प्रिय कॉन्ग्रेस, चुनाव जीतने हैं तो बिहेव लाइक अ नेशनल पार्टी

‘राहुल’ को ‘राज’ का हुलिया देकर ‘हाय ब्रो, आप एम कूल’ कहने से पिक्चर हिट नहीं होगी।

ईमानदार पार्टी के नेता केजरीवाल वैश्विक नेता हैं, इनको दिल्ली से निकाला जाय

मुझे तो बस इंतज़ार है कि अरविन्द जी अपने काग़ज़ों के पुलिन्दे से कुछ ख़तरनाक टाइप का निकालेंगे और भाजपा को भ्रष्ट साबित कर देंगे जैसे कि शीला दीक्षित को कर दिया। मैं तो मिलकर भी आया हूँ शीला जी से, तिहाड़ में कंकड़ वासी दाल बीनती नज़र आईं। इसीलिए तो यूपी चुनावों में कभी दिखी नहीं।

योगी आदित्यनाथ एक स्टेटमेण्ट है कुछ पॉलिसी के लिए, कुछ पार्टियों और सरकारों के लिए

दिक़्क़त तब होगी जब वो गुण्डागर्दी को बढ़ावा देगा, दंगे कराएगा और अपने जूते हवाई जहाज़ से मँगवाएगा।

प्रिय मनोज तिवारी ‘मृदुल’, नाम के अंत में ‘कटु’ लगा लीजिए

आपको नहीं ही गाना था तो आप एक शिक्षिका, वो भी एक महिला, वो भी आपसे आग्रह किया था, एक मुस्कुराहट के साथ, को सप्रेम वैसी ही मुस्कुराहट के साथ मना कर देते।

भाजपा, काँग्रेस आदि पार्टियाँ सारे दानदाताओं के नाम क्यों नहीं बताती?

भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है जिससे लोगों को आशा भी है कि इस मुद्दे पर पारदर्शिता की बात करे क्योंकि आजकल भ्रष्टाचार मिटाने का गर्भ धारण करने वाले गर्भपात कराते नज़र आ रहे हैं।

असम में भाजपा की सरकार और बुद्धिजीवियों का कोरस में विधवा-विलाप

आपका ‘इंटेलेक्ट’ अब बस ‘मोलेस्ट’ होने के लिए ही बचा है। आपका सारा ज्ञान अब किसी तरह कुछ भी सरकार विरोधी बोलकर दाँत निपोड़ कर हँस लेना है। और अपने कन्विनिएंट समय तथा लॉजिक के अनुसार जादवपुर, एसएफआई के विद्यार्थी नेता द्वारा किए ख़ुलासे आदि को बिल्कुल भी ध्यान ना देकर कुछ और बात छेड़ देनी है।

The tsuNaMo: Why Modi won

When the General Elections 2014 were imminent, there were two things that India was going through: general mass frustrated with the everyday scams not to forget a dwindling economy and rising inflation making its life troubling; and a search for an alternate form of governance. Aam Aadmi Party (AAP), the seeds sawed by Anna movement […]

बीजेपी, कांग्रेस और ग़रीबी की राजनीति

ग़रीबों को ग़रीब ही रहने दो. ग़रीबी में एक आशा है की एक दिन तुम अमीर हो जाओगे लेकिन अमीरी में वो आशा नहीं है. अमीर लोगों को कैसे ठगोगे? क्या कहोगे उन्हें? गरीबों को तो कह सकते हो, कहते रहे हो साठ-सत्तर सालों से, गरीबी हटा देंगे लेकिन नहीं हट रही.