झुँड, झंडे और कई बार मर चुकी मानवता

मानव को मानव से परेशानी नहीं है, झुँड को झुँड से परेशानी है। सारी मौतें झुँडों और झंडों के लिए होती है। मानवता झुँड और झंडों की हर भीड़ के गुज़रने के बाद फुटपाथ पर पिसी हुई, दम तोड़ती मिलती है।

मानवता, दंगे और ‘कम्यूनल दंगे’

काँग्रेस वाले दंगे जो होते हैं, उसमें मानवता नहीं मरती। वो कम्यूनल नहीं है। क्योंकि, पहली बात, मानवता को दंगे का पता चल जाता है और वो कुछ दिनों के लिए कहीं छुप जाती है और उसकी मौत नहीं होती और ना ही उसकी आँखो का पानी कोई देख पाता है।