फ़िल्म समीक्षा: विवेकशील निर्देशक बताता है कि ‘स्त्री’ की कहानी स्त्री की कहानी है

आमतौर पर जब हम एक हॉरर विधा की फ़िल्म की बात करते हैं तो एक अच्छे हॉरर फ़िल्म में कसी हुई कहानी, लगातार चौंकाने वाले सह-कथानक, संवादों और घटनाओं के साथ गुँथा हुआ बैकग्राउंड स्कोर, अच्छी एडिटिंग और डराने वाले दृश्यों का होना ज़रूरी समझते हैं। अगर फ़िल्म इनमें से कहीं भी चूकती है, तो वो एक कॉमेडी बन जाती है।

हालाँकि, कई हॉरर फ़िल्में अब कॉमेडी के तड़के के साथ भी बनती हैं, लेकिन अच्छी हॉरर कॉमेडी में आप कॉमेडी पर हँसते हैं, डर के दृश्यों पर नहीं। अमर कौशिक द्वारा निर्देशित इस ₹24 करोड़ की फ़िल्म ने ₹118 करोड़ सिर्फ दस दिनों में कमा लिए जो कि इसके कमर्शियल सफलता की कहानी भी कहता है। आमतौर पर राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर सप्ताह भर में सौ करोड़ कमाई करवाने वाले स्टार के रूप में नहीं देखे जाते। अगर ये फ़िल्म इतनी चली है, और दूसरे सप्ताह के गुरुवार को शालीमार बाग जैसी जगह के हॉल में 60% सीटों को भर रही है, तो मतलब है कि इसमें स्टार से ज़्यादा कुछ है। 

कहानी की बात करें तो सीधी सी कहानी यह है कि एक भूतनी/चुड़ैल/आत्मा है जो साल के चार दिन एक गाँव में आती है और मर्दों को लेकर भाग जाती है। इसी से छुटकारा पाने की कोशिश में तीन दोस्त (राजकुमार राव, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी), एक जानकार आदमी (पंकज त्रिपाठी) और एक लड़की (श्रद्धा कपूर) उसका पीछा करके योजनाएँ बनाते हैं। 

कहानी सीधी है, लेकिन कहीं भी उसका ग्राफ़ नीचे नहीं होता। वो आपको लगातार बाँधे रखती है। कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है कि लगे उसकी ज़रूरत नहीं थी। हर दृश्य में, हर सीक्वेंस में कुछ न कुछ होता रहता है, जो कहानी को आगे बढ़ाता है। चूँकि चुड़ैल की बात सबको पता है, इसलिए उसका आना और डराना हर बार नएपन के साथ नहीं होता। वो संभव भी नहीं है क्योंकि आमतौर पर भूतों का अपना एक तरीक़ा होता है, और वो उसी हिसाब से चलता है। 

फ़िल्म के नाम आजकल इतने वाहियात होने लगे हैं कि निर्देशक और कहानी लिखने वाले को उसके लिए गाली ही पड़ती है। इस फ़िल्म के साथ ऐसा नहीं है। ‘स्त्री’ शब्द एक नाम भर नहीं है, ये समाज के आधे हिस्से को समर्पित है। ‘स्त्री’ के साथ जो भी हुआ, वो स्त्रियों के साथ खूब होता है। इस फ़िल्म ने शानदार तरीके से एक जातिवाचक संज्ञा को, व्यक्तिवाचक बनाकर दिखाया है और वो हर तरीके से सही जान पड़ता है। इस शब्द को, इस पात्र को जितनी अच्छी ट्रीटमेंट निर्देशक ने दी है, और पटकथा लिखने वाले (राज निदिमोरू और कृष्णा डी के) ने लिखी है, आपको अनुभव होगा कि कैसे एक सामान्य से नाम के ज़रिए, संवादों को गूँथकर, घटनाओं को बुनकर समाज को संदेश दिया जा सकता है।

‘स्त्री’ एक पात्र है, शीर्षक पात्र है इस फ़िल्म में। और स्त्री जैसी भूतनी को चैन तब मिलता है जब समाज के सभ्य लोग ये समझते हैं कि उसे सम्मान चाहिए, लोगों का प्यार चाहिए, एक स्वीकृति चाहिए और एक अनकहा वादा चाहिए कि स्त्रियों को सताया नहीं जाएगा। ‘स्त्री’ के बारे में गाँव में भ्रांति रहती है कि वो एक वेश्या थी, और किसी से प्रेम तथा शादी होने के बाद सुहागरात मनाने से पहले ही उसे गाँव वालों ने जला दिया, तो उसे सुहागरात मनानी थी। निर्देशक ने इसे बहुत ही ख़ूबसूरती से नकारा है एक दृश्य में और इस भ्रांति को तोड़ा है। 

आप यह सोचिए कि वेश्या के प्रेम की बात, उसकी शादी की बात और फिर गाँववालों द्वारा एक तरह की ऑनर किलिंग की बात को, उसी गाँव के कुछ बच्चे जो अगली पीढ़ी के हैं, संवेदना के साथ सुनते हैं और सकारात्मकता के साथ चर्चा करते हैं कि जो हुआ वो गलत था। ये एक अच्छी कहानी और निर्देशन का द्योतक है।

इसी क्रम में आगे की बात करूँ तो पूरी फ़िल्म में अच्छे संवादों की भरमार है। अच्छे संवादों से तात्पर्य यह है कि जैसा सिचुएशन उसी तरह के संवाद। दोस्तों के बीच हल्का मजाक, सहज रूप में गँवई शैली और वहीं के मुहावरे (घोड़ा देखा नहीं कि शरीर पर घास उगा लिए) के साथ-साथ पोलिटिकल व्यंग्य का पुट भी कई बार मिलता है। पंकज त्रिपाठी के मुँह से ‘आधार’ के बारे में कही गई बात सुनकर मुस्कुराए बिना रहना मुश्किल है।

संवादों में ही महीन तरीके से नारी-विमर्श की बातें आपको पात्रों के मुँह से सुनने को मिल जाएँगी। ‘वो स्त्री है, पुरुष नहीं’ कहते हुए कन्सेंट की बात करना; ‘पढ़ी-लिखी है’ समझकर ये जताना कि चुड़ैल तक शिक्षित है। शिक्षित है, साक्षर ही नहीं। क्योंकि जो लिखा है, वो बात चुड़ैल समझती है। उसको लोगों से कष्ट है, फिर भी किसी की हत्या नहीं करती, बस अपनी बात कहना चाहती है। आपको इस तरह के तमाम दृश्य मिलेंगे जहाँ आपको लगेगा कि लिखने वाले ने हँसी-मजाक में ही बहुत गहरी बातें रख दी हैं।मुख्य पात्रों द्वारा जहाँ-तहाँ अंग्रेज़ी के शब्द या वाक्यांश फेंकना और पंकज त्रिपाठी द्वारा कुछ जगहों पर हिन्दी के पाठ्य पुस्तकों जैसी शैली का प्रयोग सहज रूप से आपको हँसाता है जैसे कि ‘स्त्री से बचने के तरीके निम्नलिखित हैं, क्रमांक एक…’ 

समाज की विसंगतियों पर ‘फ़्रेंडशिप’ जैसे शब्दों के द्वारा अच्छा प्रहार किया गया है। मानवीय संवेदनाओं को, असुरक्षा की भावना को और प्रेम जैसे रिश्ते को सही अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। ऐसा नहीं है कि नायक है तो वो डरेगा नहीं। नहीं, यहाँ नायक डरता भी है, और बताता भी है कि डर के मारे उसकी हालत खराब हो जाती है। नायक लार्जर देन लाइफ़ वाला फ़ील नहीं देता। वो डरपोक भी है, और मानवीयता को बरक़रार भी रखता है। भूतनी जब ज़्यादा ही डराने लगती है तो वो डरते-डरते एक लिमिट तक पहुँचकर उसे डाँट देता है। 

कैमरे का काम यूँ तो अच्छा है, लेकिन हर बार चौंकाने के लिए एक ही तरीके से, कैमरा को ज़ूम करते हुए पात्र के पास जाकर रोक देना, एक बोरिंग काम है। कम से कम एंगल तो बदला ही जा सकता था क्योंकि आधे से ज़्यादा काम तो बैकग्राउंड स्कोर का होता है दर्शकों को शॉक देने के लिए। शहर का पैनोरमिक व्यू अच्छा है, लेकिन फिर भी कई जगह और ख़ूबसूरती से फ़िल्माए जा सकते थे। रात के दृश्य, और व्यस्त गलियों में एक तरह का ख़ालीपन या नैराश्य झलकता है। चहल-पहल या रंगों की कलाकारी नब्बे प्रतिशत हिस्से से गायब दिखती है। 

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर ने फ़िल्म को अच्छे से थामा है। कहानी के कसाव को बेहतरीन तरीके से सप्लीमेंट किया है बैकग्राउंड म्यूज़िक ने। फ़िल्म में कई जगह एक तेज़ी है, पेस है और आप पात्रों के चलने को, दौड़ने को, डर का उसके अंदर पहुँचने को, इन्हीं बीट्स और थम्प्स के सहारे जीवंत पाते हैं। आप लगभग पात्रों की मनोस्थिति तक पहुँच जाते हैं संगीत के ज़रिए। गीत-संगीत के मामले में भी एक गाना बहुत ही अच्छा बन पड़ा है, जिसमें नोरा फतेही ने अच्छा नृत्य किया है। 

सारे पात्रों का अभिनय कमाल का है। आपको कहीं भी, कोई भी पात्र ओवर द टॉप जाता नहीं दिखता। जिस तरह से पात्रों की ग्रोथ होती है, आपको एक भी शब्द ग़ैरज़रूरी नहीं लगता। राजकुमार राव नायक है, लेकिन वो गली का लौंडा ही है जिसे डर भी लगता है। उसके दोस्त भी गली-मुहल्ले के वैसे ही लड़के हैं जैसे होते हैं। पंकज त्रिपाठी की अदाकारी इतनी अच्छी है कि बॉलीवुड की औसत फ़िल्मों के बीच, ऐसी एक्टिंग देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। इसके लिए निर्देशक का शुक्रिया कि उन्होंने एक्टर को खुलने का मौका दिया। कई संवाद इम्प्रोवाइजेशन के परिणाम हैं। श्रद्धा ने भी अपने पात्र के साथ न्याय किया है। 

एक अच्छे हॉरर फ़िल्म में एडिटिंग का बड़ा हाथ होता है। इस फ़िल्म में यूँ तो किसी तरह के कॉम्पलेक्स एडिटिंग का स्कोप नहीं था, फिर भी जिस तरह की फ़िल्म है, और जैसे वो एक लीनियर तरीके से चलती है, एडिटिंग अच्छी ही है। जहाँ चूक लगती है, उसमें कैमरे के शॉट्स का दोहराव है। मुझे नहीं पता कि हर बार नायक को नायिका एक ही तरीके से क्यों चौंकाती है। या, बार-बार एक ही काम को करने की ज़रूरत ही क्या थी। 

कुल मिलाकर ये फ़िल्म एंटरटेनमेंट के लिए देखी जानी चाहिए, सामाजिक संदेशों के लिए देखी जानी चाहिए, प्रोत्साहन देने के लिए देखी जानी चाहिए। इस फ़िल्म को इस नज़रिए से देखिए कि हॉरर फ़िल्म से कैसे कई सामाजिक बुराइयों – लिंगभेद, अशिक्षा, प्रेम जैसे भाव को लेकर नासमझी आदि – की बात करते हुए, सूक्ष्म स्तर पर जाकर अच्छी बातों को चर्चा के लिए छोड़ा जा सकता है। 

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