सेकुलर राग: गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है!

बड़ी समस्या हो गई है। नहीं, लूज़ मोशन नहीं हुआ है। हाँ, कुछ सेकुलर लोगों को वर्बल डायरिया ज़रूर हो गया है। वैसे ये समस्या है नहीं। समस्या है कि कुछ लोग न सिर्फ पैदा हो गए हैं, बल्कि डार्विन के सर्वाइवल सिद्धांत को, फिटेस्ट ना होने के बावजूद, चुनौती देते हुए ज़िंदा बच गए हैं। अतः, सेकुलर राग छेड़ने का मन कर रहा है।

अब आप पूछिएगा कि हम आपको कहाँ ले जा रहे हैं। टेंशन मत लीजिए बीफ़ पार्टी पर या मुंबई नहीं ले जा रहे मुँह काला करवाने। वहाँ तो आप खुद मुँह काला नहीं करते जैसा कि मुहावरे में होता है। लोग इसे भौतिक रूप में अंजाम देने के बाद, दोबारा मुहावरे के रूप में भी इस्तेमाल कर देते हैं कि भई उनका तो मुँह काला हो गया!

ऊपर के दोनों पैराग्राफों में संबंध नहीं दिखता। कहिएगा, जे है से कि, एकदम्मे रैंडम हो गया। भाई साहब! रैंडम ही तो प्रचलन में है। यही तो ‘इन थिंग’ है डूड!

इस देश में रैंडम चीजें ही तो हो रही हैं लेकिन बहुत ही ऑर्गेनाईज्ड तरीके से। सबकुछ एक्सिडेंटली ऑन परपस हो रहा है।

बीफ़ काँड कितना रैंडम है। मतलब, ‘कहीं’ भी हो सकता था और ‘कहीं’ भी हो गया। दादरी में, एक रैंडम धर्म के लोगों ने दूसरे रैंडम धर्म के आदमी को जान से मार दिया। उसके बाद जो मीडिया में हुआ वो भी रैंडम ही है। साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाना भी रैंडम ही है। रैंडम ही तो कलबुर्गी की मौत से उपजा ‘सफोकेटेड एटमॉस्फेयर ऑफ़ इन्टोलेरेंस’ भी था। और रैंडम ही ग़ुलाम अली, अलीम दार, शहरयार आदि का विरोध भी है। इन सब रैंडम बातों का बिहार चुनावों से कोई लेना देना नहीं है।

रैंडम तो सड़क पर चलती गाय है। रैंडम ही तो हमारी समस्या भी है। समस्या ये है कि आप एक ही साथ हिंदू और सेकुलर नहीं हो सकते। ज्ञान की बात और है, पर कटु सत्य यही है कि हिंदू मात्र होना ही कम्यूनल होना है। ये ऋग्वेद में नहीं लिखा है, ये कुछ लोगों का दिमाग़ी फ़ितूर है। यही फ़ैशन है। और कपड़ों की पॉलिथिन के ऊपर प्रिंटेड ‘फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना करें’ वाली बात इस पर सटीक बैठती है।

आजकल आदमी सेकुलर होता नहीं, हो जाता है।

(बहुत गूढ़ बात कह गया हूँ नोट कर लीजिए और समझ में ना आए तो फिर पढ़िए।)

सेकुलर होना ‘इन्टेलेक्चुअल इंडस्ट्री’ में आईफ़ोन सिक्स एस का स्टेटस रखता है। लेकिन समस्या ये है कि वो चाईनीज़ माल होता है जिसके खोल पर एप्पल का लोगो होता है। और उसको ऑरिजिनल ‘दिखाने’ के चक्कर में इतना ज्यादा चमका देते हैं कि ऑरिजिनल से ज्यादा ऑरिजिनल लगने लगता है।

सेकुलरों की समस्या यही है। सेकुलर कहलाने के चक्कर में वो अपने मुखारविंदों से वो-वो बात कह जाते हैं जो सेकुलर कम और कम्यूनल ज्यादा होते हैं। माईनोरिटी के सपोर्ट में होना ज़रूरी है समाज के लिए, लेकिन उसके लिए मेजोरिटी के प्रति घृणा फैलाना ग़ैरवाजिब है। शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्ट की हत्या पर सेकुलर लोग ‘लाईन क्रॉस नहीं करने की बात करते हैं’ और हत्या को जायज़ कहतें हैं लेकिन राशिद इंजीनियर के ‘बीफ़ पार्टी’ देने के लिए मुँह पर स्याही फेंकना तालीबानी हो जाता है।

मैं स्याही फेंकने को जायज़ नहीं कह रहा, मैं तो वैचारिक दोगलापन और दिमाग़ी खोखलापन दिखा रहा हूँ।

गोमाँस खाने पर मनाही नहीं है। लोग खाते रहे हैं, खाते रहेंगे। पवित्र क़ुरान को कचड़े के डब्बे में फेंक दीजिए, कोई कुछ नहीं कहेगा जब तक आप वो दूसरों को बता नहीं रहे। आपकी स्वतंत्रता की सीमा दूसरे के चेहरे पर ख़त्म हो जाती है। गाय हमारी माता है और पवित्र क़ुरान हमारा धर्म ग्रंथ है। इसमें से सिर्फ एक बात मानकर दूसरे का मजाक बनाने की कोशिश करना दोगलापन कहलाता है।

आस्था के मापदंड नहीं होते। पाक क़ुरान या गीता अलग अलग लोगों के लिए अलग मायने रखती है। सेकुलर राग गाने वाले इसमें इन्ची-टेप लेकर सेकुलर-कम्यूनल नापने लगते हैं। माँ दुर्गा के दस हाथ कई ईसाईयों को और मुसलमानों को ‘राक्षसी’ लगते हैं। उसी तरह हर दाढ़ी वाला कईयों को आतंकवादी लगता है। दिक्कत क़ुरान या गीता के ग्रंथ होने में नहीं है। दिक्कत है जब क़ुरान ‘आकाश से प्रकट हुई है’ और ‘भगवान के दस हाथ नहीं, राक्षसों के होते हैं’, आप ये मानकर दूसरे का उपहास करते हैं।

ये कोई विज्ञान नहीं बता पाया कि क़ुरान किस फ्लाईट से आई थी या देवी दुर्गा के हाथ किस प्लास्टिक सर्जन ने लगाए थे। ये आस्था है। और इसका सम्मान होना चाहिए।

बस! इस पर वाद-विवाद नहीं होना चाहिए। हम मान रहे हैं कि ये पवित्र तो है ही, इसके साथ साथ ये हमारे जैसे मानवों की बुद्धि से परे है। और ये कि हम इस ब्रह्मांड में बहुत छोटे हैं। जो बात समझ में नहीं आती वो झूठी नहीं हो जाती। हमारी दिक्कत ये है कि हम रॉकेट बनाकर ये सोचते हैं कि हम सबसे समझदार हैं और फिर काली चमड़ी वालों को हैम की संतान बताकर ग़ुलामी कराते हैं, व्हाईट मैन्स बर्डन का झंडा लेकर सभ्यता का पाठ पढ़ाते हैं।

आस्था है इसीलिए क़ुरान के पहले ‘पवित्र’ लगाते हैं, और दुर्गा के पहले ‘माँ’। गाय को भी हम माँ कहते हैं। क्यों कहते हैं इस पर वाद-विवाद ही क्यों? कोई मानता है तो मानने दो, वो तुम्हारा कुछ लेकर तो नहीं भाग रहा? तुम्हें पार्टी देनी है तो घर के अंदर दो, उस रेस्तराँ में दो जहाँ क़ानून सहमति देता हो। ये क्या कि ‘पार्टी करनी है, हम पार्टी करेंगे’, जिसे जो करना है करे। फिर तो ‘जिसे जो करना था’ वो कर गया। आजतक नहीं सुना कि यूरोप में कोई बीफ़ बर्गर खा रहा था और किसी ने उसके चेहरे पर स्याही फेंक दी!

फिर तो ये भी सोचो कि कोई पैग़म्बर का कार्टून भी तो बनाएगा और तुम्हें बताएगा भी कि कहाँ देख सकते हो। फिर तो किसी के ‘बर्न अ क़ुरान डे’ मनाने पर तुम्हें आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अगर आपत्ति होती है तो फिर ढोल पीट कर गाय क्यों खाते हो? एके सैंतालीस आईसिस के ‘अल्लाहु अकबर’ कहने वाले ‘इस्लाम रक्षक’ के अलावा ‘जय श्री राम’ का नारा बुलंद करने वाला ‘हिंदू भक्त’ भी तो पा सकता है। और ट्रिगर दबाना तो आजकल कोई बड़ी बात है नहीं!

इसीलिए मेरी इच्छा कभी सेकुलर बनने की नहीं हुई। कोशिश बहुत की कि आठ स्पीकर वाले चाईनीज फोन पर एप्पल का लोगो चिपका लूँ, लेकिन वो बार बार ओवरहीटिंग के कारण गिरता ही रहा। मैं भले हर रोज़ नहीं नहाता, अगरबत्ती जलाई ना हो कभी, गायत्री मंत्र नहीं पढ़ा हो अपने मन से।

लेकिन मैं हिंदू हूँ। और बहुत गर्व है इस बात का। लेकिन किसी दूसरे के मुसलमान होने पर, उसकी टोपी देखकर मुझे घृणा नहीं होती।

मैंने ना तो पाक क़ुरान को डस्टबिन में फेंका है ना ही बीफ़ पार्टी को सपोर्ट किया है। मैंने शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों को भी लताड़ लगाई थी और अख़लाक़ की मौत पर भी दुःखी था।

अगर आपको डंके की चोट पर गोमाँस खाने का शौक़ है, लेकिन मोहम्मद साहब का कार्टून नहीं देख सकते तो फिर आप भी डार्विन के सिद्धांत को चुनौती दे रहे हैं। बाकी, समझदार तो हैं ही आप।

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