फ़ेसबुक लाइव (मल्टीपल स्ट्रीम): नैरेटिव मेकर मीडिया पर नया प्रहार

सूचना पूर्णरूपेण प्रजातांत्रिक हो गई है कि ये किसी के भी हाथों में जा सकती है, और किसी के भी हाथों से आ सकती है।

बिकी हुई पत्रकारिता के दौर की ख़बरों में प्रोपेगेंडा कैसे पहचानें

जब ख़बरों में अनावश्यक बातें और संबंध बनाए जाने लगें तो समझ जाइए कि वो प्रोपेगेंडा है।

क्या फ़ेसबुक पर आपका दिमाग़ ख़राब करते हैं कुछ लोग?

दोस्तों को, जो आपके विरोधी विचारों के हैं, उनको अनफॉलो कीजिए, अन्फ्रेंड मत कीजिए। बीच-बीच में ख़बर लेते रहिए कि कहीं सुधर तो नहीं गया। नहीं सुधरा तो रहने दीजिए।

वीडियो देखकर राय बनाना, उन्मादित होना, आनंदित होना आसान है

विडियो आज का गोमाँस, पोर्क है। व्हाट्सएप्प, फेसबुक के ग्रुप मंदिर और मस्जिद हैं। पहले गाय का माँस मंदिरों के और सूअर का मस्जिदों के सामने फेंका जाता था। अब उतना रिस्क कोई क्यों लेगा। अब विडियो बना दो।

सोशल मीडिया के दौर में अजेण्डा सेटिंग और परम्परागत मीडिया परिदृश्य

अब स्टूडियो और सम्पादन कक्ष से पैसे लेकर एक विचारधारा के बीज बोने की परम्परा अस्तगामी है क्योंकि लोग सोशल मीडिया पर उनके झूठ तुरंत पकड़ लेते हैं।

Hashtag opinions: Deconstructing facebooking

Being on Facebook brings me more annoyance than anything else. It started as being something funny, not witty or timepass. Just funny. I, and a few friends, during post graduation would go to someone’s post and start conversing about weird stuff in comments. It would be random, and we would laugh over it every single […]

Social media, where to?

Image courtesy: onbile.com When Marshal McLuhan coined the term Global Village, way back in 1962, he had just seen a glimpse of what electric technology could do. But he had sensed that whatever it comes to be in future, it would be an “extension of consciousness”. He had predicted that every information collected would be […]