रवीश ने धर लिया: मोदी ने बस 99.9995% गाँवों में ही बिजली पहुँचाई!

मंशा क्या होनी चाहिए और क्या है। सत्तर साल बाद हर गाँव में बिजली पहुँची ये देश के लिए अच्छी बात है। कुछ गाँवों में नहीं पहुँची इसका मतलब उन गाँवों के अधिकारियों ने गलत सूचना पहुँचाई, या 0.0005% (या चलिए ऐसे सौ गाँव और ले लीजिए, फिर भी 18000 पर भी 0.55% होगा) रह जाने के बावजूद मोदी ने कहा सौ प्रतिशत में पहुँच गया। मतलब मोदी को कहना था कि ‘मितरों! बिजली 99.9995% गाँवों में पहुँच गई!

पत्रकारिता के गिरते स्तर में ज़्यादा ज़िम्मेदारी किसकी?

मीडिया का काम सत्ता की आलोचना तक ही सीमित नहीं है। मीडिया का एक काम सूचना पहुँचाना है, और एक काम विवेचना है। विवेचना और चर्चा सिर्फ नाकामियाँ और खोट गिनाने के लिए नहीं होती, न ही सिर्फ हर बात को देवत्व के स्तर पर ले जाकर बताने के लिए होती है। जहाँ सत्ता सही कर रही है, जिस अनुपात में कर रही है, उसी अनुपात में आलोचना और विवेचना होनी चाहिए।

प्रिय रवीश जी, पत्रकारिता के आलोकनाथ मत बनिए

आप स्टूडियो में बैठे वो दंगाई हैं जो शब्दों से दंगे करवा सकता है। आप बार-बार अपनी बातों को साबित न कर पाने की स्थिति में ऐसे तर्क रखते हैं जिन्हें सत्यापित करना नामुमकिन है। जैसे कि ‘भाजपा के राज में लोगों को बल मिल रहा है’। ये कैसे नाप लें कि लोगों को बल मिल रहा है? लोग पागल हो रहे हैं तो सरकार कैसे ज़िम्मेदार है?

हर तीसरे दिन उठते जातीय बवंडरों का हासिल क्या है?

ये सारी बातें हुई नहीं, व्यवस्थित तरीक़े से हुईं। इसमें दुर्घटना को मुद्दा बनाया गया। डर का माहौल बनाया जाता रहा, ये कहकर कि डर का माहौल है। ये इतनी बार कहा गया, कि जो अपने बग़ल के गाँव में ईदगाह तक जाता था, वो अपने गाँव में मुसलमानों को दुर्गा पूजा के मेले में शक की निगाह से देखने लगा।

रवीश कुमार सरीखे लोग स्टूडियो से रैलियाँ करना कब बंद करेंगे?

जब बिल अगस्त से ही आपके पास में है, तो चुनाव के दो दिन पहले इसे बिना पढ़े और अपने मन की बातें लिखकर पब्लिक के सामने रखने की क़वायद के पीछे की मंशा क्या है? आपके पास तो चार महीने थे, तब इस ख़बर पर विवेचना और चर्चा क्यों नहीं हुई? आखिर ये मीडिया हिट जॉब नहीं तो फिर क्या है?

नया नैरेटिव: 3500 VVPAT मशीन टेस्ट में फ़ेल

ईवीएम पर जब सबका मुँह बंद हो चुका है तो अब ज्ञानपुँज वीवीपैट पर सवाल उठा रहे हैं। जबकि वीवीपैट सिर्फ स्लिप देती है, आँकड़े ईवीएम में ही रहते हैं।

जंतर-मंतर: प्रोटेस्ट के लिए निर्धारित जगह एक चुटकुला है

एक प्रजातंत्र में विरोध मुखर रूप से होना चाहिए जिसके लिए हर सड़क, हर गली, हर सरकारी कार्यालय के दरवाज़े के सामने की जगह उपलब्ध होनी चाहिए।

एक सीनियर पत्रकार के पास किसी नेता की 3000 सेक्स सीडी क्यों है?

आपके पास किसी की सेक्स सीडी आज के ज़माने में क्यों है जबकि क्लिप की सॉफ़्ट कॉपी फोन पर व्हाट्सएप्प आदि के ज़रिए मिल जाती है?

फ़ेसबुक लाइव (मल्टीपल स्ट्रीम): नैरेटिव मेकर मीडिया पर नया प्रहार

सूचना पूर्णरूपेण प्रजातांत्रिक हो गई है कि ये किसी के भी हाथों में जा सकती है, और किसी के भी हाथों से आ सकती है।

प्राइम टाइम 28: कौन है जो ऐसी व्यवस्थित अव्यवस्था फैलाता है बंगाल में?

कौन है जो इनको इतनी जल्दी टोपियाँ पहनाकर, पन इंटेंडेड, डंडे, पत्थर, किरासन तेल से भींगी मशालों से लैस कर देता है? कौन है जो इतने व्यवस्थित तरीक़े से अव्यवस्था का नाटक करता है? कौन है जिसके सामने बंगाल की शेरनी की पुलिस बकरी बनकर रह जाती है?