सचिन: अ बिलियन ड्रीम्स: अपर क्लास हिन्दू मेल ब्राह्मण का फ़र्ज़ी ग्लोरिफिकेशन

लोग भले ही वाहवाही दें कि ग़ज़ब की डॉक्यूड्रामा है, ग़ज़ब का निर्देशन है, और भी पता नहीं क्या-क्या लेकिन मेरे लिए ये फ़िल्म एक निरर्थक प्रयास है देश की आम जनता पर हिन्दुओं के अपर कास्ट मैन्टेलिटी को ज़बरदस्ती थोपने का। बार-बार मंदिर के दृश्य दिखाना, घर में मूर्ति दिखाना, समंदर में मूर्ति विसर्जन करते हुए दिखाना हिन्दुओं के प्रतीकचिह्नों द्वारा अल्पसंख्यकों की भावनाओं को आहत किया जाने वाला प्रयास है। वो भी रमज़ान के महीने में रिलीज़ करना तो निहायत ही साम्प्रदायिक अजेंडा लगता है।

दो चार जगह फ़िल्म ने सेकुलर होने की नाकाम कोशिश भी की है जहाँ लोग टोपी पहनकर नमाज़ पढ़ते दिए गए मानो मुसलमान तो बस नमाज़ ही पढ़ते हैं। मुंबई हमले दिखाने की क्या ज़रूरत थी? पाकिस्तान को बार-बार हराते हुए दिखाने का क्या उद्देश्य था? देश के अल्पसंख्यक समुदाय को यही बताना ना कि एक हिन्दू अपर कास्ट ब्राह्मण मेल दूसरी जातियों, समुदायों को हर जगह से खदेड़ेगा?

पूरी फ़िल्म में क्या हुआ, या सचिन ने क्या किया से ज़्यादा ज़रूरी ये जानना है कि फ़िल्म में एक सफल स्त्री को एक सफल क्रिकेटर द्वारा ये कह देना कि उनमें से एक को अपना करियर त्यागना होगा। और किसने त्यागा? अंजलि ने। यूँ तो वो कहती नज़र आती है कि इसमें फ़ैसला उनका अपना ही था लेकिन ये फ़ैसला अपना होकर भी अपना कब होता है? यही तो सोशल कॉन्सट्रक्ट है! यही तो कंडीशनिंग है कि क्रिकेट का खेल पीडियाट्रिक डॉक्टर से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।

आख़िर एक स्त्री कब तक इस तरह के सामाजिक दबाव को ‘देश’ जैसी ख़्याली आइडेंटिटी पर न्योछावर करती रहेगी और क्यों? सचिन क्या उन कश्मीरियों के लिए भी खेल रहे थे जिनके हाथों में सरकारों ने पत्थर थमा दिया? क्या सचिन उन तेलंगाना, पंजाब, नॉर्थइस्ट, हैदराबाद, गोवा के लोगों के लिए भी खेल रहे थे जहाँ के बारे में युगप्रवर्तक लेखिका अरुँधति रॉय का कहना है कि भारतीय सेना वहाँ के लोगों को सताती है? क्या सचिन उन मूलनिवासियों के लिए भी खेल रहे थे जो रोहित वेमुला को न्याय दिलाने के लिए आज भी प्रयासरत है? क्या सचिन केरल के उन लोगों के लिए भी खेल रहे थे जो मोदी सरकार के मवेशी व्यापार बंद कराने पर गाय को पब्लिक में काटते नज़र आते हैं?

क्या अंजलि तेंदुल्कर पीडियाट्रीशियन होते हुए भारत के लिए मेडिसिन का नोबेल नहीं ला सकती थीं? लेकिन नहीं! एक हिन्दू अपर कास्ट मेल की पितृसत्तात्मक सोच के कारण वो बस वो बनकर रह गई जो हर स्त्री रह जाती है! उसको माँ बनाया गया दो-दो बच्चों का। आप कहेंगे वो भी चाहती होगी। अरे क्या ख़ाक चाहती होगी? यही तो सोशल नोशन ऑफ द नॉर्मल है। आपने उसको बचपन से ही तैयार किया है कि स्त्री हो तो माँ बनो। उसकी कंडीशनिंग की गई है।

और हाँ, इस हिन्दू अपर कास्ट मेल की पितृसत्तात्मक सोच यहीं नहीं रुकी। उसकी बेटी क्या करती है ये पूरी फ़िल्म में नहीं दिखाया, ना ही बताया। अपनी दूसरी संतान पर अपनी असफल इच्छाओं का बोझ सचिन ने डाल दिया कि वो भी क्रिकेटर ही बनेगा। आप कहेंगे कि वो बनना भी चाहता हो। जी नहीं, एक बच्चे को आपने बैट पकड़ा दिया और कहा कि जाओ खेलो जबकि वो इंजीनियर भी बन सकता था। ये एक टिपिकल पितृसत्तात्मक सोच का नमूना है कि जो ख़ुद नहीं कर पाए वो बेटे से करवाएँगे। टेस्ट का वर्ल्डकप लेगा सचिन का बेटा, यही प्लानिंग चल रही है।

अंततः, फ़िल्म में ये कहीं नहीं दिखाया कि राज्यसभा में कितने दिन गए। ठीक है कि क्रिकेट पर फ़िल्म थी लेकिन राज्यसभा वाली बात भी तो दिखाते तभी तो पूरी बात बनती, आदर्श ग्राम वाला हिस्सा दिखाने से क्या होगा, संसद में भी तो जाना ज़रूरी है। वो तो नहीं दिखाया।

मुझे इस फ़िल्म से जितनी आशाएँ थी बिल्कुल, सेंट-परसेंट वैसी ही दिखाई गई। मैंने पहले से ही मन बना लिया था कि मुझे तो ऐसे ही देखना है चाहे वो कुछ भी दिखाएँ क्योंकि मैं उनमें से नहीं हूँ जो हॉलीवुड डायरेक्टर का नाम या फ़िल्म का कंटेंट देखकर समीक्षा कर दूँ। समीक्षा तो पहले ही मेरे दिमाग़ में हो चुकी होती है, फ़िल्म तो बस टाइमपास होती है।

~एक सेकुलर नारीवादी समीक्षक की समालोचनात्मक समीक्षा….

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