अनुष्का को निकाल दें तो ‘सुई-धागा’ एक सपाट फ़िल्म है

ट्रेलर देखकर बहुत आशा से गया था कि ये फ़िल्म भी थोड़ी हटकर है, तो औसत से बेहतर होगी जैसी कि ‘स्त्री’ या ‘पैडमैन’ थी। लेकिन कहानी के लिहाज से ये फ़िल्म बहुत ढीली और सपाट निकली, जिसे आप देख लें तो भी ठीक, न देखें तो भी ठीक।

एक पति-पत्नी के संघर्ष की कहानी में संघर्ष का स्कोप इतना लिमिटेड था कि कष्ट दिखाने के लिए माँ की बीमारी और सायकिल से गिरकर पैरों की उँगलियों से ख़ून निकलना ही दिखाया जा सका। मानसिक संघर्ष का सारा ज़िम्मा अनुष्का की अदाकारी पर ही जाता दिखा क्योंकि वरुण धवन ने ‘बदलापुर’ में अपनी संजीदा एक्टिंग से जो पोटेंशियल दिखाया था, वो यहाँ पर दूर-दूर तक नज़र नहीं आया।

जब आपका मुख्य पात्र ही आपको अपनी अदाकारी से विश्वस्त न कर पा रहा हो तो वो जो भी करता है, हल्का लगता है। वहीं अनुष्का वरुण धवन से कई गुणा बेहतर थी। एक ग्रामीण स्त्री और छोटी आमदनी वाले घर की बहु का किरदार निभाते हुए अनुष्का कभी भी ऐसी नहीं लगी कि किसी हायफाय, ग्लैमरस एक्ट्रेस को मजबूरी में ये फिल्म करनी पड़ी। चाहे वो किचन से उठते हुए साड़ी में हाथ पोंछना हो, पति के सामने हँसना हो, रोना हो, बात कहने से पहले झिझकना हो, अनुष्का ने हर हिस्से को बख़ूबी निभाया है। 

वरुण धवन को निर्देशक ने बर्बाद किया है। उसी वरुण धवन से अगर दूसरा निर्देशक बेहतर परफ़ॉर्मेंस निकलवा लेता है, तो यहाँ इस ढीली एक्टिंग की ज़िम्मेदारी उसी को लेनी होगी। बाकी के लोगों ने भी ठीक एक्टिंग की है, सिवाय ‘गुड्डू’ नाम के पात्र का किरदार निभाने वाले नमित दास ने ऐसी वाहियात एक्टिंग की है कि उन्हें दूसरा मौका नहीं मिलना चाहिए। लेकिन फिर इसी एक्टर की टीवी सीरीज़ ‘सुमित सम्भाल लेगा’ की याद आती है जहाँ उसने अच्छा काम किया था। 

संवाद चुटीले हैं, ठीक से लिखे गए हैं और आपको सहजता से छूते हैं, मुस्कुराने पर मजबूर करते हैं। कहानी जैसी है, उस हिसाब से संवाद ही इस फ़िल्म का बचाव कर पाते हैं। कहानी सीधी है, और आपके लिए बहुत ज़्यादा जगह नहीं छोड़ती कि आप कुछ अपने स्तर से समझें। हर घटना लगभग आशा के अनुरूप घटती जाती है। एक लड़का है, मालिक के सामने बेइज़्ज़त होता है, बीवी की बात सुनता है, नौकरी छोड़ देता है, अपना कुछ शुरु करता है पत्नी के साथ, बीच में अपने ही किसी लोग से ठगा जाता है, फिर उसी ठगने वाले को ईमानदारी से बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर मात देता है। 

ये कहानी आपको एक्साइट नहीं करती। आपको लगता है कि कुछ और होना चाहिए था जो कि आपको चौंका दे, या कहानी में नए आयाम जोड़े। उस स्तर पर ये फ़िल्म चूक जाती है। डायरेक्शन के नाम पर पति-पत्नी के साथ होने को चार बार क़दम मिलाते, मशीन के पैडल पर एक रिदम में पाँव चलाते, हाथ पकड़ कर जाते, और हाथ पकड़ कर आते दिखाया गया है। ये सब घिसे-पिटे तरीके हैं, जो आप अनायास ही दिखाएँगे, तो लोगों का ध्यान भी नहीं जाएगा। इसी भाव को पकड़ने के लिए उससे पहले की घटना का बहुत ज़्यादा प्रभावशाली होना ज़रूरी होता है। वहाँ निर्देशन में ये चूक हुई है।

कैमरे का काम ठीक ही है, आउटस्टेंडिंग नहीं। शायद बहुत ज़्यादा किया भी नहीं जा सकता था। छोटे शहरों की गलियों को दिखाने वाली कई फ़िल्में आ चुकी हैं और हर फ़िल्म में एक ही तरह की सिनेमेटोग्रफ़ी दिखती है। आपको पर से उलझे बिजली के तार दिखा दिए जाएँगे, पतली गली में सायकिल और बाइक दिखा दी जाएगी। गली की सड़क में ईंटें होंगी, दीवारों से रंग उतर रहा होगा। मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ बहुत खूबसूरत करने का मौका मिला होगा कैमरा वालों को। लेकिन क्रिएटिविटी की परीक्षा उसी में होती है कि जहाँ स्कोप कम है, वहाँ आप कुछ अच्छा कर सकें। 

जब आपकी फ़िल्म के इतने हिस्से औसत हों, तो फ़िल्म का पेस प्रभावित होता है। फ़िल्म के एडिटर के हाथ बँध जाते हैं क्योंकि आपके पास जो शॉट्स हैं, जो सिक्वेंसेज़ हैं, उसी को लेकर आपको काट-छाँट और सेटिंग करनी है। वरुण धवन और अनुष्का द्वारा मुफ़्त सिलाई मशीन पाने के लिए जो सिक्वेंस लिया गया है, उसमें आदमी अत्यधिक ड्रामा के कारण बोर हो जाता है। हम इंतज़ार करते रहते हैं कि कब क्या होगा, और कुछ भी ऐसा नहीं होता कि हमें लगे कि ये तो सोचा ही नहीं था। 

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी कुछ ऐसा नहीं कि आप उस पर विशेष ध्यान दें। गाने बैकग्राउंड में चलते रहते हैं पर उसके शब्द आप तक पहुँच नहीं पाते। हो सकता है मैंने शब्दों पर ध्यान न दिया हो क्योंकि वहाँ कहानी में विज़ुअल्स के सहारे कुछ-कुछ चलता रहा। 

कुल मिलाकर ये एक औसत फ़िल्म कही जा सकती है और इसके औसत होने की ज़िम्मेदारी पटकथा लिखने वाले और निर्देशक को लेनी चाहिए। इन दोनों जगहों पर फ़िल्म औंधे मुँह गिरी। ऐसे ही विषय पर ‘पैडमैन’ भी बनी थी, जो कि ठीक थी, इससे बेहतर। एक व्यक्ति के संघर्ष को दर्शक महसूस कर पा रहा था, लगातार। लेकिन इस फ़िल्म में पति-पत्नी के इस संघर्ष को दर्शक हिस्सों में, कहीं-कहीं, महसूस कर पाता है, जब कहानी भावनात्मक स्तर पर कभी-कभार आपको छू जाती हो। 

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