लिखने की प्रक्रिया: चाय के कप और होंठों तक कई फिसलनें हैं

सही ट्रीटमेंट बहुत ज़रूरी होता है, वरना कहानी की जगह वो अक्षरों के झुंड से बने शब्द, शब्दों के झुंड से बने वाक्य, वाक्यों के झुंड से बने पैराग्राफ़ और पैराग्राफ़ों के झुंड से बने छपे पन्नों से ज़्यादा कुछ नहीं हो पाएगा।

खाली समय में लेखक के दिमाग का पागलपन

ये सब किसी आधी सोची हुई सोच की परिणति होती है। हमें ‘क्लोज़र’ नहीं मिलता। हमारे जीवन की वो घटनाएँ वैसे नहीं बीतती जैसे हम उसे होते देखना चाहते हैं। इसी कारण हम उसे बार-बार अपने तरीक़े से ख़त्म करते रहते हैं।

श्श्शऽऽऽ… हिन्दी के नवोदित साहित्यकार सो रहे हैं!

हमारे दौर के साहित्यकार अंदर से मरे हुए हैं, नाम के भूखे हैं, और हीनभावना से ग्रस्त हैं। इनकी लेखनी को दीमक चाट गया है, और दिमाग तो गलकर कान के रास्ते रिस-रिस कर बह ही चुका है।