प्राइम टाइम: नीरव मोदी कांड में फ़ेसबुकिया विश्लेषकों की गट फीलिंग का दम्भ देखने लायक है

आप ये किस बिना पर मान लेते हैं कि आप ही सही हैं, और आपके पास सिवाय चार आर्टिकल्स के कोट करने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो कम से कम जाँच एजेंसियों के बयान तो हैं? आपने कहाँ से जाँच करवाई? अंदेशे, संदेह, और इस बात पर कि आपको ऐसा लगता है? या इस बात पर इसमें मोदी शामिल न हो ये हो ही नहीं सकता?

बजट 2018: मिडिल क्लास वालो, ऊपर उठो मुफ़्तख़ोरी की आदत से

जो गरीब हैं, उनको तो फिर आपके हिसाब से न तो स्कूल मिलना चाहिए, न ही मेडिकल सेवाएँ, न ही सड़कें, न ही रियायतें क्योंकि वो तो मिडिल क्लास नहीं हैं!

ये टूजी फ़ैसला मोदी की सरकार को तबाह कर सकता है

जो पार्टी और पत्रकार स्पेशल कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में २२ साल चले मुकदमे के फ़ैसले के बाद भी एक अंतिम प्रयास के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा सुबह के चार बजे खुलवा लेते हैं, वो इस मामले में सबसे निचली अदालत के इस फ़ैसले पर कि सबूतों के अभाव में बरी किया जाता है, ख़ुशियाँ मना रहे हैं और विन्डिकेटेड फ़ील कर रहे हैं! ये एक सुखद आश्चर्य और मनोरंजक क्षण है।

अंधा कानून लुच्चा हो जाता है; सरकारों में नेता होते हैं, और नेता एक ही ब्रीड के होते हैं

सरकारों को पता है कि सरकारें परमानेंट नहीं हैं। आज हैं, कल नहीं, परसों फिर हैं। मोदी को पता है भारत कॉन्ग्रेस मुक्त नहीं होगा। घोटालों में इसी कारण से अंधा कानून लुच्चा भी नज़र आने लगता है। कोई भी देश किसी भी पार्टी से मुक्त नहीं हो पाती।

गुजरात चुनाव समीक्षा: कॉन्ग्रेस ईवीएम, ‘भाजपा को 150 नहीं मिले’ के पीछे नहीं छुप सकती

कॉन्ग्रेस नया राहुल ‘दिखा’ तो पाई, लेकिन वो ‘नया’ क्या है, ये कभी ‘बता’ नहीं पाई। पार्टी के दफ़्तर में इस पर पटाखे खूब छूटे कि वो अध्यक्ष बनने वाले हैं लेकिन इससे किसी गुजराती वोटर को क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा ये पता नहीं चला। छवि की बाहरी रूपरेखा सबने देखी, भीतरी विजन क्या था, ये बाहर नहीं आया।

अय्यर अभिजात्य रंगभेद के पर्याय हैं, ये ‘उड़ता तीर’ राहुल की जनेऊ काट देगा

आप गाली दीजिएगा, वो उसे कोट पर मेडल बनाकर चिपका लेगा, और कहता फिरेगा कि देखो ये कितना बड़ा अचीवमेंट है।

चुनावी सर्वे मूड नहीं बताते, उसे प्रभावित करने का नाकाम ज़रिया हैं

सर्वे ने पहले राहुल को घुसाया और छोटा सा छेद दिखाया; फिर राहुल के सीटों की संख्या बढ़ती दिखाई गई ताकि लगे कि राहुल के ट्वीट, चुटकुलों और गीतों का असर जनता पर हो रहा है और वो राहुल की बात समझ रहे हैं; फिर नए सर्वे में दिखाया जा रहा है कि काँटे की टक्कर है।

वामपंथियों का चुनावी विश्लेषण: अंधविरोध, घटिया और चिरकुटई से परिपूर्ण

निकाय और पंचायत चुनाव राष्ट्रीय स्तर तक के सफ़र तक पहुँचने की पहली सीढ़ी है, वहाँ लोग पार्टी नहीं, अपने बूते पर चुनाव लड़ते हैं। ये उनके लिए स्क्रीनिंग टेस्ट की तरह होता है कि हमने तो खुद को साबित कर दिया, अब आप देख लो कि अगले चुनावों में हमें अपनी पार्टी में रखोगे कि नहीं।

प्राइम टाइम: रवीश बाबू, करना तो आपको भी पत्रकारिता चाहिए लेकिन…

प्रधानमंत्री दिल्ली में क्यों नहीं है, वाहियात सवाल है। वो इसलिए कि तंत्र अपने हिसाब से चलता रहता है, और आज के दौर में कम्युनिकेट करना कबूतरों के ज़रिए नहीं होता कि प्रधानमंत्री की ज़रूरत होगी तो पता चलेगा कि बैलगाड़ी पर बैठे हैं, सात दिन में दिल्ली पहुँचेंगे।