आत्महत्या हत्या नहीं, आत्मज्ञान का मसला है

जिंदगी को ख़त्म करना या तो एक प्रबुद्ध व्यक्ति के सवालों का अंतिम निष्कर्ष है, या फिर मानसिक रूप से रोगी व्यक्ति के द्वारा खुद पर लाई गई एक दुर्घटना।

छात्र आत्महत्या: समाज द्वारा सुनियोजित हत्या या आत्मज्ञान की पराकाष्ठा

विद्यार्थी की काउंसिलिंग, उसके बाप के साथ बैठकर समाज कर देता है कि भईया इसे तो आगे चलकर यही बनना चाहिए।

रोहित वेमुला: जब डिबेट ट्रॉलिंग और नीचा दिखाने तक सिमट जाए

फिर ये भी जान लो कि उसके मरने का और आगे उस जैसे के मरने में तुम्हारा बहुत बड़ा हाथ है क्योंकि तुमने उसकी मौत के कारण पर बात नहीं की थी, तुमने गाय खोजा था, तुमने उसके दलित होने का फ़ुटबॉल बनाया था, तुमने उसमें मोदी डाला था, तुमने उसमें हिंदुओं को ठूँस दिया था।

रोहित मर गया, और मरता रहेगा विश्वविद्यालयों के दंड-विधान के कारण

रोहित को मार डाला है इस तंत्र ने। इस हत्या का जिम्मेदार हमारा तंत्र है जहाँ विद्यार्थियों को काऊंसलिंग और बातचीत से समझाने की बजाय उसे बाहर निकाल दिया जाता है और उसके पढ़ने, बढ़ने का सारा ज़रिया रोक दिया जाता है। जब तक विरोध को दबाया जाएगा, कभी भी वाद-विवाद एक साकारात्मक मोड़ तक नहीं पहुँच सकता। तब तक ये समाज उसी गर्त मे गिरा रहेगा जहाँ है।

ज़िंदगी के तमाम सवाल और आत्महत्या

हास्य कलाकार महज़ एक कलाकार नहीं होता। वो समाज पर अपने ग़ुस्से को हास्य के रूप में प्रस्तुत करता है और उसे चलायमान रखता है। जब भी ऐसा कलाकार हमें छोड़कर जाता है तो सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं, बल्कि सच में, समाज का एक हिस्सा विलुप्त हो जाता है। सच है कि नए […]