पुस्तक मेले से: हिन्दी के लेखकों से सवाल-जवाब

हममें से सब अभी भी कॉलेज का कैनवस लिए उसी में पात्रों को घुमा रहे हैं। उसमें संवाद में कोई गहराई नहीं मिलती, ना ही उसके पात्र कभी उन द्वंद्वों में पड़ते हैं जिसका समाधान क्लिष्ट हो।

जब तुम्हारी दो किताब एक ही जैसी है तो काहे के लेखक हो तुम?

लेखक का हर पात्र, हर नई किताब में नई जगह होना चाहिए। उसकी आवाज़ अलग होनी चाहिए या फिर उसका द्वंद्व अलग होना चाहिए। पात्रों का गाँव, शहर, घर का कमरा, उसके माँ-बाप, उसके सर के बाल और उसकी महबूबा के चेहरे के रंग से लेकर मेनीक्योर किए उँगलियों तक में विविधता होनी चाहिए।

नई वाली हिन्दी में नया क्या है कि मैं फिर से सौ रुपए ख़र्च करूँ?

प्रेम-सेक्स-लिबरेशन-नारीवाद-फ़्रीडम की बातें छिछली लिखी जा रही हैं। कोई भी गहरे नहीं उतरना चाहता। वो सेक्स को सेक्स लिख देता है लेकिन उसे पता ही नहीं कि नंगा होना कपड़े उतारना नहीं है। उसे पता ही नहीं कि लिबरेशन फ़्राइडे की शाम पार्टी से लौटकर ‘थ्रीसम’ करने में नहीं है, उसके मायने अलग है।

साहित्य में अपशब्द, गाली आदि का प्रयोग कहाँ तक सही है

भाषा को मर्यादित होना चाहिए लेकिन सिर्फ मर्यादित ही होकर साहित्य नहीं बन सकता है। साहित्य में चोरी की घटना भी होती है, बलात्कार भी होता है, हत्या भी होती है तो फिर गाली या अपशब्द कैसे गलत हो जाते हैं, ये मेरी समझ से परे है।

नई हिन्दी या नई वाली हिन्दी क्या है?

एक अभिजात्यता हिन्दी पर थोपने की कोशिश हुई कि हिन्दी तो ऐसे ही लिखी जानी चाहिए। इसके कारण, और अंग्रेज़ी स्कूलों के हर गाँव में पहँचने के कारण हिन्दी में लेखन सिकुड़ता चला गया।

लोकसभा टीवी पर ‘नई हिन्दी, नए लेखक’ कार्यक्रम का विडियो

स्वच्छंदता नई शैली को जन्म देती है। फिर कुछ नया आएगा, नई शैली आएगी। अभी की नई शैली को पिछली शैलियों को पढ़कर बढ़े लोग नकारेंगे ही।

गाँधी या गांधी: पंचमाक्षर, अनुस्वार और अनुनासिक का लॉजिक

जब शुरुआत में हिंदी के फॉन्ट कम्प्यूटर के लिए आए तो अनुनासिक का चिह्न था ही नहीं, ना ही पूर्णविराम था। तो पत्रकारिता के वेब पोर्टल पर सिर्फ बिंदी चलने लगी। कुछ ने इसको स्टाइलशीट ही बना लिया। अब जबकि अनुनासिक का चिह्न आ गया है, पूर्णविराम की डंडी आ गई है, फिर भी कई जगह इनका प्रयोग नहीं दिखता।

एंटर-मार फेसबुकिया कविताओं को बढ़ावा देना बंद कीजिए

अगर आप इन घटिया कवियों को प्रोत्साहन देते रहेंगे तो हिंदी कविता का मतलब छोटी-बड़ी लाइनें हो जाएँगी जिसमें आपको चाँद, ओस की बूँद, बारिश, घास, आँखें, होंठ का हिलना आदि चालीस-पचास चिरपरिचित शब्दों के झुंड के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।