जेएनयू चुनाव: ‘ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा’ से ‘रंग दे तू मोहे गेरूआ’

लेफ़्ट यूनिटी अपनी लालिमा के साथ अस्तगामी है। ये बात और है कि एक मज़बूत विपक्ष की कमी इस देश को तीन साल से खल रही है।

सर्वहारा क्रांति में किस सर्वहारा को सत्ता मिली?

हर विचारधारा का एक समय होता है, उसके बाद वो मर जाती है, बीमार हो जाती है, या फिर नकार दी जाती है। समय बदलता है।

आपके पास दो गायें हैं: कम्यूनिज्म, सोशलिज्म, कैपिटलिज्म, फासिज्म

आपके पास दो गायें हैं। आप लाल सलाम कहते हुए गायों को काट देते हैं और हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए सड़कों पर ‘बीफ़ ईटिंग फेस्टिवल’ मनाते हैं।

छात्र राजनीति: कॉन्ट्रोवर्सी की औलादें जो फेसबुकिया यूथ आइकॉन्स गढ़ती हैं

चाहे जिसको ये गरिया रहे हों, या जिसके साथ खड़े हों, इन्हें दोनों के ही बारे में कुछ भी नहीं पता। इनको पूछिए तो कहेंगे कि वहाँ ये पढ़ा, उसने मुझे बताया। बस इतना रीसर्च है, जिसमें दूसरा पक्ष जानने की जरूरत इन्हें नहीं होती।

NSFW: एकांकी: हमको चाहिए आजादी

अगर सुबह बताएगी तो हमारे कामरेड सब तो ‘विक्टिम शेमिंग’ में आगे रहते ही हैं। फिर बाबा लोग समझा देंगे कि एक बलात्कार पीड़िता को ये पितृसत्तात्मक समाज कैसे देखता है। शर्म के मारे मर जाएगी। फिर भी नहीं मानेगी तो उसको रंडी बनाकर बदनाम कर देंगे…