प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचनेवाले गिरोह और उनके साथियों के नाम

ज़रूरत है कि इन लोगों की शिनाख्त हो, और सरकार, चाहे जो भी रहे, इन्हें लगातार निगरानी में रखे। इनकी हरकतों पर निगाह होनी चाहिए क्योंकि ये लोग कब किसी आठ साल के बच्चे की छाती में बम बाँधकर किसी भीड़ में भेज देंगे, ये कोई नहीं जानता।

रवीश जी, कितने पैंट पहन रखे हैं कि लगातार उतरने पर भी नंगेपन का अहसास नहीं हो रहा?

हम तो पत्रकार हैं, हम आपके कमोड से टट्टी सूँघकर आपको बताएँगे कि आपने तो आलू के पराठे खाए थे, आप भले ही चिल्लाते रहें कि चावल-दाल था।

प्राइम टाइम: रवीश बाबू, करना तो आपको भी पत्रकारिता चाहिए लेकिन…

प्रधानमंत्री दिल्ली में क्यों नहीं है, वाहियात सवाल है। वो इसलिए कि तंत्र अपने हिसाब से चलता रहता है, और आज के दौर में कम्युनिकेट करना कबूतरों के ज़रिए नहीं होता कि प्रधानमंत्री की ज़रूरत होगी तो पता चलेगा कि बैलगाड़ी पर बैठे हैं, सात दिन में दिल्ली पहुँचेंगे।

नाहिद आफ़रीन वाला ‘फ़तवा’, रवीश कुमार और वैसी ख़बरों से गायब ‘पड़ताल’

आपको हर बार गोयनका अवार्ड तो मिल जाता है लेकिन आपकी विश्वसनीयता संदिग्ध होती जा रही है। एक दिन आएगा जब टीवी पर सच में अँधेरा छा जाएगा और उस अँधेरे में आप टॉर्च लेकर ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे।

वो क्यों तिलमिलाता है जब उसका अकाउँट हैक हो जाता है?

नौकरी की मजबूरी आदर्शों से समझौता करने पर मजबूर कर देती है। आप निष्पक्षता का पश्मीना शॉल ओढ़े हुए हैं। अब वो पुराना हो गया है, गंदा हो गया है। उसकी ड्रायक्लीनिंग करवाईए, और थोड़े दिन अवकाश लेकर ख़ुद के प्रोग्राम देखिए कि कैसे आप वहीं जाते हैं जहाँ आपके मतलब की बातें होती हैं बाती हर जगह से आप ये कहकर भाग लेते हैं कि यहाँ तो एक ही तरह के विचार आ रहे हैं।

6 दिसम्बर वाला प्राइम टाइम बाबरी मस्जिद से लाइव

एक-दो मस्जिद टूटे, वो याद रखना ज़रूरी है। क्या है कि इन यादों को याद दिलाते रहने से हमारा और नेताओं का पेट चलता है।

रवीश से मुझे दिक्कत है

दिक्कत तब से हुई है जब से दिल्ली के चुनाव घोषित हुए हैं। मैं भाजपा को वोट देता हूँ, आगे भी दूँगा। दिल्ली का वोटर हूँ नहीं पर सरकार भाजपा की चाहता हूँ। ये मैं पहले ही पैरा में क्लियर कर दे रहा हूँ क्योंकि रवीश कुमार आजतक क्लियर कर नहीं पाए कि वो किस […]