सबरीमाला पर फ़ैसला: जेंडर इक्वालिटी, धार्मिक परम्पराएँ और धर्म

धर्म को आप या तो मानते हैं, या नहीं मानते। धर्म के भीतर के ईश्वर की सत्ता आप मानते हैं, या नकार देते हैं। इसमें बीच के रास्ते अगर आप बना रहे हैं तो आप भ्रम की स्थिति में हैं। यह बात भी जान लीजिए कि भ्रम की स्थिति भी कोई नकारात्मक स्थिति नहीं है। क्योंकि भ्रम से ही प्रश्नों का उदय होता है, और जिसे भ्रम का समाधान करना है, वो इनके उत्तर ढूँढता है। 

सनातन धर्म में हर तरह के दर्शन और मान्यताओं का सम्मान किया जाता रहा है। एकेश्वरवाद, बहुईश्वरवाद, साकार, निराकार, आस्तिक, नास्तिक, मंदिर जाने वाला, दिल में रखने वाला, पूजा और व्रत रखने वाले, सातों दिन मांसाहार करने वाले, पवित्रता की हर सीढ़ी चढ़ने वाले, नहीं नहाने वाले आदि सारे लोग सनातनी हैं क्योंकि कहीं भी एक ही तरह की बात को मानने या मनवाने की बात नहीं है।

चूँकि कोई एक धर्मग्रंथ नहीं है, तो कहीं भी कोई कोड नहीं है कि पूजा इसी की हो, सर्वश्रेष्ठ इसी को माना जाए, यही जगह एक परम तीर्थ है, यही सबसे बड़े देवता हैं, इसी व्रत को रखा जाए आदि। कहने का मतलब यह है कि संदर्भ और आपके प्रश्नों के समाधान के हिसाब से हर विधि, हर देवता और हर व्रत अलग तरीके से किए जाते हैं। मतलब, किसी के लिए शिव महादेव हैं, तो किसी के लिए विष्णु की पूजा ही उनके लिए मनचाहा फल दे सकती है। कहीं गणेश सबसे आगे हैं, तो कहीं हनुमान।

फिर आगे, एक ही देवता के अवतार हैं, जो अलग-अलग गुणों और प्रकृति के हैं। शिव जहाँ पार्वती के पति हैं, वहीं शिव के अवतार हनुमान ब्रह्मचारी हैं। कहीं राम शिव की पूजा करते मिलते हैं, कहीं हनुमान राम के सबसे बड़े भक्त हैं। कहीं कार्तिकेय को गणेश से ज़्यादा प्राथमिकता दी जाती है, तो कहीं गणेश को कार्तिकेय से। ये तो बस कुछ बातें हैं जो मैं आगे की बात समझाने के लिए लिख रहा हूँ, बाकी बातें जानकार लोग बेहतर समझा पाएँगे।

सनातनी परम्परा कभी भी एक मत को स्वीकारने वाली नहीं रही है। एक तरह से बहुईश्वरवादी समाजों में हर मत के सम्मान की बात बुनियादी तौर पर दिख जाती है कि ये भी हिन्दू, वो भी हिन्दू। एक मत से मतलब है कि जिसको जिसे, जिस तरह से मानना है, उसे उसकी स्वतंत्रता है क्योंकि वो उसका सत्य है जो इसके अनुभवों का निचोड़ है। 

हमेशा ही सनातन परम्परा में सवालों को मान्यातओं से ऊपर रखा गया है इसीलिए इतने देवता, इतने तरह के मंदिर, इतनी उपासना पद्धतियाँ, प्रकृति के हर हिस्से के लिए ग्रंथ, हर तरह के ज्ञान और सिद्धी के लिए वेद आदि आते चले गए। इसमें कहीं भी, रुकने की बात नहीं है, न ही यह कहा गया है कि इस जगह पर ऐसा ही होना चाहिए। और जब हमने पूछा कि क्यों तो वो चुप हो गए। उसका एक कारण है, जो आपको बताया जाएगा, या आप सही आदमी से पूछिए। 

अब आते हैं सबसे पहले पैराग्राफ़ की बात पर। अगर आप मानते हैं कि कम्प्यूटर होता है, तो आपको ये भी मानना चाहिए कि कम्प्यूटर बिजली से चलता है, उसमें फ़लाँ सॉफ़्टवेयर से विडियो चलेगा, ये टाइप करेंगे तो वो होगा आदि। आप वीएलसी सॉफ़्टवेयर खोलकर ये नहीं बोल सकते कि यार कहा था कि कम्प्यूटर में तो टाइपिंग हो जाती है, यहाँ तो कुछ हो ही नही रहा!

उसी तरह धर्म को मानते हैं तो उसे उसकी पूर्णता में मानिए। आप सवाल कीजिए, बेशक और बेहिचक कीजिए लेकिन कम्प्यूटर पर पानी फेंककर ये आशा मत रखिए कि उसकी बैटरी चार्ज होने लगेगी। धर्म में मंदिर आते हैं। जब मैं मंदिर लिखता हूँ तो उसका तात्पर्य वैसे मंदिरों से है जो मंदिर बनाने के शास्त्र के हिसाब से बनाए गए हैं। हमारी-आपकी सोसायटी में जो मंदिर होते हैं, वैसे मंदिर भक्ति आंदोलन के खराब बायप्रोडक्ट हैं जिसके कारण ये बात प्रचलन में आ गई कि भक्त कहीं भी भगवान को रख सकता है।

ये भावना गलत नहीं है, लेकिन ये भावना है, और मंदिरों के बनाए जाने का अपना विज्ञान होता है। जो लोग इस बात को नहीं मानते, वो आगे न पढ़ें क्योंकि आपके लिए आगे कोरी बकवास ही लिखने वाला हूँ। मंदिर कहाँ बने, उसका गर्भगृह किस आकार में हो, कितनी दूरी पर हो, देवी-देवता की मूर्ति कहाँ रखी जाए, किस तरीके से प्राण-प्रतिष्ठा हो, किस तरह के पत्थर से मूर्ति और मंदिर बनें, सबका अपना एक तर्क और विज्ञान है। उस शास्त्र को ‘आगम शास्त्र’ कहते हैं जिसमें इन सारी बातों का विस्तार से वर्णन है। 

जो लोग ग्रह-नक्षत्रों को मानते हैं, या ईश्वरीय सत्ता को मानते हैं, उन्हें ये स्वीकारने में संशय नहीं होना चाहिए कि हर वस्तु की अपनी प्रकृति होती है जिसके कारण मानव प्रकृति प्रभावित होती है। जैसे कि कोई आदमी एकमुखी रूद्राक्ष पहनता है, कोई तीनमुखी, तो कोई पंचमुखी। हर आदमी, हर तरह के रूद्राक्ष नहीं धारण कर सकता, वरना उसके नुकसान भी हैं। यहाँ आप या तो रूद्राक्ष को मानते हैं, या नहीं मानते हैं। वैसे ही जो लोग अँगूठी में रत्न पहनते हैं, वो या तो रत्नों के प्रभाव को मानते हैं, या नहीं मानते हैं। आप ये नहीं कह सकते कि नीलम रत्न मानवों को प्राभवित करता है, मोती नहीं। या एकमुखी रूद्राक्ष काम करता है, तीनमुखी नहीं। 

जो लोग ईश्वर को मानते हैं, वो मंदिरों को मानते हैं, वो उन बातों को भी मानते हैं जो जानकार पुजारी या शास्त्र बताते हैं। जैसे कि हनुमान की उपासना महिलाएँ कर सकती हैं, पर आप उन्हें छू नहीं सकती। इसके पीछे तर्क यह है कि बजरंगबली की प्राण-प्रतिष्ठा किसी मंदिर या पूजाघर में होने के बाद उनमें उस देवता का एक अंश आ जाता है, और हमके लिए पत्थर की मूर्ति देवता हो जाती है। जब आप मूर्ति को देवता मानते हैं, और प्राण-प्रतिष्ठा कराकर स्थापित करते हैं, तो आप ये नहीं कह सकते कि मैं तो नहीं मानती कि हनुमान को छूने से उनका ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाएगा। 

हनुमान ब्रह्मचारी हैं, और उस मूर्ति में आपने उनको अंशरूप में स्थापित किया है तो उसी देवता की प्रकृति के बारे में आपको पता होना चाहिए। उसके बाद फिर बात आती है आपके इंटेंट की, आप किस भावना से उसे छूती हैं। बेशक देवता इस बात को समझ सकते हैं, और आपकी भूल माफ़ हो जाए, लेकिन जानबूझकर अगर आप चैलेंज करके देखने के लिए ऐसा करती हैं तो आपकी धर्म और हनुमान पर जो आस्था है, उस पर सवाल उठता है। 

इसके बाद, अगर आपको अपनी पूजा, उपासना का फल चाहिए चाहे वो सुख-समृद्धि हो, या मानसिक शांति, या कोई भी और बात, तो आपको अपेक्षित फल के लिए उचित पद्धति से चलना होगा। न कि आप शिव को लाल फूल से प्रसन्न करने जा रहे हैं, और बजरंगबली को बेलपत्र से। फिर बात वही है कि अगर आप देवता को मानते हैं, तो देवता किस चीज से प्रसन्न होते हैं, वो भी तो उसी ग्रंथ का हिस्सा है, तो उपाय भी वही कीजिए। वरना अगरबत्ती और धूप तो सबको देते हैं, देते रहिए। कौन से देवी-देवता को क्या पसंद है, क्या नहीं, यह भी पुराणों में वर्णित है। 

अगर आप उपासना के तरीक़ों में मिलावट कर रहे हैं, तो फिर आपको फल भी उसी अनुपात में मिलेगा, मिलावटी। किसी भी वस्तु को, व्यक्ति को, मशीन को सटीक तरीके से  कार्य करने के लिए एक तय सेटिंग चाहिए। जैसे कि आपको थ्रीडी गेम का आनंद लेना है तो आपके पास अच्छे प्रोसेसर वाले कम्प्यूटर के साथ, अच्छे उपकरण, बिजली, एसी और गेम के तमाम नियमों का पता होना ज़रूरी है। आप एक गर्म कमरे में, कम प्रोसेसर स्पीड के कम्प्यूटर पर, कम जानकारी के साथ गेम खेल तो लेंगे लेकिन आप उस स्तर तक नहीं जा पाएँगे जहाँ वो व्यक्ति जा पाएगा जिसे हर चीज का उचित सेटअप पता है। 

तो सबरीमाला में जो देवता हैं, उनकी प्रकृति ब्रह्मचारियों वाली है, और आप वहाँ, वहाँ के स्थापित नियमों के साथ छेड़-छाड़ करके जा रही हैं, तो आपको मनोवांछित फल नहीं मिलेगा। यहाँ आप सामाजिक व्यवस्थाजन्य जेंडर इक्वैलिटी की बात को गलत तरीके से समझने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि अगर यहाँ स्त्रियों का जाना वर्जित नहीं रहा तो क्या मूर्ति के पास बैठकर मांसाहार सही होगा? वहाँ क्या जूठन फेंक सकते हैं? क्योंकि मांसाहार तो संविधान प्रदत्त अधिकार है कि हमारी जो इच्छा हो, हम खा सकते हैं। यहाँ मंदिर को आप एक स्थान मात्र नहीं, देवस्थान मानते हैं इसलिए आप उसके नियमों को भी मानते हैं कि यहाँ मांसाहार वर्जित है। कल को संवैधानिक अधिकारों के नाम पर मंदिर में मांस ले जाना भी सही कहा जाएगा क्योंकि बस स्टेशन में तो मना नहीं होता!

अब बात यह है कि दो अलग विषयों को एक तरह से देखकर एक निर्णय दे दिया गया। आप अपनी समझ से ये बताइए कि जो इस देवता को मानते हैं, वो क्या इसी देवता के लिए बनाई गई पद्धतियों को मानने से इनकार कर देंगे और मनोवांछित फल की आशा रखेंगे? वो लोग पहले भी नहीं जाते थे, वो अब भी नहीं जाएँगे।

तो फिर जाएगा कौन? यहाँ पर बात आती है मंदिरों के दूसरे फ़ंक्शन या उपयोग की। अब मंदिर सिर्फ मंदिर नहीं रहे, वो स्थापत्य कला के बेहतरीन नमूने भी हैं। इसलिए मंदिर अब धर्म से बाहर निकलकर सरकार के पर्यटन के स्कोप में आ गया। अब वहाँ सिर्फ पूजा नहीं होती, अब वहाँ लोग घूमने भी जाते हैं। 

हिन्दुओं के साथ ये समस्या रही है कि उनके मंदिरों के मालिक सरकार हैं, न कि मस्जिदों या चर्चों की तरह कोई धार्मिक संस्था। तो इसमें मंदिर का काम सिर्फ पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं रहा, अब उससे सरकारों को आमदनी होती है और इसी कारण वो मंदिर भी हैं, पर्यटन स्थल भी। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट जेंडर इक्वालिटी की बात करती है तो वो मंदिर के पर्यटन स्थल के लिए है, न कि पूजा स्थल के रूप में। क्योंकि धार्मिक आस्था को मानकर तो ये फ़ैसला दिया ही नहीं जा सकता। चूँकि, यह बात भी साबित नहीं हो सकती कि वहाँ जाने से लाभ हुआ, तो फ़ैसला सही है या गलत यह भी भविष्य में पता नहीं चलेगा। कोई आपदा आई तो वो दैवीय है या मानवीय यह फ़ैसला उसी आधार पर होगा कि आप कहाँ खड़े हैं।

पर्यटन स्थल में धर्म नहीं है, मंदिर में है। जो मंदिर में पूजा करने जाता है वो मंदिर के तौर-तरीकों को मानेंगे। नहीं तो बात वही है कि एकमुखी रूद्राक्ष पहनकर तीनमुखी के फल की आशा करना मूर्खता है। जो धर्म में आस्था रखते हैं, देवताओं से आशा रखते हैं कि वो उनके कष्टों का निवारण करे, वो उसी देवता के लिए बनाए गए तरीक़ों से चलेंगे तो फल की प्राप्ति होगी। या तो व्यक्ति खुद सारे शास्त्र पढ़कर तय करे कि मंदिर जाना है कि नहीं, या फिर ये फ़ैसला शास्त्रों की जानकारी रखने वालों पर छोड़ दे। 

सेल्फी लेने की ही बात है, तो उन्हें पहले भी मंदिर के धार्मिक नज़रिए से मतलब नहीं था, आज भी नहीं होगा। जेंडर इक्वालिटी सामाजिक बात है, धार्मिक नहीं। धर्म में जेंडर का स्कोप ही नहीं, वहाँ तो सब मनुष्य हैं, जीव हैं। वहाँ हर व्यक्ति के लिए अलग कार्य हैं। इस व्यवस्था को ट्विस्ट कौन करता है? समाज। इस समाज में भेदभाव है, लेकिन किसी भी ग्रंथ में भेदभाव की बात नहीं है। यह बात ज़रूर है कि हर तरह के व्यक्ति के लिए अलग तरह की बातें हैं, लेकिन उसे भेदभाव नहीं कहते। 

ऑपरेशन थिएटर में सर्जन और नर्स जाते हैं, न कि एक शिक्षक। तो क्या हर जगह, हर व्यक्ति को जाने की अनुमति होनी चाहिए। अगर शिक्षक चला भी गया तो क्या वो सर्जरी करेगा, या सर्जरी देखेगा? जब आप धर्म के होने को, मंदिर के होने को स्वीकार रहे हैं तो फिर उसके धार्मिक नियमों को सामाजिक मानदंडों के आधार पर क्यों तौल रहे हैं? या तो सुप्रीम कोर्ट यह कह दे कि धर्म कुछ भी नहीं है, हर बात में सबसे ऊपर संविधान है, और चूँकि वहाँ हर नागरिक समान है तो हर नागरिक को हर धार्मिक जगह पर जाने की अनुमति होनी चाहिए। 

हर धार्मिक स्थल के अपने नियम हैं, और उसके पीछे तर्क हैं। हो सकता है कि आपको तर्क समझ में न आए, हो सकता है कि आपका नज़रिया अलग हो, हो सकता है कि मंदिर आपके लिए पत्थरों से निर्मित एक घर लगे, तो ज़ाहिर है कि आप उसकी धार्मिकता को परे रखकर ही फ़ैसला लेंगे। जेंडर इक्वालिटी के नाम पर सुप्रीम कोर्ट पुरुषों को माहवारी के दर्द से गुज़रने का आदेश भी दे सकता है। वो कह सकता है कि पुरुषों को एक टैबलेट लेना होगा ताकि उन्हें ये दर्द महसूस हो।

यह बात भी लगभग तय ही है कि जो लोग सबरीमाला में पूजा करने जाते हैं, उन में अब भी महिलाएँ नहीं ही होंगी। ये पूरी योजना ही फ़र्ज़ीवाड़ा है जिसकी जड़ में एक एनजीओ खड़ा मिलता है। आपको अगर लगता है कि केरल की महिलाएँ वहाँ पूजा करने जाने लगेंगी तो आप गलत हैं। वहाँ कुछ दिनों तक कुछ लोग तख़्तियाँ और छद्मनारीवाद का झंडा लेकर जाएँगे, सप्ताह भर कुछ आर्टिकल छपेंगे कि कैसे ये नारीवाद की जीत है, और फिर कुछ नहीं होगा।

जो अयप्पा की पूजा करके फल की इच्छा रखते हैं, वो एनजीओ और छद्मनारीवाद के रास्ते से नहीं चलते। इस एनजीओ का उद्देश्य भी महिलाओं का उत्थान तो बिलकुल नहीं होगा, इसका उद्देश्य वही है जो आप समझ रहे हैं: हिन्दू आस्था और प्रतीकों पर हमला। इसलिए, हर ग़ैरज़रूरी जगह पर ये झंडे उठाए जाते हैं, और इसे मानवता की जीत बता दिया जाता है। 

जबकि शणि सिंगणापुर के मंदिर कोई गया हो कोर्ट के फ़ैसले के बाद से, तो मुझे ये बता दे कि कितनी महिलाएँ शणिदेव को छूती हैं। बात घूमकर वहीं आ जाती हैं कि आप मानते क्या हैं? क्या आपकी आस्था के लिए मंदिर और उसके अंदर का भगवान बड़ा है, या कोई सुप्रीम कोर्ट? जो कोर्ट को मानते हैं उनके लिए वैसे भी मंदिर पत्थर का घर है, और जो भगवान को मानते हैं, वो मंदिर के नियमों के ख़िलाफ़ कभी नहीं जाएँगे। 

अंततः फ़ैसला एक टोकनिज्म के अलावा कुछ भी नहीं। सामाजिक व्यवस्था के लिए तमाम आदेश आते हैं, जहाँ विकल्प है, वहाँ आदमी विवेक से चलता है। जहाँ सुप्रीम कोर्ट ये कह देगा कि हर दिन पाँच हजार महिलाओं को सबरीमाला जाना ही होगा, तब देखते कि कितनी महिलाएँ अंदर जातीं। इसलिए, समाज और धर्म को एक ही मानकर, मंदिर को पूर्णतः पर्यटन स्थल मानकर उसमें जेंडर इक्वालिटी का तड़का मत लगाइए। हर बात, हर जगह लागू नहीं होती। अगर हो पाती तो मुस्लिम महिलाएँ भी हर मस्जिद में नमाज़ पढ़ पातीं और एक एनजीओ इसी सुप्रीम कोर्ट में इसे लागू करने के लिए लगातार प्रयत्न करती रहती। 

#sabarimala 

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