हर तीसरे दिन उठते जातीय बवंडरों का हासिल क्या है?

ये सारी बातें हुई नहीं, व्यवस्थित तरीक़े से हुईं। इसमें दुर्घटना को मुद्दा बनाया गया। डर का माहौल बनाया जाता रहा, ये कहकर कि डर का माहौल है। ये इतनी बार कहा गया, कि जो अपने बग़ल के गाँव में ईदगाह तक जाता था, वो अपने गाँव में मुसलमानों को दुर्गा पूजा के मेले में शक की निगाह से देखने लगा।

रवीश कुमार सरीखे लोग स्टूडियो से रैलियाँ करना कब बंद करेंगे?

जब बिल अगस्त से ही आपके पास में है, तो चुनाव के दो दिन पहले इसे बिना पढ़े और अपने मन की बातें लिखकर पब्लिक के सामने रखने की क़वायद के पीछे की मंशा क्या है? आपके पास तो चार महीने थे, तब इस ख़बर पर विवेचना और चर्चा क्यों नहीं हुई? आखिर ये मीडिया हिट जॉब नहीं तो फिर क्या है?

नया नैरेटिव: 3500 VVPAT मशीन टेस्ट में फ़ेल

ईवीएम पर जब सबका मुँह बंद हो चुका है तो अब ज्ञानपुँज वीवीपैट पर सवाल उठा रहे हैं। जबकि वीवीपैट सिर्फ स्लिप देती है, आँकड़े ईवीएम में ही रहते हैं।

जंतर-मंतर: प्रोटेस्ट के लिए निर्धारित जगह एक चुटकुला है

एक प्रजातंत्र में विरोध मुखर रूप से होना चाहिए जिसके लिए हर सड़क, हर गली, हर सरकारी कार्यालय के दरवाज़े के सामने की जगह उपलब्ध होनी चाहिए।

एक सीनियर पत्रकार के पास किसी नेता की 3000 सेक्स सीडी क्यों है?

आपके पास किसी की सेक्स सीडी आज के ज़माने में क्यों है जबकि क्लिप की सॉफ़्ट कॉपी फोन पर व्हाट्सएप्प आदि के ज़रिए मिल जाती है?

फ़ेसबुक लाइव (मल्टीपल स्ट्रीम): नैरेटिव मेकर मीडिया पर नया प्रहार

सूचना पूर्णरूपेण प्रजातांत्रिक हो गई है कि ये किसी के भी हाथों में जा सकती है, और किसी के भी हाथों से आ सकती है।

प्राइम टाइम 28: कौन है जो ऐसी व्यवस्थित अव्यवस्था फैलाता है बंगाल में?

कौन है जो इनको इतनी जल्दी टोपियाँ पहनाकर, पन इंटेंडेड, डंडे, पत्थर, किरासन तेल से भींगी मशालों से लैस कर देता है? कौन है जो इतने व्यवस्थित तरीक़े से अव्यवस्था का नाटक करता है? कौन है जिसके सामने बंगाल की शेरनी की पुलिस बकरी बनकर रह जाती है?

लिंचिस्तान इज़ द न्यू इन्टॉलरेंस: सीट से मीट से बीफ़ तक, बात वही, नैरेटिव नया

ये जुनैद की माँ के आँसू, अखलाख के ख़ून, वेमुला के शब्दों की ताप पर रोटियाँ सेकते हैं।

क्या एनडीटीवी मालिक पर छापा सेलेक्टिव विच-हंट है? बिल्कुल है, लेकिन ज़रूरी है

जितनी नफ़रत वामपंथियों ने बोई है उसकी धार को नाकाम करने के लिए उसी स्तर का दक्षिणपंथी विषवमन निहायत ही ज़रूरी है। ये गलत है, लेकिन ये ज़रूरी है। जैसे कि सेलेक्टिव टार्गेटिंग गलत है, लेकिन ज़रूरी है।

पत्रकारिता की नौकरी, जूनियर पत्रकार, शोषण और आत्मसम्मान

वो आपको प्रमोट करता रहेगा और फिर एक दिन ऐसी बात कर देगा कि आपको कुछ कहते नहीं बनेगा क्योंकि आपकी इनोसेंट को वो हिंट समझता रहा।