साम्प्रदायिक तो वस्तुतः आप ही हैं। आपको समस्या चाहिए। नई समस्याएँ, ट्रेंडिंग समस्याएँ ताकि मोदी को हर बार घेरा जा सके। इसी ट्रेंड में उलझकर आप अचानक से देश के हर हॉस्पिटल के बच्चों के वार्ड से उनकी मौत का आँकड़ा जुटाने लगते हैं जैसे कि इन्फैंट डेथ इस देश में नई बात है, और पिछले तीन सालों में इनमें भयंकर वृद्धि हो गई हो। आप जयपुर के दंगों पर चुप हो जाते हैं और नया ट्रेंड खोजने लगते हैं।

आपलोग बेशर्म और बेगैरत हैं। वो इसलिए कि समाज के लिए असली कोढ़ मोदी जैसे नेता नहीं, आप जैसे बुद्धिजीवी और पत्रकारों की जमात है जिसने समाज को दिशा देने की जगह अपने स्वार्थसिद्धी के आयाम तलाशने में ज्यादा मजा आता है। आपके पास ढंग के मुद्दे नहीं है सरकार को घेरने के लिए क्योंकि उसमें हिन्दू-मुसलमान का स्कोप नहीं। अशिक्षा और बीमारी से तो सारे धर्म के लोग जूझ रहे हैं, वहाँ आप क्यों बात करेंगे। उसकी बात तो आप साइड में जब कोई दुर्घटना होगी तब कर लेंगे।

एक समय सुब्रह्मण्यम स्वामी आपको दुनिया के सबसे बड़े अर्थशास्त्री लगेंगे, दूसरी तरह एक विचहंट करता वक़ील, तीसरी बार एक कम्यूनल नेता। वैसे ही रोहिंग्या मुसलमानों के लिए अश्रुधारा बहेगी क्योंकि चुनाव सर पर हैं, और मोदी आपके तमाम आर्टिकलबाजी से, अजेंडा फैलाने से रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। आप लोगों को, आपके मालिकों को, अपनी स्ट्रेटेजी भी नहीं पता और अमित शाह आकर तीन चौथाई बहुमत ले जाता है। फिर भी आपको लगता है कि सारा ज्ञान तो आप ही के पास है, और जनता मूर्ख है।

ग़ालिब की ग़ज़ल सुनते रहिए और माला लेकर हिन्दू-मुसलमान जपते रहिए, कभी तो आपके मतलब की सरकार आएगी और आपके अच्छे दिन भी लौटेंगे। रोहिंग्या पर मानवता का ज्ञान भारत सरकार को तो मत ही दीजिए, समस्या को बुलाकर, फिर उसको बढ़ने के लिए खाद-पानी देकर उसके बाद ये सोचना कि इससे कैसे निपटें, इससे बेहतर है कि बौद्धों को लड़ने पर मजबूर करने वाली इस भीड़ को मानवता के नाम पर इनके देश की अदालतों के सामने पेश किया जाय। निर्दोष होंगे तो बच जाएँगे, नहीं तो अपने करमों का फल भोगेंगे। भारत उनका देश नहीं है, यहाँ पहले से ही बहुत घुसपैठ हो चुका है। सरकार को आधार कार्ड वाले घुसपैठिए वोटों की दरकार नहीं है। जिनको थी, वो सत्ता में नहीं हैं।

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