हिन्दी साहित्य के कुण्ठित सर्कल में सफल औरतें पतिता हैं, चरित्रहीन हैं

एक सफल स्त्री, वस्तुतः एक स्त्री, इस कुण्ठित समाज में अपनी योनि, स्तनों, और यौन इच्छाओं की पूर्ति की पागलपन के हद तक आकाँक्षा रखने वाली देह होने के अलावा कुछ भी नहीं। सफल स्त्री को इस तरह देखा जाता है मानो उसने हर सीढ़ी चढ़ते वक़्त एक रात, या कई रातें, किसी मर्द के साथ गुज़ारी जिसने उसे ऊपर ढकेला। वो किसी मर्द को सराहती है तो इसका अर्थ यही होता है कि वो उसके साथ सो रही होगी, तभी तो ऐसा करती है।

जब तुम्हारी दो किताब एक ही जैसी है तो काहे के लेखक हो तुम?

लेखक का हर पात्र, हर नई किताब में नई जगह होना चाहिए। उसकी आवाज़ अलग होनी चाहिए या फिर उसका द्वंद्व अलग होना चाहिए। पात्रों का गाँव, शहर, घर का कमरा, उसके माँ-बाप, उसके सर के बाल और उसकी महबूबा के चेहरे के रंग से लेकर मेनीक्योर किए उँगलियों तक में विविधता होनी चाहिए।

नई वाली हिन्दी में नया क्या है कि मैं फिर से सौ रुपए ख़र्च करूँ?

प्रेम-सेक्स-लिबरेशन-नारीवाद-फ़्रीडम की बातें छिछली लिखी जा रही हैं। कोई भी गहरे नहीं उतरना चाहता। वो सेक्स को सेक्स लिख देता है लेकिन उसे पता ही नहीं कि नंगा होना कपड़े उतारना नहीं है। उसे पता ही नहीं कि लिबरेशन फ़्राइडे की शाम पार्टी से लौटकर ‘थ्रीसम’ करने में नहीं है, उसके मायने अलग है।

नई हिन्दी या नई वाली हिन्दी क्या है?

एक अभिजात्यता हिन्दी पर थोपने की कोशिश हुई कि हिन्दी तो ऐसे ही लिखी जानी चाहिए। इसके कारण, और अंग्रेज़ी स्कूलों के हर गाँव में पहँचने के कारण हिन्दी में लेखन सिकुड़ता चला गया।