लिखने की प्रक्रिया: चाय के कप और होंठों तक कई फिसलनें हैं

सही ट्रीटमेंट बहुत ज़रूरी होता है, वरना कहानी की जगह वो अक्षरों के झुंड से बने शब्द, शब्दों के झुंड से बने वाक्य, वाक्यों के झुंड से बने पैराग्राफ़ और पैराग्राफ़ों के झुंड से बने छपे पन्नों से ज़्यादा कुछ नहीं हो पाएगा।

खाली समय में लेखक के दिमाग का पागलपन

ये सब किसी आधी सोची हुई सोच की परिणति होती है। हमें ‘क्लोज़र’ नहीं मिलता। हमारे जीवन की वो घटनाएँ वैसे नहीं बीतती जैसे हम उसे होते देखना चाहते हैं। इसी कारण हम उसे बार-बार अपने तरीक़े से ख़त्म करते रहते हैं।

फ़ेसबुक पर सोए साहित्यकारों के नाम

सोशल मीडिया को समझिए और सेल्फी, प्रशंसा और आत्मुग्धता से ऊपर उठकर देश और समाज में हो रही बातों पर विचार रखिए। पूरे समाज की चर्चा का स्तर ऊपर उठाईए। आपको भी लाभ होगा, समाज को भी।

Responsibility of an author

People (at least in Delhi, India) have forgotten to read better books and champion themselves reading the books whose writers are not sure what is the importance of ‘…’ (Three dots in succession) or why it is just pathetic to say ‘we write what people want.’ Well, people want porn and it does sell well. […]