दिशाहीन विपक्ष, प्रतिक्रियावादी मीडिया, बेकार बातों में उलझे बुद्धिजीवी भाजपा को जिताएँगे

आपकी हार का मतलब है कि आपने एक सशक्त विपक्ष, समझदार विरोधी और देशहित में सोचने वाले बुद्धिजीवी की भूमिका नहीं निभाई।

राहुल गाँधी ही भाजपा की 2019 की जीत सुनिश्चित करेंगे

राहुल का दुर्भाग्य कि फोन पर जियो का 4जी आने से लोग सीधा विडियो ही देख लेते हैं, और व्हाट्सएप्प पर शेयर भी धड़ाधड़ करते हैं।

प्राइम टाइम: बिहार में बहार है, जान लो कि ई नीतिसे कुमार है!

फिलहाल नीतीश कुमार सेकुलर से कम्यूनल होने वाले हैं। आपलोग उसकी तैयारी करें। अचानक से उनके कार्यकाल में हुई राजनैतिक से लेकर सामाजिक और पत्रकार-पेशा-विशेष से संबंधित हत्याओं का ठीकड़ा पता नहीं किसके सर जाएगा। अचानक से उनका कुर्ता सफ़ेद होकर चमकने लगेगा।

प्राइम टाइम 29: जब सरकारें हमारा काटती हैं, और हम कटवाते हैं

  नमस्कार, मैं बहल जाने वाला आदमी! जी! मैं वही हूँ जो आप हैं, आपका ब्वॉयप्रेंड है, गर्लफ़्रेंड है, आपके बग़ल वाला आदमी है जो फेसबुक पर लिखे को लीगली बाइंडिंग और सार्वभौमिक सत्य मान लेता है। मैं वही हूँ जो व्हाट्सएप्प के मैसेज से विराट हिन्दू जैसा फ़ील करता है, और मैं वही हूँ […]

क्या एनडीटीवी मालिक पर छापा सेलेक्टिव विच-हंट है? बिल्कुल है, लेकिन ज़रूरी है

जितनी नफ़रत वामपंथियों ने बोई है उसकी धार को नाकाम करने के लिए उसी स्तर का दक्षिणपंथी विषवमन निहायत ही ज़रूरी है। ये गलत है, लेकिन ये ज़रूरी है। जैसे कि सेलेक्टिव टार्गेटिंग गलत है, लेकिन ज़रूरी है।

नहीं बैसाखनंदन, मोदी की विदेश यात्राओं से ग़रीबी नहीं मिटी…

ना ही किसानों के घर में मरे बाप और भाई लौट कर आने लगे, ना ही दाल के भाव कम हो गए, ना ही सड़कों के गड्ढे भर गए, ना ही दंगे बंद हुए, ना ही निचली जातियों के दिन फिर गए…

इंटेलेक्चुअल लेजिटिमेसी की राह वन-वे होती है

ये अपनी फ़र्ज़ी बुद्धिजीविता में इतने धँस चुके हैं कि मोदी की राजनीति और हिंदू धर्म के प्रति घृणा को खुलकर घृणा कहने में हिचकिचाते हैं। इससे इनको ये डर लगता है कि ये ‘ऑब्जेक्टिव’ नहीं रह जाएँगे। जबकि इन्हें अच्छे से पता है कि इनकी ये ‘आलोचना’ कितनी बायस्ड और मौक़ापरस्त है।

बंदर के हाथ नारियल, केजरीवाल के हाथ ट्विटर, एक ही बात है

अगर ऐसे ट्वीट से आम आदमी पार्टी के समर्थक निराश नहीं हैं तो उनको चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। अगर लगता है कि इसी तरह की राजनीति नई राजनीति है तो आईना देखना बंद कर दीजिए, क्योंकि आप अपनी सूरत बर्दाश्त नहीं कर पाओगे अगर थोड़ी भी समझ है।

दिल्ली देश नहीं है

पूरा टाईमलाईन आज नहीं पढ़ा दिन भर। कुछ लिखा भी नहीं, एक ने मेल करके झाड़ू पार्टी की जीत पर ‘शिगूफा’ छोड़ने कह दिया। भाजपा यहाँ हारी है या आआपा जीती है, या एक की जीत से दूसरी की हार हुई है, ये सब पॉलिटिकल एनालिस्ट लोग बता पाएँगे। हम कल भी भाजपा को वोट […]

द इकॉनॉमिस्ट का कल्चर ज्ञान: आर्टिकल के रूप में अजेंडाबाजी

बुद्धिजीवी भारतवासियों की पुरानी आदत है कि वेस्टर्न मीडिया जो भी लिखे, भारत के हालात पर भी, हम एकदम जीभ लगा के चाट लेते हैं और गुनगाण करते रहते हैं। कुछ लोगों की आदत होती है वो आर्टिकल शेयर करने की ताकि लोगों को पता चले कि वो वॉशिंगटन टाईम्स और द इकॉनॉमिस्ट भी पढ़ते […]