प्राइवेसी एक पब्लिक विषयवस्तु है, आप इंटरनेट पर हैं तो नंगे हैं

जब सारे नाइट टॉक शो होस्ट हर रात ट्रम्प के ख़िलाफ़ विषवमन कर रहे थे, और आज भी करते हैं, तब लोग प्रभावित नहीं हो रहे थे? क्यों? क्योंकि वो सोशल मीडिया नहीं है! जब फ़ॉक्स न्यूज़ को छोड़कर बाकी के अधिकतर न्यूज़ चैनल पैनल डिस्कशन और चर्चाओं में ट्रम्प को खुल्लमखुल्ला आड़े हाथों लेते थे तब क्या वोटर इन्फ्लूएन्स नहीं हो रहा था? मतलब मेमस्ट्रीम मीडिया स्टूडियो से कैम्पेनिंग करे तो ठीक, यहाँ आपकी पब्लिक में रखी बातें कोई ले रहा है तो आप बवाल कर रहे हैं!

फ़ेसबुक लाइव (मल्टीपल स्ट्रीम): नैरेटिव मेकर मीडिया पर नया प्रहार

सूचना पूर्णरूपेण प्रजातांत्रिक हो गई है कि ये किसी के भी हाथों में जा सकती है, और किसी के भी हाथों से आ सकती है।

बिकी हुई पत्रकारिता के दौर की ख़बरों में प्रोपेगेंडा कैसे पहचानें

जब ख़बरों में अनावश्यक बातें और संबंध बनाए जाने लगें तो समझ जाइए कि वो प्रोपेगेंडा है।

क्या फ़ेसबुक पर आपका दिमाग़ ख़राब करते हैं कुछ लोग?

दोस्तों को, जो आपके विरोधी विचारों के हैं, उनको अनफॉलो कीजिए, अन्फ्रेंड मत कीजिए। बीच-बीच में ख़बर लेते रहिए कि कहीं सुधर तो नहीं गया। नहीं सुधरा तो रहने दीजिए।

वीडियो देखकर राय बनाना, उन्मादित होना, आनंदित होना आसान है

विडियो आज का गोमाँस, पोर्क है। व्हाट्सएप्प, फेसबुक के ग्रुप मंदिर और मस्जिद हैं। पहले गाय का माँस मंदिरों के और सूअर का मस्जिदों के सामने फेंका जाता था। अब उतना रिस्क कोई क्यों लेगा। अब विडियो बना दो।

सोशल मीडिया के दौर में अजेण्डा सेटिंग और परम्परागत मीडिया परिदृश्य

अब स्टूडियो और सम्पादन कक्ष से पैसे लेकर एक विचारधारा के बीज बोने की परम्परा अस्तगामी है क्योंकि लोग सोशल मीडिया पर उनके झूठ तुरंत पकड़ लेते हैं।

Hashtag opinions: Deconstructing facebooking

Being on Facebook brings me more annoyance than anything else. It started as being something funny, not witty or timepass. Just funny. I, and a few friends, during post graduation would go to someone’s post and start conversing about weird stuff in comments. It would be random, and we would laugh over it every single […]