स्त्री शरीर, नारी की देह, और सैनिटरी पैड्स

ये मसला स्वास्थ्य का है, बुनियादी है, स्त्री शरीर का है, ‘नारी की देह’ या आधुनिकता का नहीं। ‘नारी की देह’ कविता है, स्त्री शरीर स्वास्थ्य का मामला है। कविता और बेडशीट की तस्वीर इसे मॉडर्निटी से जोड़ने की बेकार कोशिशें हैं।

अवनि जी, बाइसन-21 की बधाई, आप हम सबकी आदर्श हैं

तीनों बहनों को सलाम, आपको एक एक्सट्रा! राफ़ेल आ जाए तो उसको उड़ाइएगा, तब हम आप तीनों का पोस्टर रूम में लगा लेंगे।

रक्षाबंधन का इतिहास: फ़र्ज़ी नारीवादियों के कुतर्कों के नाम

पुराणों के हर प्रसंग में स्त्रियों ने अपनी शक्ति से अपने भाई, पति या समाज की रक्षा की है। भाई की कलाई पर बँधी राखी उसकी रक्षा के लिए होती है ना कि वो बहन की रक्षा का वचन देता कहीं भी दिखता है। बहन की रक्षा भाई के लिए उतनी ही सहज प्रक्रिया है, जितनी सहज बात बहन द्वारा भाई को मुसीबत में देखकर मदद करने की।

औरत के चरित्रहीन होने से पहले पुरुष अपना चरित्र खोता है

डिज़ाइनर ब्रा देखकर ही तुम्हें लगने लगता है कि ‘ये क्या! सेक्स को लेकर ये तो उतावली है, मुझे रिझाने के लिए इसने ऐसी ब्रा पहन ली है, ये तो दिनभर सेक्स के ही बारे में सोचती होगी।’ वाह रे पुरुष!

हिन्दी साहित्य के कुण्ठित सर्कल में सफल औरतें पतिता हैं, चरित्रहीन हैं

एक सफल स्त्री, वस्तुतः एक स्त्री, इस कुण्ठित समाज में अपनी योनि, स्तनों, और यौन इच्छाओं की पूर्ति की पागलपन के हद तक आकाँक्षा रखने वाली देह होने के अलावा कुछ भी नहीं। सफल स्त्री को इस तरह देखा जाता है मानो उसने हर सीढ़ी चढ़ते वक़्त एक रात, या कई रातें, किसी मर्द के साथ गुज़ारी जिसने उसे ऊपर ढकेला। वो किसी मर्द को सराहती है तो इसका अर्थ यही होता है कि वो उसके साथ सो रही होगी, तभी तो ऐसा करती है।

लिप्सटिक वाले सपने: हर रोज़ी का द्वंद्व, सब के होंठ गुलाबी हैं, सब बुर्क़े में क़ैद

सबका नाम रोज़ी है। सब के होंठ गुलाबी हैं, सब बुर्क़े में क़ैद है। सबको बाहर पंख फैलाने है। सबका अपना आकाश है। सबके पंखों का रंग अलग है।

लिप्सटिक नारीवाद: फ़ैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना करें

क्या पूरे नारीवाद का विमर्श अब इतने पर आकर गिर गया है कि कोई सिंदूर क्यों लगाती है, बिंदी क्यों चिपकाती है, ब्रा क्यों पहनती है?