चुनावी सर्वे मूड नहीं बताते, उसे प्रभावित करने का नाकाम ज़रिया हैं

सर्वे ने पहले राहुल को घुसाया और छोटा सा छेद दिखाया; फिर राहुल के सीटों की संख्या बढ़ती दिखाई गई ताकि लगे कि राहुल के ट्वीट, चुटकुलों और गीतों का असर जनता पर हो रहा है और वो राहुल की बात समझ रहे हैं; फिर नए सर्वे में दिखाया जा रहा है कि काँटे की टक्कर है।

वामपंथियों का चुनावी विश्लेषण: अंधविरोध, घटिया और चिरकुटई से परिपूर्ण

निकाय और पंचायत चुनाव राष्ट्रीय स्तर तक के सफ़र तक पहुँचने की पहली सीढ़ी है, वहाँ लोग पार्टी नहीं, अपने बूते पर चुनाव लड़ते हैं। ये उनके लिए स्क्रीनिंग टेस्ट की तरह होता है कि हमने तो खुद को साबित कर दिया, अब आप देख लो कि अगले चुनावों में हमें अपनी पार्टी में रखोगे कि नहीं।

प्राइम टाइम: रवीश बाबू, करना तो आपको भी पत्रकारिता चाहिए लेकिन…

प्रधानमंत्री दिल्ली में क्यों नहीं है, वाहियात सवाल है। वो इसलिए कि तंत्र अपने हिसाब से चलता रहता है, और आज के दौर में कम्युनिकेट करना कबूतरों के ज़रिए नहीं होता कि प्रधानमंत्री की ज़रूरत होगी तो पता चलेगा कि बैलगाड़ी पर बैठे हैं, सात दिन में दिल्ली पहुँचेंगे।

‘सपने में भी नहीं सोचा था’ से ‘ई तो साला होना ही था’ की ओर

ये बुज़ुर्गों का गरीब जेनरेशन कब खपेगा? सब के सब यही कहते हैं कि नदी तैर कर पढ़ने जाते थे! मिट्टी के घर में रहते थे! भले ही नदी में भैंस की पीठ पर चढ़कर जाते हों और दूसरों के बग़ीचे से आम तोड़ते हों, लेकिन इनकी उम्र का बचा कौन होगा जो कन्फर्म करने जाए!

योगी आदित्यनाथ एक स्टेटमेण्ट है कुछ पॉलिसी के लिए, कुछ पार्टियों और सरकारों के लिए

दिक़्क़त तब होगी जब वो गुण्डागर्दी को बढ़ावा देगा, दंगे कराएगा और अपने जूते हवाई जहाज़ से मँगवाएगा।

दलाल, हरामज़ादा, सनकी, धोखेबाज़, चोर आदि आराम से क्यों बोलने लगे हैं हमारे नेता?

अब सारी गणना चुनाव को जीतने नहीं, किसी भी तरह जीतने पर आ गई है। अब आपको चुनावी रणनीतिकार के हिसाब से चलना होता है जो कि हावर्ड में पढ़कर आया है, वो आपसे वो भी करवा लेगा जो आपने सोचा भी नहीं होगा।