टॉक टू अ मुस्लिम: आख़िर मैं मुसलमानों से बात क्यों करूँ

कई बकलंडू बुद्धिजीवी और दो कौड़ी के तथाकथित नचनिया लोग ये सोचते हैं कि हैशटैग चलाकर सारी समस्याओं के बारे मे जागरुकता तो छोड़िए, उसका समाधान ही हो जाएगा। 

ऐसा ही एक झाँटू हैशटैग चला ‘टॉक टू अ मुस्लिम’। 

इसका कोई खास मकसद नहीं है, न ही इससे कुछ होने वाला है। हैशटैग होना ही है तो ये हो कि ‘मुस्लिम्स शुड टॉक अमन्ग देमसेल्व्स व्हाय दे नीड अ हैशटैग लाइक दिस’। लम्बा है, लेकिन सत्य है। 

मुसलमानों को ये सोचना ज़्यादा ज़रूरी है, अगर वो बात ही करना चाहते हैं तो, कि आख़िर लोग उन्हें जानने की कोशिश क्यों नहीं करते? आख़िर क्या हो गया है कि उन्हें अपने बारे में बताने के लिए हैशटैग की भीख माँगनी पड़ रही है?

मैं तो जानता हूँ कि ये एक विशुद्ध चूतियाप है, फिर भी बकचोदी निकली है तो दूर तक फैलेगी के तर्ज पर, चर्चा के लिए ही सही, मैं क्यूँ बात करूँ मुस्लिम से? मेरी अवधारणा तो सीधी है कि एक-दो मुसलमानों को छोड़कर, हजार (या शायद लाख) में बाकी मुसलमान हर मुद्दे पर या तो शायरी करता है, या मक्का की तस्वीर लगाकर सुभानअल्लाह करता पाया जाता है, या कुछ दिनों के लिए गायब हो जाता है, या सीधा यह कहकर भाग जाता है कि ऐसा करने वाले लोग ‘सच्चे मुसलमान’ नहीं हैं। 

तुम्हारा फ़ेवरेट प्लेयर मुसलमान ही रहेगा, पाकिस्तान की जीत पर तुम पटाखे ही छोड़ोगे, इस्लामी आतंक पर तुम चुप हो जाओगे, हलाला और ट्रिपल तलाक़ पर शरीयत और क़ुरान की दुहाई दोगे, पॉलीगेमी पर कहोगे कि बहुत कम लोग ऐसा कर रहे हैं…

एक कारण तो बता दो कि क्यों कर लूँ तुम जैसे नालायकों से बात जो चुप रहते हैं, बात टालते हैं और देशविरोधी आतंकियों को मौन समर्थन देते हैं? क्यों करूँ मैं मुसलमानों से बात? 

कितनी बार अख़बारों के मुसलमान नाम वाले कॉलमकार, ‘खान’ कलाकार समूह, मुसलमानों के हिमायती लोग मुखर होकर ये रहते हैं कि ‘हाँ, इस्लामी आतंक एक नासूर है विश्व के लिए’? कितनी बार मुसलमान लोग ये सोचते हैं कि  क्या कारण है कि वो जहाँ भी पाँच प्रतिशत से अधिक जनसंख्या में हैं वहाँ उनसे वहाँ की अल्पसंख्यक तो छोड़ो, बहुसंख्यक जनता तक त्रस्त है? क्या कारण है कि म्यांमार में बौद्धों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसक होना पड़ता है? 

कभी ये ‘इन द फ़ेस’ फ़ैक्ट क्यों नहीं दिखता कि मज़हबी आतंक पर हर बार मुसलमान नाम वाला व्यक्ति ही क्यों होता है कभी ट्रक चलाते हुए, कभी बम से खुद को उड़ाते हुए, कभी अल्लाह के नाम पर सैकड़ों का बलात्कार और उनकी हत्या करते हुए अकबर करते रहे इस्लाम का, कभी बंधक बनाकर पैसे वसूलते हुए? 

कभी ये हैशटैग क्यों नहीं चलाते कि ‘टॉक अबाउट इस्लामिक टेररिज्म’? इस पर मुसलमानों के सेमिनार, पैनल डिस्कशन, चर्चा, विचार गोष्ठी, टीवी डिबेट आदि क्यों नहीं होते? और जब कोई हिन्दू या दूसरे धर्म के लोग चर्चा करेंगे और ‘इस्लामी टेरर’ शब्द पर ऐसे आपत्ति करोगे कि कुछ गलत बोल दिया! तुम उसे ‘बिगट’ और कम्यूनल कह दोगे! 

शुतुर्मुर्गों की तरह रेत में गर्दन धँसाकर जपते रहे कि ‘वो लोग सच्चे मुसलमान नहीं हैं’। सच्चे मुसलमान आख़िर तुम खुद को भी कैसे कह सकते हो क्योंकि तुम क़ुरान की कई आयतें भूल जाते हो जिसमें एक मानव की हत्या मानवता की हत्या के बराबर है। सच्चे मुसलमान तुम नहीं हो क्योंकि तुम तथ्य को नकार देते हो और कहानियाँ बनाकर ‘इस्लामोफोबिया’ ईजाद करते हो। 

जब तुम मेरे हिसाब से सच्चे मुसलमान हो ही नहीं तो फिर मैं तुमसे क्यों बात करूँ? तुम लोग तो मुसलमानों के नाम पर उतने ही बड़े कलंक हो जितने आइसिस के आतंकी। फिर ये बताओ कि आख़िर क्यों मैं ये झाँटू हैशटैग को क्यों मानूँ। 

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