प्रसून जोशी-मोदी इंटरव्यू: इंटरव्यू लेते वक़्त मीडिया वाले क्यों नहीं चिल्लाते

इंटरव्यू जिसका भी आप लेने वाले हैं, पहले तो उसकी सहमति होनी चाहिए। दूसरी बात आपको एक प्रीइंटरव्यू के तौर पर सारे सवाल अपने सामने वाले को बताने होते हैं। ये उसकी इच्छा है कि वो किस सवाल की आपको अनुमति दे, किसकी नहीं।

रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था।

काहे बे चूतिये, राम काहे शर्मिंदा होंगे?

अल्लाहु अकबर कहकर बम फोड़ने वालों पर अल्लाह को तो शर्मिंदा होते नहीं सुना! तुम जैसे लिब्रांडुओं को कहते और लिखते सुना और देखा कि ये असली मुसलमान नहीं है। फिर अभी कौन सा कीड़ा पिछवाड़े में घुस जाता है कि सौ लोगों की भीड़ पचासी करोड़ हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती दिख जाती है?

चुनावी दौर में खेल परसेप्शन मैनुफ़ैक्चरिंग का है

बाकी समय दलित, अल्पसंख्यक, दंगाई सब गाँव में घुइयाँ की खेती में व्यस्त रहते हैं। चुनाव आते ही अचानक से कोई किसी को पीट देता है, किसी को मार देता है, कहीं दंगा हो जाता है।

प्राइम टाइम: नीरव मोदी कांड में फ़ेसबुकिया विश्लेषकों की गट फीलिंग का दम्भ देखने लायक है

आप ये किस बिना पर मान लेते हैं कि आप ही सही हैं, और आपके पास सिवाय चार आर्टिकल्स के कोट करने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो कम से कम जाँच एजेंसियों के बयान तो हैं? आपने कहाँ से जाँच करवाई? अंदेशे, संदेह, और इस बात पर कि आपको ऐसा लगता है? या इस बात पर इसमें मोदी शामिल न हो ये हो ही नहीं सकता?

बजट 2018: मिडिल क्लास वालो, ऊपर उठो मुफ़्तख़ोरी की आदत से

जो गरीब हैं, उनको तो फिर आपके हिसाब से न तो स्कूल मिलना चाहिए, न ही मेडिकल सेवाएँ, न ही सड़कें, न ही रियायतें क्योंकि वो तो मिडिल क्लास नहीं हैं!

ये टूजी फ़ैसला मोदी की सरकार को तबाह कर सकता है

जो पार्टी और पत्रकार स्पेशल कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में २२ साल चले मुकदमे के फ़ैसले के बाद भी एक अंतिम प्रयास के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा सुबह के चार बजे खुलवा लेते हैं, वो इस मामले में सबसे निचली अदालत के इस फ़ैसले पर कि सबूतों के अभाव में बरी किया जाता है, ख़ुशियाँ मना रहे हैं और विन्डिकेटेड फ़ील कर रहे हैं! ये एक सुखद आश्चर्य और मनोरंजक क्षण है।

अंधा कानून लुच्चा हो जाता है; सरकारों में नेता होते हैं, और नेता एक ही ब्रीड के होते हैं

सरकारों को पता है कि सरकारें परमानेंट नहीं हैं। आज हैं, कल नहीं, परसों फिर हैं। मोदी को पता है भारत कॉन्ग्रेस मुक्त नहीं होगा। घोटालों में इसी कारण से अंधा कानून लुच्चा भी नज़र आने लगता है। कोई भी देश किसी भी पार्टी से मुक्त नहीं हो पाती।

गुजरात चुनाव समीक्षा: कॉन्ग्रेस ईवीएम, ‘भाजपा को 150 नहीं मिले’ के पीछे नहीं छुप सकती

कॉन्ग्रेस नया राहुल ‘दिखा’ तो पाई, लेकिन वो ‘नया’ क्या है, ये कभी ‘बता’ नहीं पाई। पार्टी के दफ़्तर में इस पर पटाखे खूब छूटे कि वो अध्यक्ष बनने वाले हैं लेकिन इससे किसी गुजराती वोटर को क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा ये पता नहीं चला। छवि की बाहरी रूपरेखा सबने देखी, भीतरी विजन क्या था, ये बाहर नहीं आया।