गौण मुद्दों के दौर में आपातकाल का हर रोज आना दोगलई का चरम है

जब मोदी इतना शक्तिशाली है ही, और वो मीडिया को दबा ही रहा है तो सबसे पहले तो ज़्यादा भौंकने वाले कुत्तों के मुँह पर जाली लगा देता, लेकिन कोई भारत में तो कोई वाशिंगटन पोस्ट में तमाम बातें लिख रहा है जो वो लिखना चाहता है।

बिकी हुई पत्रकारिता के दौर की ख़बरों में प्रोपेगेंडा कैसे पहचानें

जब ख़बरों में अनावश्यक बातें और संबंध बनाए जाने लगें तो समझ जाइए कि वो प्रोपेगेंडा है।

(मोदी से) नाराजदीप-सोनिया सास-बहू-साड़ी इंटरव्यू; ft सगारिका

नमस्कार, आज के चतुर-चाटू पत्रकार के प्राइम टाइम इंटरव्यू “मैडम आप कुछ भी करें मैं खखोर कर चाटूँगा” में आपका स्वागत है। दर्शकों के लिए बता दूँ कि खखोरना का मतलब है जीभ से ऐसे चाटना कि चटवाने वाले में चाटने के लिए कुछ ना बचे। रविश से हिंदी सीख रहा हूँ। अर्णब ने इतना […]

जेने की बालकनी में हमारे एंकर

दिल्ली की मीडिया ज्याँ जेने (Jean Genet) रचित नाटक ‘ले बालकन’ या ‘द बालकनी’ टाईप हो गई है। जेने के नाटक में एक वेश्यालय (बालकनी) सत्ता में हो रही गतिविधियों का एक केंद्र जैसा दिखता है और बाहरी शहर की दुनिया का माईक्रोकॉज़्म या सूक्ष्म रूप है। मैं वेश्यालय के लिए रंडीखाना शब्द का इस्तेमाल […]

क्या यार! बलात्कार बंद हो गए…. बताईए!

देश में अचानक बंद हो गए बलात्कारों और ‘पेड़ पर लटके शवों’ के ना दिखने से मैं चिंतित हूँ। मैं ना तो दलित चिंतन कर पा रहा हूँ और ना ही इस घिनौने कृत्य की क्रांतिकारी रूप में भर्त्सना। सरकार को #RailFareHike अभी नहीं करना था। मीडिया को समाज के मज़े लेने देते कुछ दिन। […]