किसी ने गाय से पूछा कि उसको गौरक्षकों की माता बनना है कि नहीं?

गाय के नाम पर किसी की जान लेना उतना ही उन्मादी है, जितना क़ुरान के पन्ने फाड़ने वाले को घेरकर मार देना।

गाय को लेकर सरकारी दोगलापन कहाँ तक ज़ायज है?

जब आप मोहम्मद को डिफ़ेंड कर सकते हैं तो गाय के साथ क्या दिक़्क़त है? जब ईशनिंदा के चक्कर में लोग जेलों में सड़ रहे हैं, तो फिर गौ हत्या पर कानून क्यों ना बने?

सेकुलर राग: गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है!

अगर आपको डंके की चोट पर गोमाँस खाने का शौक़ है, लेकिन मोहम्मद साहब का कार्टून नहीं देख सकते तो फिर आप भी डार्विन के सिद्धांत को चुनौती दे रहे हैं।