बंगाल चुनावी हिंसा: रवीश जी ने नाक में काग़ज़ की सीक डालकर छींका, किया इज़ इक्वल टू

पूरे आर्टिकल में प्रदेश की मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं लिया गया है। उस सांसद का नाम नहीं लिया गया है जिसने इस हिंसा के आँकड़े को सामान्य बताया है। क्यों? ट्रेन में बिकते जनरल नॉलेज की किताब में ‘कौन सी चिड़िया उड़ते हुए अंडे देती है’ के बाद वाले पन्ने पर ‘राज्य और मुख्यमंत्री’ वाले हिस्से में बंगाल की ममता का नाम नहीं छपा है क्या?

प्राइम टाइम: मेवाड़ के राजसमंद में ५० साल के मुस्लिम की हत्या किसने की?

ऐसे समय में चुप रहना सहमति देना है इस तरह के उन्माद को। ऐसे समय में चुप रहना बताता है कि आपके मन में चोर है। आप चाहते हैं कि हर मुसलमान ऐसे ही काटकर जला दिया जाय, और आप ये भी चाहते हैं कि पूरी दुनिया में बम और धमाकों के नाम पर इस्लामी हुकूमत आ जाय।

प्राइम टाइम: रवीश बाबू, करना तो आपको भी पत्रकारिता चाहिए लेकिन…

प्रधानमंत्री दिल्ली में क्यों नहीं है, वाहियात सवाल है। वो इसलिए कि तंत्र अपने हिसाब से चलता रहता है, और आज के दौर में कम्युनिकेट करना कबूतरों के ज़रिए नहीं होता कि प्रधानमंत्री की ज़रूरत होगी तो पता चलेगा कि बैलगाड़ी पर बैठे हैं, सात दिन में दिल्ली पहुँचेंगे।

प्राइम टाइम: मुंबई ‘स्पिरिट’ से भीगीं मशालें फेसबुक पर ही जलती हैं!

स्पिरिट का नाम लेकर अपने काम पर निकल लेना बहादुरी नहीं, मजबूरी है। और मजबूर लोग आंदोलन नहीं करते। वो मेरी तरह फेसबुक पर पोस्ट लिखकर सो जाते हैं।

प्राइम टाइम: रवीश जी, वीकेंड का मुद्दा सोमवार का इंतजार नहीं करता!

लाइट लगवाना, गार्ड खड़े करने का मतलब है कि हमने मान लिया है कि बीएचयू में हरामी लौंडे तो घूमते रहेंगे, आप लाइट और गार्ड से बचाव करा लो! और लाइट में दुपट्टा खींचा गया तो? फब्तियाँ कसी गईं तो?

प्राइम टाइम 30: अगले दंगों के ख़ून से पत्रकारों, बुद्धिजीवियों के हाथ सने होंगे

इन दोगले पत्रकारों को नकारिये जो मरने वाले का धर्म तलाश कर प्राइम टाइम में आँकड़े बताते हैं। इन बुद्धिजीवियों से बचिए जो टट्टी के रंग में जाति खोजते हैं।

प्राइम टाइम २२: सेल्फ़ी खिंचाने वाले प्रोटेस्टर का कोई माय-बाप नहीं होता

अगर आप किसी चीज़ से असहमति रखते हैं तो आप फ़ौरन विद्वान समझ लिए जाएँगे। जहाँ आपने ये कहा कि ‘मेरा इस विषय पर अलग विचार है’, आप बुद्धिजीवी होंगे उस सभा में।

प्राइम टाइम २०: चुनावी मौसम में वेमुला, नजीब, मनु स्मृति की वापसी

एक सर्वे कीजिए। सड़क पर जाईए और हिन्दुओं से पूछिए कि क्या उन्होंने मनु स्मृति का नाम भी सुना है? पूछिए कि क्या उसका एक श्लोक भी जानते हैं? पूछिए कि क्या वो अपनी ज़िन्दगी मनु स्मृति के हिसाब से चलाते हैं?

प्राइम टाइम १५: सेव एनर्जी, गो डार्क दिस क्रिसमस

और हाँ टर्कियों को मरते वक्त ईद के बकरे, यूलिन फ़ेस्टिवल के कुत्ते और नेपाल वाले भैंसा कटने वाले पर्व के विपरीत बिल्कुल भी कोई दर्द नहीं होगा क्योंकि ये फ़र्स्ट वर्ल्ड वालों का पर्व है ना।

प्राइम टाइम: स्लम कैसे बनते हैं? ग़रीब कहाँ से और क्यों आते हैं?

ग़रीब लोग, जो दिल्ली की सरकारी ज़मीन पर झोपड़पट्टियों में, स्लम बना कर रहते हैं वो कौन हैं और कहाँ से आते हैं? आज एक ख़बर देखी कि महरौली में एक स्लम को बुल्डोजर से तोड़ दिया गया। स्लम में आग लगना, बुल्डोजर से तोड़ दिया जाना, ख़ाली करा देना ऐसी ख़बरें हैं जिससे आपकी […]