प्राइम टाइम 30: अगले दंगों के ख़ून से पत्रकारों, बुद्धिजीवियों के हाथ सने होंगे

इन दोगले पत्रकारों को नकारिये जो मरने वाले का धर्म तलाश कर प्राइम टाइम में आँकड़े बताते हैं। इन बुद्धिजीवियों से बचिए जो टट्टी के रंग में जाति खोजते हैं।

प्रणय रॉय चोरी काण्ड: चर्चा को चोरी से भटकाकर प्रेस स्वतंत्रता के हनन की ओर ले जाने की कोशिश

ये चिल्लाएँगे कि सरकार आवाज़ों को दबा रही है। ये चिल्लाएँगे कि पत्रकारिता के आदर्शों के चरम पर वो खड़े थे जिन्हें सरकार खींच कर नीचे लाना चाहती है। इस चर्चा को प्रणय रॉय की चोरी से हटाते हुए वहाँ पहुँचाने की कोशिश होगी जहाँ ये बताया जाएगा कि सरकार प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बोल रही है।

‘असली मुद्दा क्या है’ शृंखला: नंबर एक: भारत के जनमानस में डाला गया ‘नव राष्ट्रवाद’

ये डिबेट भी मैनुफ़ैक्चर्ड ही है। ये इतनी बार दोहराया गया है कि लगता है कि सच में ये कोई इशू है।

पत्रकारिता की नौकरी, जूनियर पत्रकार, शोषण और आत्मसम्मान

वो आपको प्रमोट करता रहेगा और फिर एक दिन ऐसी बात कर देगा कि आपको कुछ कहते नहीं बनेगा क्योंकि आपकी इनोसेंट को वो हिंट समझता रहा।

प्राइम टाइम: नजीब अहमद ग़ायब क्यों हो जाते हैं?

यहाँ पर तीन-चार विकल्प ही दिखते हैं। या तो नजीब कहीं छुप गया या छुपा दिया गया है। या फिर उसकी हत्या कर दी गई है। या फिर उसका अपहरण कर लिया गया है। या वो मानसिक रूप से अस्वस्थ है और कहीं चला गया है।

मोदी राज में माइम आर्टिस्ट को भी बोलना पड़ रहा है!

भागो साथी, फासिज्म आ रहा है…

साथी भागते-भागते मैं वो स्टेटस लिख दूँ फ़ैज़-फ़राज़ वाला? वो जिसमें हुकूमत के ख़िलाफ़ बुद्धिजीवी बात है?

दि लल्लनटॉप अब दि लल्लनडाउन होता जा रहा है!

लल्लनटॉप अब ट्रेंडिग न्यूज़ के पीछे भागता दिख रहा है। यही इसको धीरे-धीरे फीका करता जाएगा। कभी कभी किसी किसी प्रोडक्ट को लाभ और हानि के नज़रिए से ऊपर होकर जीने देना चाहिए। रिटर्न के चक्कर में ये प्रोडक्ट डूब जाएगा या फूहड़ हो जाएगा।