सबरीमाला पर फ़ैसला: जेंडर इक्वालिटी, धार्मिक परम्पराएँ और धर्म

समाज और धर्म को एक ही मानकर, मंदिर को पूर्णतः पर्यटन स्थल मानकर उसमें जेंडर इक्वालिटी का तड़का मत लगाइए। हर बात, हर जगह लागू नहीं होती। अगर हो पाती तो मुस्लिम महिलाएँ भी हर मस्जिद में नमाज़ पढ़ पातीं और एक एनजीओ इसी सुप्रीम कोर्ट में इसे लागू करने के लिए लगातार प्रयत्न करती रहती।

सुप्रीम कोर्ट का ईगो भी सुप्रीम है, लेकिन लॉर्डशिप को याद रहे वो लॉर्ड नहीं हैं

आपके बेटे-भतीजों का भला होना देश का भला होना नहीं है, कभी कॉलेजियम से बाहर आईए जज साहब। न्यायालय को दुकानदारी मत बनाईए, कि बाप का दुकान बेटा सँभालेगा।

सुप्रीम कोर्ट का अधकचरा आदेश, घंटा नहीं होगा इससे कुछ

क्या कोर्ट ये सुनिश्चित कर सकती है कि हर आदमी खड़ा होगा, और जो नहीं होगा उसे पुलिस के सुपुर्द किया जाय? क्या आपकी ओवरवर्क्ड पुलिस के पास इसके लिए समय है?

सुप्रीम कोर्ट या तो खलिहर है या पगला गया है

इन गीतों, लोगों, प्रतीकों का सम्मान ज़रूरी है। लेकिन हाँ, ये आवाज हमारे अंदर से आए तब बेहतर है। सुप्रीम कोर्ट को आदेश देने की ना तो जरूरत है, ना ही ये उनका काम है।

कोर्ट, पुलिस, सरकार और बड़े लोग

बड़े लोगों को न्यायपालिका बड़ी रस्सी थमाती है जिसकी लंबाई वहाँ तक है जहाँ तक जज साहब चाहते हैं। पहले हजार करोड़ माँग रहे थे, अब छः सो करोड़ पर पहुँचे हैं। बाकी, आप लोगों ने कभी ना कभी वो ख़बर पढ़ी ही होगी कि दो रूपये के फ़्रॉड के केस में निलंबित बस कंडक्टर को साठ वर्ष की अवस्था में मिला न्याय।