वामपंथी नेतृत्व चुने हुए प्रधानमंत्री को बम से उड़ाकर लोकतंत्र को बचाना चाहता है!

अगर ये लोग दलितों और आदिवासियों के हिमायती हैं तो ऐसे राज्यों और इस देश में उनकी सरकार क्यों नहीं बनती? देश में तो तीन-चौथाई आबादी दलितों और आदिवासियों की ही है, इनके सांसद विलुप्तप्राय प्रजाति क्यों हो गए हैं?

मेरा समर्थन भाजपा या मोदी को क्यों है?

ऐसे लोगों के बीच तमाम ख़ामियों के बावजूद अगर भाजपा लगातार लोगों का विश्वास जीत रही है तो मुझे उस बहुमतदायिनी जनता के फ़ैसले पर सवाल करने का कोई हक़ नहीं क्योंकि वही रास्ता संवैधानिक है। जो भी ज़्यादा वोट लाएगा उसकी नीतियाँ सही हैं। सारी नीतियाँ सही न हों, पर लोग लार्जर पिक्चर देखते हुए उसे चुन रहे हैं।

कर्णाटक चुनाव: जब अनैतिक लोग नैतिकता की आशा करने लगें तो समझो ग़ज़ल हुई

आप जो माँग रहे हैं वो धूर्तता है। आपकी बेचैनी दिखती है क्योंकि आप जिस विचारधारा को पालते रहे हैं, उसकी सारी मक्कारी जनता पकड़ रही है। आपकी मक्कारी हमारे जैसे लोग पकड़ रहे हैं क्योंकि आपको विकास या आदर्श से कोई लेना-देना नहीं है। आप कार के पीछे भागते गली के वो कुत्ते हैं जिसे ये भी नहीं पता कि उसे कार से उतरकर आदमी पूछ ले कि क्यों भौंक रहा है तो वो क्या जवाब देगा। और तो और, उसे दो बार पुचकारकर बिस्किट फेंक देगा तो वो कार में बैठकर पैर चाटता उसके घर पहुँच जाएगा।

भारत के हिन्दुओ, प्रोपेगेंडा का जवाब देना कब सीखोगे?

ये एक अघोषित युद्ध है, और मैं अपने धर्म को त्रिशूल में लिपटे कॉन्डोम और लिंग में घुसे भगवा झंडे के स्तर तक गिरता नहीं देखना चाहता।

चुनावी दौर में खेल परसेप्शन मैनुफ़ैक्चरिंग का है

बाकी समय दलित, अल्पसंख्यक, दंगाई सब गाँव में घुइयाँ की खेती में व्यस्त रहते हैं। चुनाव आते ही अचानक से कोई किसी को पीट देता है, किसी को मार देता है, कहीं दंगा हो जाता है।

प्राइम टाइम: नीरव मोदी कांड में फ़ेसबुकिया विश्लेषकों की गट फीलिंग का दम्भ देखने लायक है

आप ये किस बिना पर मान लेते हैं कि आप ही सही हैं, और आपके पास सिवाय चार आर्टिकल्स के कोट करने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो कम से कम जाँच एजेंसियों के बयान तो हैं? आपने कहाँ से जाँच करवाई? अंदेशे, संदेह, और इस बात पर कि आपको ऐसा लगता है? या इस बात पर इसमें मोदी शामिल न हो ये हो ही नहीं सकता?

हर तीसरे दिन उठते जातीय बवंडरों का हासिल क्या है?

ये सारी बातें हुई नहीं, व्यवस्थित तरीक़े से हुईं। इसमें दुर्घटना को मुद्दा बनाया गया। डर का माहौल बनाया जाता रहा, ये कहकर कि डर का माहौल है। ये इतनी बार कहा गया, कि जो अपने बग़ल के गाँव में ईदगाह तक जाता था, वो अपने गाँव में मुसलमानों को दुर्गा पूजा के मेले में शक की निगाह से देखने लगा।

अय्यर अभिजात्य रंगभेद के पर्याय हैं, ये ‘उड़ता तीर’ राहुल की जनेऊ काट देगा

आप गाली दीजिएगा, वो उसे कोट पर मेडल बनाकर चिपका लेगा, और कहता फिरेगा कि देखो ये कितना बड़ा अचीवमेंट है।

वामपंथियों का चुनावी विश्लेषण: अंधविरोध, घटिया और चिरकुटई से परिपूर्ण

निकाय और पंचायत चुनाव राष्ट्रीय स्तर तक के सफ़र तक पहुँचने की पहली सीढ़ी है, वहाँ लोग पार्टी नहीं, अपने बूते पर चुनाव लड़ते हैं। ये उनके लिए स्क्रीनिंग टेस्ट की तरह होता है कि हमने तो खुद को साबित कर दिया, अब आप देख लो कि अगले चुनावों में हमें अपनी पार्टी में रखोगे कि नहीं।

प्रिय कॉन्ग्रेस, चुनाव जीतने हैं तो बिहेव लाइक अ नेशनल पार्टी

‘राहुल’ को ‘राज’ का हुलिया देकर ‘हाय ब्रो, आप एम कूल’ कहने से पिक्चर हिट नहीं होगी।