प्राइम टाइम 29: जब सरकारें हमारा काटती हैं, और हम कटवाते हैं

  नमस्कार, मैं बहल जाने वाला आदमी! जी! मैं वही हूँ जो आप हैं, आपका ब्वॉयप्रेंड है, गर्लफ़्रेंड है, आपके बग़ल वाला आदमी है जो फेसबुक पर लिखे को लीगली बाइंडिंग और सार्वभौमिक सत्य मान लेता है। मैं वही हूँ जो व्हाट्सएप्प के मैसेज से विराट हिन्दू जैसा फ़ील करता है, और मैं वही हूँ […]

प्राइम टाइम 28: कौन है जो ऐसी व्यवस्थित अव्यवस्था फैलाता है बंगाल में?

कौन है जो इनको इतनी जल्दी टोपियाँ पहनाकर, पन इंटेंडेड, डंडे, पत्थर, किरासन तेल से भींगी मशालों से लैस कर देता है? कौन है जो इतने व्यवस्थित तरीक़े से अव्यवस्था का नाटक करता है? कौन है जिसके सामने बंगाल की शेरनी की पुलिस बकरी बनकर रह जाती है?

प्राइम टाइम: आखिर डर की खेती कौन कर रहा है? सरकार या पत्रकार?

आपने जो बाग़ बना दिया है ना, वहाँ लगता है कि कोई नमाज़ पढता मिलेगा तो दूसरा आदमी पीछे से छूरा मार देगा! आपके बाग़ में ख़ून की झील है, नंगी तलवारों वाले तिलकधारी हिन्दू हैं, ख़ून से लथपथ बुर्क़े में जाती मुसलमान लड़की है, हँसती हुई भीड़ है जो टोपीवालों पर तंज कस रही है… इस ख़्याल में एक ही लोचा है रवीश जी, वो ये कि ये आपके ख़्यालों में है, हक़ीक़त नहीं है।

प्राइम टाइम: नजीब अहमद ग़ायब क्यों हो जाते हैं?

यहाँ पर तीन-चार विकल्प ही दिखते हैं। या तो नजीब कहीं छुप गया या छुपा दिया गया है। या फिर उसकी हत्या कर दी गई है। या फिर उसका अपहरण कर लिया गया है। या वो मानसिक रूप से अस्वस्थ है और कहीं चला गया है।