अच्छा, देश के युवा का मूड पता चल गया लेकिन आगे क्या?

ये तो हमारे, आपके डर को ज़ायज ठहराते हैं कि हाँ, यहाँ आतंकियों की नर्सरी है, और जो बम नहीं बना रहे, जो जंगलों में अपने ‘साथियों’ की लाशों के पेट में बम नहीं छोड़ रहे ताकि वो मरते हुए भी दस-पाँच आम सरकारी मुलाजिम को मार दे, जो अपने साथ की महिला काडरों को सेक्स स्लेव नहीं बना रहे, वो सब मानसिक समर्थन ज़रूर दे रहे कि जो वो कर रहे हैं वो सही कर रहे हैं।

वामपंथी नेतृत्व चुने हुए प्रधानमंत्री को बम से उड़ाकर लोकतंत्र को बचाना चाहता है!

अगर ये लोग दलितों और आदिवासियों के हिमायती हैं तो ऐसे राज्यों और इस देश में उनकी सरकार क्यों नहीं बनती? देश में तो तीन-चौथाई आबादी दलितों और आदिवासियों की ही है, इनके सांसद विलुप्तप्राय प्रजाति क्यों हो गए हैं?

‘ठंढा आ रहा है’ वामपंथी आतंकी पिल्लो, कोंकियाओ और नए नैरेटिव गढ़ो

तुम्हारा ट्रेडिशनल आर्गुमेंट और वोटबैंक दोनों ही तुमसे भाग रहे हैं क्योंकि इस सरकार ने तुम्हारे आर्गुमेंट को भी तोड़ा है, और वोटबैंक को भी। दोनों को अपने काम से। चूँकि आँख में घोड़े का बाल और बवासीर वाले पिछवाड़े में गुस्से से तुमने कैक्टस डाल रखा है तो तुम्हें नहीं दिखेगा कि सड़के बनीं, गैस सिलिंडर मिले, फायनेंसियल इन्क्लूजन हुआ, इकॉनमी की हालत बेहतर है, टैक्स देना सहज हुआ, एक करोड़ नए कर दाता जुड़े, तुम्हारे चाचा द्वारा दिए गए लोन को लेकर भागने वालों पर कार्रवाई हो रही है…

रॉय बनाम रावल: द वायर की खोजी पत्रकारिता का मिसिंग लिंक

कुछ लोग द वायर का एक लिंक शेयर कर रहे हैं कि अरुँधति रॉय वाली ख़बर फ़र्ज़ी थी जिस पर परेश रावल ने ट्वीट किया। ये बात और है कि द वायर वालों ने उसी साइट पर, उसी से जुड़ी ख़बर में डाला गया विडियो नहीं दिखाया है। वो ख़बर भी पिछले तीन दिन से चर्चा […]