वामपंथी लम्पट गिरोह चुप रहता है जब ‘गलत’ भीड़ ‘गलत’ आदमी की हत्या करती है

यहाँ न तो दलित मरा, न मुसलमान। उल्टे तथाकथित दलितों ने पुलिस वाले की जान ले ली क्योंकि उन्हें लगा कि वो जान ले सकते हैं। ये मौत तो ‘दलितों/वंचितों’ का रोष है जो कि ‘पाँच हज़ार सालों से सताए जाने’ के विरोध में है।

प्राइम टाइम २०: चुनावी मौसम में वेमुला, नजीब, मनु स्मृति की वापसी

एक सर्वे कीजिए। सड़क पर जाईए और हिन्दुओं से पूछिए कि क्या उन्होंने मनु स्मृति का नाम भी सुना है? पूछिए कि क्या उसका एक श्लोक भी जानते हैं? पूछिए कि क्या वो अपनी ज़िन्दगी मनु स्मृति के हिसाब से चलाते हैं?

दलित विमर्श का मौसम आ गया, मनु स्मृति को गरियाकर हिट हो जाईए

दलित बेचारा मरी गाय की खाल उतारने के चक्कर में पिटता रहेगा, क्योंकि वो फेसबुक पर नहीं है। काश वो फेसबुक पर होता तो अपना नेता ख़ुद ही होता।

विशेषणहीन दलित का कोई माय-बाप नहीं होता

एक आदमी को मशीन में पीस कर मार दिया गया और आप विशेषण खोज रहे हैं कि वो स्कॉलर है, भाजपा वाले राज्य में है, चुनाव होने वाले हैं की नहीं, इसपर बात करने से मेरे अजेंडे को क्या फायदा होगा …