दंगों का दौर शुरु हो गया है, कमर-पेटी बाँध लीजिए

ये सच्चाई है कि पहले जो समाज हिंसक नहीं था, उसे अब हिंसक बनाया जा रहा है, या वो खुद ही एक का तुष्टीकरण देखकर हिंसक प्रवृति दिखाने लगे हैं। इस हिंसा और वोटबैंक का सहारा एक तरह के लोग उठाते रहे, अब दूसरी तरह के लोग भी दंगे करा रहे हैं, और आगज़नी में शामिल हैं।

अंकित की मौत ऑनर किलिंग नहीं, मुसलमानों द्वारा की गई नृशंस हत्या है

मैं उस मुसलमान से क्यों न डरूँ जो चंदन, नारंग, पुजारी, रवीन्द्र, अंकित की भीड़ हत्या पर चुप रहता है और अखलाख तथा जुनैद पर फेसबुक पर दिन में दस पोस्ट डालता है ये कहते हुए कि वो बहुत डरा हुआ है?

हर तीसरे दिन उठते जातीय बवंडरों का हासिल क्या है?

ये सारी बातें हुई नहीं, व्यवस्थित तरीक़े से हुईं। इसमें दुर्घटना को मुद्दा बनाया गया। डर का माहौल बनाया जाता रहा, ये कहकर कि डर का माहौल है। ये इतनी बार कहा गया, कि जो अपने बग़ल के गाँव में ईदगाह तक जाता था, वो अपने गाँव में मुसलमानों को दुर्गा पूजा के मेले में शक की निगाह से देखने लगा।

आप गलत को गलत कहिए, हम ज़रा धर्म-जात-राज्य पता कर लें…

ग़लती किसने की है, क्या इस भीड़ के सर पर टोपी है, क्या इस भीड़ के खड़े होने की जगह बंगाल या कश्मीर तो नहीं, अगर चुनाव है तो उसकी जाति निचली है कि नहीं। उसके बाद इनकी संवेदनाएँ जगती हैं।

मानवता, दंगे और ‘कम्यूनल दंगे’

काँग्रेस वाले दंगे जो होते हैं, उसमें मानवता नहीं मरती। वो कम्यूनल नहीं है। क्योंकि, पहली बात, मानवता को दंगे का पता चल जाता है और वो कुछ दिनों के लिए कहीं छुप जाती है और उसकी मौत नहीं होती और ना ही उसकी आँखो का पानी कोई देख पाता है।