आत्महत्या हत्या नहीं, आत्मज्ञान का मसला है

आदमी बहुत ही ज़िद्दी, अपने आप से भरा हुआ और अपने ही अनुभवों को अंतिम मानने वाला प्राणी होता है। उसे लगता है कि हर सुबह वो जग जाएगा, जबकि लाखों लोग नहीं जगते। वो मर जाते हैं। उसे लगता है कि फ़लाँ चीज़ जो किसी के साथ हुई, उसके साथ नहीं होगी। उसे लगता है कि इस समस्या से तो वो पार पा गया, तो दूसरे को भी इसका सामना करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

यूँ तो धरती पर की चीज़ें हमें एक ख़ास ऑर्डर में दिखती हैं। सुंदरता समरूपता (सिमेट्री) में, गोल्डन रेशियो में दिखती है। ट्रेन चलती है, हवाई जहाज़ उड़ते हैं, इमारतें खड़ी हो जाती हैं, सब कुछ होता है, जैसे विज्ञान उसे होने देना चाहता है। रॉकेट का लॉन्च असफल रहे तो ग़लती ढूँढी जाती है कि क्या ग़लत किया। कुछ चीज़ों पर हमने नियंत्रण पा लिया है, तो हमें लगता है कि ये ज्ञान की पराकाष्ठा है। जबकि, जिसे आत्मज्ञान हो जाता है, वो सबकुछ जानने के बाद भी कहता है कि उसे कम ही पता है।

ब्रह्माण्ड के उदय से लेकर आजतक, चौदह अरब वर्ष बीत चुके हैं। इसकी शुरुआत एक अनियंत्रित तरीक़े से हुई थी, और वो रैंडमनेस, अराजकता, बढ़ती ही जाती है। चीज़ें बाहर निकलीं, तो निकल ही रही हैं। वो फैलती जाती है, दिशाहीन, बिना विज्ञान के नियमों का पालन करते हुए। विज्ञान ये कह देता है कि ये हो रहा है, क्यों हो रहा है, इसका जवाब नहीं है। विज्ञान यहाँ आपको कारण नहीं देता, बस ऑब्जर्वेशन दे देता है कि ऐसा है, वैसा है। विज्ञान को डार्क मैटर समझ में नहीं आया तो उसको डार्क मैटर कह दिया। डार्क एनर्जी की समझ नहीं बनी तो डार्क एनर्जी कह दी।

जब आप आत्महंता आईएएस मुकेश पाण्डेय का विडियो देखेंगे तो आप पाएँगे कि उसने एक बात कई बार कही है कि उसे आदमी होने का मतलब समझ मे नहीं आ रहा। हम यहाँ क्यों हैं, क्या कर रहें, इन सवालों के जवाब वो खोज रहा था। साथ ही कुछ समस्याएँ कहीं जो परिवार को लेकर थी। लेकिन बार-बार कहता रहा कि मौत का कारण वो नहीं है। मौत का कारण ये है कि उसे अपने होने का मतलब समझ में नहीं आ रहा था।

उसने कहा कि वो समाज में, या मानवता के लिए क्या करे ये समझ से बाहर है। क्योंकि वो जो भी करता, उससे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, ऐसा उसने सोचा। तप करने, समाज सेवा का भी ख़याल आया पर वो नकार दिया गया क्योंकि उसने पूछा कि जो ऐसा कर रहे हैं, वो क्या कर रहे हैं। क्या उससे मानवता को कोई फ़ायदा है, समाज में कोई बदलाव है। उसके लिए जवाब था कि नहीं। इसी मतलब के ना होने को लेकर, ना समझ पाने के कारण, उसने सोचा कि अब जीना बंद कर देना चाहिए।

पहले बात करते हैं कि चीज़ों का मतलब क्यों नहीं है। कल ही गोरखपुर में बच्चों के मौत की घटना सामने आई, लोग विचलित हो गए। कभी किसी का क्रूर तरीक़े से बलात्कार और हत्या की ख़बर आती है। कभी कोई देश किसी पर बम गिरा देता है। तरह-तरह से विद्वेष और वैमनस्य की भावनाओं को बढ़ावा दिया जाता है। कुल मिलाकर समय के साथ-साथ नकारात्मकता बढ़ती दिखती है। इसी नकारात्मक माहौल में हम, आप, सब लोग अर्थ तलाशते हैं। किसी को वो अर्थ परिवार में, दोस्तों में, पढ़ाई में, नौकरी में, अपने को खोजने में, पैशन को तराशने में मिलता है। लेकिन सबको वो अर्थ नहीं मिलता। कुछ लोग इसी खोज में रहते हैं, कुछ को लग जाता है कि अर्थ की आशा ही व्यर्थ है।

मेरे हिसाब से ज्ञान दो तरह का होता है। पहला वो कि आपको हर चीज़ के होने, ना होने, आगे होने का मतलब पता होता है। आपको पता होता है कि क्या है, क्या नहीं है, क्या हो रहा है। या आप ये मान लेते हैं कि आपको पता है। ये कोई योगी हो सकता है, और कोई सामान्य आदमी। योगी के लिए तमाम विषय हैं जिसे वो जानने लगता है, अनुभवों से, ध्यान से, विद्या से। सामान्य आदमी का दायरा सीमित होता है तो वो परिवार को, नौकरी को, सरकार को अपने अनुभवों के हिसाब से समझने लगता है। ये भी उसका आत्मज्ञान ही है। वो भी प्रबुद्ध है। जिसका दायरा जितना है, जितनी चीज़ों से उसका वास्ता है, उतने भर की चीज़ें उसे समझ में आने लगती हैं, वो उसी में जीता है। फिर एक दिन सामान्य या असामान्य मौत से मर जाता है।

दूसरे तरह का ज्ञान वो है जब आपको ये लगता है कि किसी भी चीज़ का कोई मतलब नहीं। अर्थ यह है कि, आपके लिए उनका होना, या ना होना बराबर ही है। इसमें भी दो तरह की अवस्था, या अनुभव हैं। एक वो है जिसने काफ़ी कुछ समझ रखा है, पढ़ा है, अनुभव किया है, और उसे उसकी लगातार खोज के बावजूद चीज़ों का अर्थ समझ में नहीं आता। दूसरा वो है जो अर्थ खोजने के अनुभव में जाना नहीं चाहता क्योंकि वो सिर्फ बात से आश्वस्त होता है कि चीज़ों का सच में कोई मतलब नहीं। चीज़ें बस हैं, और उसके होने का इन चीज़ों के बीच क्या औचित्य है, ये उसे पता नहीं चलता।

फिर बात आती है आत्महत्या की। क्या ये हत्या है या फिर जीना बंद कर देना है। जिंदगी को बंद करने, या रोकने के दो तरीक़े हैं। एक तो मौत है, दूसरा अपने शरीर को उस अवस्था में रखवा देना है ताकि आप अपनी मर्ज़ी से दोबारा दुनिया में ज़िंदा हो सकें। ये थ्योरेटकिली संभव है, इस पर विज्ञान काम कर रहा है कि शरीर के मेटाबोलिज्म को रोक कर, उसे सुलाया जा सकता है। इसमें ख़र्च बहुत ज्यादा आता है। या फिर आप योग साधना से ऐसा कर सकें तो अलग बात है। फ़िलहाल यही तरीक़े हैं और ज़िंदगी से उब जाने के बाद, उसे रोकने का तरीक़ा मौत ही दिखता है। आदमी मशीन हो जाए तो वो खुद को बंद कर सकेगा, और समय आने पर खुद को प्रोग्राम करके उठकर देख लेगा कि मानवता ने उसके सवालों का कोई जवाब तैयार किया है कि नहीं।

आत्महत्या ज़िंदगी से मतलब के चले जाने, या मतलब के ना होने के ज्ञान के बाद की अवस्था है। इसमें हत्या शब्द लगाने से ये एक अपराध जैसा सुनाई देता है। आदमी अपनी मर्ज़ी से पैदा नहीं होता, वो अपने माता-पिता की इच्छा से पैदा होता है। फिर वो एक समाज में, जिसका अपना सुव्यवस्थित ढाँचा है, कार्यप्रणाली है, बड़ा होता है। इसके बाद भाषा, संबंध, जगह, जाति, धर्म, क्लास, स्टेटस जैसी बातों से कंडीशन होता रहता है। उसकी पॉलिशिंग होती है कि यही जीवन है क्योंकि अधिकांश लोग ऐसे जी रहे हैं। अमूमन, ये नया बच्चा भी वैसे ही जीने लगता है क्योंकि मानवता आमतौर पर ‘अधिक लोगों के एक जैसा होने और करने’ के कारण ही चलायमान है।

हमने कहानियाँ बनाई, धर्म बनाए, परिवार बनाए और फिर उसमें बच्चे पैदा होते रहे, बड़े होते रहे। ये एक अच्छे तरह से सर्विस की हुई मशीन की तरह बेआवाज चलता रहा। फिर इसमें ब्रह्माण्ड के अराजकता का गुण घुसा और समय के साथ-साथ वो भी बढ़ने लगा। अपराध होने लगे, सीमाएँ खिंचने लगीं, पहचान दिये जाने लगे। फिर वैसी घटनाएँ हुईं जिससे ईश्वर की सत्ता पर सवाल उठने लगे कि लिस्बन जैसे शहर में किसी पवित्र रविवार को, किसी संत के जन्मदिवस पर, भूकम्प क्यों आया, उसके बाद सुनामी क्यों आई, और फिर घरों में आग कैसे लग गई। विश्वयुद्ध में वो क्यों मरे जिन्होंने हथियार देखा तक नहीं था? हीरोशिमा पर बम गिरने से हुई मौतों को किस ईश्वर की सत्ता ने स्वीकृति दी थी?

लोगों के पास सोचने के लिए आँकड़ा इकट्ठा होने लगा कि इनमें अर्थ क्या है, कहाँ है। वैसे ही आम इन्सान जब ये सोचने लगता है तो उसके पास सवालों के जवाब नहीं होते। वो जब हमारे पास आता है तो हम उसे अपने लिए नहीं, अपने परिवार के लिए जीने की सलाह देने लगते हैं। लेकिन सवाल सिमटकर वही रह जाता है कि क्यों जीना है परिवार के लिए? क्योंकि आपने जो सुझाव दिया, वो तो वो खुद ही तौल चुका है। फिर उसे ये भान होता है कि जवाब तो किसी के भी पास नहीं, जबकि उसमें मानवमात्र होने का ज़िद्दीपना बाकी है कि उसके अनुभव काफ़ी हैं। दूसरी बात ये है कि हर व्यक्ति को उस व्यक्ति तक पहुँचने का रास्ता भी नहीं दिखता जो उसके सवालों का जवाब दे सके।

ये जान लेना कि मेरे सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है, इस ज्ञान की उत्पत्ति करता है कि किसी के सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है। ये बात सच भी हो सकती है, और गलत भी। दोनों ही अवस्था में आपको पूरी दुनिया के तमाम विचारकों से मिलना होगा, जो कि असंभव है किसी भी एक इन्सान के लिए। ऐसा हम सबके साथ अलग-अलग बातों को लेकर होता है, और हम खुद को समझा लेते हैं। जैसे कि आप फोन ख़रीदने गए और पता चला कि आपका पसंदीदा रंग उपलब्ध नहीं है, ख़रीदने की इच्छा बलवती होती जाती है, तो आप समझा लेते हैं कि वो रंग भी तो अच्छा ही है।

कुछ लोग ये समझ जाते हैं कि दूसरों के लिए जीना अच्छा नहीं है। फिर वो ये भी समझ जाते हैं कि जीना ही अच्छा नहीं है। इनके सामने सवालों का ढेर है कि मैं कौन हूँ, मेरा पैदा होना क्यों हुआ, मैं ये क्यों पढ़ता हूँ, इस नौकरी के लिए इतनी मेहनत क्यों करूँ, बीवी से प्यार क्यों करूँ, प्यार ही क्यों करूँ, इस ढाँचे के हिसाब से क्यों रहूँ, पारिवारिक जीवन जीने से क्या मिलेगा, मिलेगा भी तो मुझे तो नहीं मिलेगा। इन तमाम सवालों के जवाब नहीं हैं। क्या ये स्वार्थी होना है? हो सकता है। लेकिन जो अपनी मर्ज़ी से नहीं आता, उसे इन सवालों के जवाब जानने का हक़ है। उसको आपके जवाब नहीं चाहिए जो आपके अनुभवों के हैं।

ये कायरता वाली हरकत नहीं है। जिंदगी को ख़त्म करना या तो एक प्रबुद्ध व्यक्ति के सवालों का अंतिम निष्कर्ष है, या फिर मानसिक रूप से रोगी व्यक्ति के द्वारा खुद पर लाई गई एक दुर्घटना। मानसिक रोगी को सीधे पागलपन से ना जोड़ें। इसमें वो भी हैं जो मानसिक सम्मोहन, ऑर्गेनाइज्ड माइंडवॉश, मनोरोग आदि के शिकार होते हैं। स्कूल जाता बच्चा भी ये सोचता है कि नंबर नहीं आए तो समाज में वो कैसे रहेगा, समाज उसे वैसे भी परेशान कर देगा, तो फिर ऐसे समाज में रहने से क्या फ़ायदा।

सवाल तो हमेशा ही रहेंगे, लेकिन जवाब ना मिलने पर ज़िंदगी के तमाम मतलब गौण हो जाते हैं। आपको लगेगा कि ये हारना है, लेकिन जो मरा, उसे शायद ना लगे। या लगेगा भी तो क्या? वो तो अब इस हार-जीत के बंधन से मुक्त है। अब उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि उसके होने का फ़र्क़ मानवता को नहीं पड़ रहा था। आपको ये लगता रहे कि ये आदमी कायर है, हार गया, अपनी बेटी के लिए ज़िंदा रहना चाहिए था। लेकिन क्या आपको लगता है कि उसने ये सोचा नहीं होगा जो ये कह रहा है कि मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा?

आदमी एक ज़िद्दी प्राणी है। अपने अनुभवों को वो पूरी मानवता का अनुभव मानता है। अपने अल्पज्ञान को वेदों का निचोड़ समझता है। वो सोचता है कि पूरी मानवता को उसके हिसाब से चलना चाहिए। क्या ये सही है?….

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