प्राइम टाइम 28: कौन है जो ऐसी व्यवस्थित अव्यवस्था फैलाता है बंगाल में?

कौन है जो इनको इतनी जल्दी टोपियाँ पहनाकर, पन इंटेंडेड, डंडे, पत्थर, किरासन तेल से भींगी मशालों से लैस कर देता है? कौन है जो इतने व्यवस्थित तरीक़े से अव्यवस्था का नाटक करता है? कौन है जिसके सामने बंगाल की शेरनी की पुलिस बकरी बनकर रह जाती है?

लिंचिस्तान इज़ द न्यू इन्टॉलरेंस: सीट से मीट से बीफ़ तक, बात वही, नैरेटिव नया

ये जुनैद की माँ के आँसू, अखलाख के ख़ून, वेमुला के शब्दों की ताप पर रोटियाँ सेकते हैं।

क्या एनडीटीवी मालिक पर छापा सेलेक्टिव विच-हंट है? बिल्कुल है, लेकिन ज़रूरी है

जितनी नफ़रत वामपंथियों ने बोई है उसकी धार को नाकाम करने के लिए उसी स्तर का दक्षिणपंथी विषवमन निहायत ही ज़रूरी है। ये गलत है, लेकिन ये ज़रूरी है। जैसे कि सेलेक्टिव टार्गेटिंग गलत है, लेकिन ज़रूरी है।

पत्रकारिता की नौकरी, जूनियर पत्रकार, शोषण और आत्मसम्मान

वो आपको प्रमोट करता रहेगा और फिर एक दिन ऐसी बात कर देगा कि आपको कुछ कहते नहीं बनेगा क्योंकि आपकी इनोसेंट को वो हिंट समझता रहा।

पत्रकारिता चतुर लोगों का धंधा है, इसको आदर्श मानना बंद कीजिए

देश की चंद मीडिया कम्पनी ये डिसाइड करती है कि यहाँ के नब्बे प्रतिशत लोग क्या पढ़ते हैं, सुनते हैं, देखते हैं।

अछूत अर्णब की पहली ख़बर मेनस्ट्रीम ख़बर नहीं बन सकती

टाइम्स ऑफ इंडिया इसको छापेगा नहीं, एनडीटीवी, इंडिया टुडे इसको भाव देगा नहीं। तो आख़िर ये स्टोरी, सही हो या गलत, मेनस्ट्रीम मीडिया का दुत्कार सहकर गिरेगी नहीं तो कहाँ जाएगी।

सोशल मीडिया के दौर में प्रेस फ़्रीडम इंडैक्स एक चुटकुला है जिसे कोई नहीं सुनता

प्रेस तो बंद कमरे से निकल कर हाथों में आकर फ़्री हो गया है सोशल मीडिया के दौर में। इस सत्य को स्वीकार लें मीडिया के मठाधीश, तो ऐसे रिपोर्ट आने बंद हो जाएँगे।

मोदी राज में माइम आर्टिस्ट को भी बोलना पड़ रहा है!

भागो साथी, फासिज्म आ रहा है…

साथी भागते-भागते मैं वो स्टेटस लिख दूँ फ़ैज़-फ़राज़ वाला? वो जिसमें हुकूमत के ख़िलाफ़ बुद्धिजीवी बात है?

पत्रकारिता के उस दौर में जब चाय में बिस्कुट का गिरना भी आपातकाल है

जब आपातकाल अपने हिसाब के उत्तर ना पाने पर आने लगे तो समझ जाईए, कि आपातकाल एक मरती विचारधारा के ठेकेदारों द्वारा इस्तेमाल होता वो जुमला है, जो अंतिम है।

बुंदेलखंड गई वाटर ट्रेन, अखिलेश यादव और प्राइम टाइम मीडिया के एंकर

बुंदेलखंड को गई वाटर ट्रेन बहुत कन्फ़्यूजिंग ट्रेन हो गई है। पहले ख़बर आई कि पानी वाली रेलगाड़ी को अखिलेश ने कहा कि ‘हमें नहीं चाहिए पानी, हमारे पास पानी है।’ फिर पता चला कि ट्रेन यार्ड में खड़ी है। नेता, मीडिया, हम, आप सब कूद लिए कि ये क्या बेहूदगी है, राजनीति अपनी जगह […]