जेएनयू चुनाव: ‘ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा’ से ‘रंग दे तू मोहे गेरूआ’

लेफ़्ट यूनिटी अपनी लालिमा के साथ अस्तगामी है। ये बात और है कि एक मज़बूत विपक्ष की कमी इस देश को तीन साल से खल रही है।

प्राइम टाइम: नजीब अहमद ग़ायब क्यों हो जाते हैं?

यहाँ पर तीन-चार विकल्प ही दिखते हैं। या तो नजीब कहीं छुप गया या छुपा दिया गया है। या फिर उसकी हत्या कर दी गई है। या फिर उसका अपहरण कर लिया गया है। या वो मानसिक रूप से अस्वस्थ है और कहीं चला गया है।

जेएनयू में एक छात्र ग़ायब है, एक मर गया; हम ग़ायब पर चर्चा करेंगे…

कल सुबह मणिपुर का एक लड़का अपने कमरे से मृत निकाला गया। उस पर कोई चर्चा नहीं हो रही क्योंकि वो मणिपुरी है, और शायद वामपंथी गिरोहों के किसी काम का नहीं।

भाषणों, प्रतिक्रियाओं और सुपरलेटिव विशेषणों के दौर में आलोचना का शीघ्रपतन

आजकल त्वरित प्रतिक्रियाओं का दौर चल रहा है जहाँ हर विशेषण सुपरलेटिव से कम नहीं होना चाहिए। आप या तो एकदम फ़ैन हो जाते हैं, या नकार देते हैं। दोनो ही स्थिति में आदमी अक्सर वजहें लिखना भूल जाता है।

कन्हैया जी, JNU देश नहीं है, न ही देश का प्रतिबिम्ब है

भारत के नए जवाहरलाल का स्वागत है। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जुमलों के खिलाफ बोलने के लिए  खुद जुमलों का सहारा ले रहे हैं। लेकिन ठीक है कि कम से कम इनकी आज़ादी अब भारत से नहीं, भारत में ही चाहिए। इनका कहना है की 31% ने ही इस सरकार को वोट दिया, बाकि […]

Do you see the irony, morons?

One day, one of my school friends from Indian Army visited us on his way home. It was after his first posting as an officer in Siachen. We were excited to hear his stories about the life at that altitude and that temperature. Spoiler alert, there is nothing romantic about the blinding white land with […]

‘साइलेंस ऑफ़ द लेफ़्ट’, टाइप= कन्विनिएंट

सर? उ जेएनयू वाला काँड सुने क्या? अब कौन सा काँड हो गया बे? फिर कोई एमएमएस आया क्या? या फिर किसी ने सेक्सुअल ऑफेंस कर दिया? जेएनयू तो प्रोटेस्ट के साथ साथ भारत के तमाम विश्वविद्यालयों को ‘सेक्स, रेप और ‘फन टाइम” वाले आस्पेक्ट में पछाड़े हुए है। अरे नहीं सर, वो सब तो […]