लिखने की प्रक्रिया: चाय के कप और होंठों तक कई फिसलनें हैं

सही ट्रीटमेंट बहुत ज़रूरी होता है, वरना कहानी की जगह वो अक्षरों के झुंड से बने शब्द, शब्दों के झुंड से बने वाक्य, वाक्यों के झुंड से बने पैराग्राफ़ और पैराग्राफ़ों के झुंड से बने छपे पन्नों से ज़्यादा कुछ नहीं हो पाएगा।

पुस्तक मेले से: हिन्दी के लेखकों से सवाल-जवाब

हममें से सब अभी भी कॉलेज का कैनवस लिए उसी में पात्रों को घुमा रहे हैं। उसमें संवाद में कोई गहराई नहीं मिलती, ना ही उसके पात्र कभी उन द्वंद्वों में पड़ते हैं जिसका समाधान क्लिष्ट हो।