जहाँ सभ्यताएँ ऐसी रही हैं कि खुदाई में हथियार नहीं मिलते

जहाँ लड़ाई की आवश्यकता है, बेशक हथियार उठा लीजिए, लेकिन तय कीजिए कि हर बात पर लड़ाई ज़रूरी है क्या? अपनी गहरी, फैली जड़ों से नमी खींचिए।

नाहिद आफ़रीन वाला ‘फ़तवा’, रवीश कुमार और वैसी ख़बरों से गायब ‘पड़ताल’

आपको हर बार गोयनका अवार्ड तो मिल जाता है लेकिन आपकी विश्वसनीयता संदिग्ध होती जा रही है। एक दिन आएगा जब टीवी पर सच में अँधेरा छा जाएगा और उस अँधेरे में आप टॉर्च लेकर ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे।

लाशें मुसलमान नहीं होतीं, लाशें हिन्दू नहीं होती

आज पूरा दिन टाइमलाइन पर एक डॉक्टर की हत्या की ख़बरें आती रहीं। दोनो पक्ष आए, जिसमें एक ये थे कि वो ‘रोड-रेज’ था और उसे एक कम्यूनल रंग दिया जा रहा है। इसे कम्यूनल रंग दिया जा रहा है, इस बात पर भी हमारे तमाम मीडिया हाउसों ने आर्टिकल लिखे हैं। हुआ क्या है: […]