‘सेकरेड गेम्स’ एक बोरिंग, प्रेडिक्टेबल और दोहराव वाली सीरीज़ है

‘सेकरेड गेम्स’ देखनी शुरू की है। फ़िल्म बनाने वाले आदमी को धारावाहिक नहीं बनाना चाहिए, वरना वो एक बहुत लम्बी, बोरिंग फ़िल्म बना देता है। अनुराग कश्यप ने वही किया है। जो काम वो तीन घंटे में कर सकते थे, उसको पता नहीं कितने घंटे में कर रहे हैं। 

मैंने तीसरे एपिसोड तक देखा है और बोर होना शुरू हो गया। कहानी बहुत ही धीमी है, प्रेडिक्टेबल लगती है। जब आपको दिखता है कि नवाज़ुद्दीन अपने दुश्मन की बात कर रहा है तो, आपको ये भी लगता है कि उसकी हत्या होने वाली है। अनुराग कश्यप अपने आप को पाँचवी बार रिपीट करते नज़र आते हैं। हिंसा को क्लोज़अप में दिखाना, कटे हुए सर पर भिनभिनाती मक्खियाँ, एक अलग स्वैग वाला उभरता हुआ डॉन जो सोने के स्मगलर को जंगल की नदी में पत्थर से मार देता है… कितनी बार एक ही तरह की चीज़ दिखाकर टैरेन्टीनो बनना है अनुराग को?

इंडियन ऑरिजिनल के नाम पर वैसी चीज को खींचकर लम्बा किया जा रहा है तो तार-तार होकर बिखर रही है। ये कहानी बेकार के खिंचाव के साथ अपना कसाव खोती दिखती है। नवाज़ुद्दीन को हर फ़िल्म में अनुराग कश्यप फ़ैज़ल खान ही बनाकर रखना चाहते हैं। लुंगी पहनाकर, गाली दिलवाकर, पैसे का रौब दिखाने वाला एक डॉन। अनुराग की हर फ़िल्म में यही डॉन होता है। 

एक कलाकार को अपने आप को बेहतर, अलग और डायनमिक बनाने की कोशिश करते रहनी चाहिए। सैफ़ और राधिका आप्टे अंडर-यूटिलाइज्ड लगते हैं, और कहानी की पेस के साथ कुछ भी ऐसा नहीं कर पाते जिससे दर्शक उस तरफ़ देखता रहे। वो कोई काम देती है, सैफ़ वो कर देता है। प्लॉट में कोई ट्विस्ट नहीं। हत्या स्थल पर कार की चाभी मिली, आपने कार खोज ली, कार से घर का पता मिल गया, और वहाँ एक गुप्त तिजोरी में जाली नोटों की गड्डियाँ! ये दिखाने के लिए अनुराग कश्यप का नहीं, रोहित शेट्टी का भी डायरेक्शन चल जाएगा। 

जब आप ऐसे सीरीज़ देखते हैं तो आपमें उत्सुकता होनी चाहिए कि आप बैठें और सारे एपिसोड देख लेना चाहें। ‘चाहें’ से मतलब है कि हो सकता है आपके पास समय न हो, लेकिन आप सोचते रहें कि आगे क्या हो सकता है। दर्शक एक कसी हुई पटकथा के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करने लगता है। उसको लगने लगता है कि ये कहानी उसे जाननी चाहिए। 

इस हिसाब से ‘सेकरेड गेम्स’ असफल है। फ़र्ज़ी की नौटंकी के नाम पर देवता, राक्षस, हलाहल, अश्वत्थामा को घुसेड़ देने भर से वो जस्टिफाय नहीं हो जाता। अश्वत्थामा वाले एपिसोड में आपका अश्वत्थामा मर जाता है। हलाहल में सैफ़ अली खान को डिपार्टमेंट के साथ के लिए झूठ बोलने के विष पीने का ऑफ़र आता है। क्या ये हलाहल है? बस इतनी सी बात हलाहल है?

दूसरी बात जो सबसे बेकार लगती है, वो यह है कि एक फ़िल्ममेकर को, एक तय पटकथा में ज़बरदस्ती की विचारधारा नहीं घुसानी चाहिए। मुक्काबाज़ में वही किया, इसमें भी वही हो रहा है। जो कहानी है, उसमें निर्देशक की दख़लअंदाज़ी हो सकती है, लेकिन वो इतनी सहज होनी चाहिए कि बाहर से पता नहीं चले। वो एक महीन रफ़ू की तरह होनी चाहिए, न कि फटे कपड़े के ऊपर दूसरे रंग की सिली कतरन की तरह। 

मीडिया के रिव्यू पर तो मत ही जाइए। इनके समीक्षकों को अनुराग कश्यप, नवाज़ुद्दीन और राधिका आप्टे का नाम सुनकर ही चरमसुख प्राप्त होने लगता है। मतलब ये है कि ये लोग कहीं भी हों तो ऐसे चिरकुट समीक्षकों को लगता है कि एक मार्टिन स्कॉर्सेजी है, दूसरा जैक निकॉल्सन और तीसरी मेरिल स्ट्रीप। जबकि ये लोग उनकी एक बहुत बुरी फ़ोटोकॉपी भी नहीं कहे जा सकते। तो आपलोग जो ये हेडलाइन पढ़कर कि ‘नवाज़ शोज़ व्हाय ही इज़ व्हाट ही इज़’, ‘नवाज़ ओवरलैप्स सैफ़’, ‘अनुराग डज इट अगेन, मेक्स इंडिया इंटरनेशनल’, वाह-वाह करके आह भर रहे हैं, अपनी साँसों को बचाइए। क़ीमती हैं। 

आगे देखकर, फिर से समीक्षा करूँगा। 

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